हमारे गुरू तुल्य अग्रज के सौजन्य से🙏

सचमुच तुम मर्यादा पुरुषोत्तम हो…राम..!!

एक टक देर तक उस सुपुरुष को निहारते रहने के बाद बुजुर्ग भीलनी के मुंह से स्वर/बोल फूटे..

“कहो राम ! सबरी की डीह ढूंढ़ने में अधिक कष्ट तो नहीं हुआ ?”

राम मुस्कुराए :- “यहां तो आना ही था मां, कष्ट का क्या मोल/मूल्य ?”

“जानते हो राम ! तुम्हारी प्रतीक्षा तब से कर रही हूँ, जब तुम जन्में भी नहीं थे|
यह भी नहीं जानती थी, कि तुम कौन हो ? कैसे दिखते हो ? क्यों आओगे मेरे पास ? बस इतना ज्ञात था, कि कोई पुरुषोत्तम आएगा जो मेरी प्रतीक्षा का अंत करेगा|

राम ने कहा :- “तभी तो मेरे जन्म के पूर्व ही तय हो चुका था, कि राम को सबरी के आश्रम में जाना है”|

“एक बात बताऊँ प्रभु ! भक्ति के दो भाव होते हैं | पहला ‘मर्कट भाव’, और दूसरा ‘मार्जार भाव’|

”बन्दर का बच्चा अपनी पूरी शक्ति लगाकर अपनी माँ का पेट पकड़े रहता है, ताकि गिरे न… उसे सबसे अधिक भरोसा माँ पर ही होता है, और वह उसे पूरी शक्ति से पकड़े रहता है। यही भक्ति का भी एक भाव है, जिसमें भक्त अपने ईश्वर को पूरी शक्ति से पकड़े रहता है| दिन रात उसकी आराधना करता है…”(मर्कट भाव)

पर मैंने यह भाव नहीं अपनाया| ”मैं तो उस बिल्ली के बच्चे की भाँति थी, जो अपनी माँ को पकड़ता ही नहीं, बल्कि निश्चिन्त बैठा रहता है कि माँ है न, वह स्वयं ही मेरी रक्षा करेगी, और माँ सचमुच उसे अपने मुँह में टांग कर घूमती है… मैं भी निश्चिन्त थी कि तुम आओगे ही, तुम्हें क्या पकड़ना…” (मार्जार भाव)

राम मुस्कुरा कर रह गए |

भीलनी ने पुनः कहा :- “सोच रही हूँ बुराई में भी तनिक अच्छाई छिपी होती है न… “कहाँ सुदूर उत्तर के तुम, कहाँ घोर दक्षिण में मैं”| तुम प्रतिष्ठित रघुकुल के भविष्य, मैं वन की भीलनी… यदि रावण का अंत नहीं करना होता तो तुम कहाँ से आते ?”

राम गम्भीर हुए | कहा :-

भ्रम में न पड़ो मां ! “राम क्या रावण का वध करने आया है” ?

रावण का वध तो, लक्ष्मण अपने पैर से बाण चला कर कर सकता है|

राम हजारों कोस चल कर इस गहन वन में आया है, तो केवल तुमसे मिलने आया है मां, ताकि “सहस्त्रों वर्षों बाद, जब कोई भारत के अस्तित्व पर प्रश्न खड़ा करे तो इतिहास चिल्ला कर उत्तर दे, कि इस राष्ट्र को क्षत्रिय राम और उसकी भीलनी माँ ने मिल कर गढ़ा था”|

जब कोई भारत की परम्पराओं पर उँगली उठाये तो काल उसका गला पकड़ कर कहे कि नहीं ! यह एकमात्र ऐसी सभ्यता है जहाँ, एक राजपुत्र वन में प्रतीक्षा करती एक दरिद्र वनवासिनी से भेंट करने के लिए चौदह वर्ष का वनवास स्वीकार करता है|

राम वन में बस इसलिए आया है, ताकि “जब युगों का इतिहास लिखा जाय, तो उसमें अंकित हो कि ‘शासन/प्रशासन/सत्ता’ जब पैदल चल कर समाज के अंतिम व्यक्ति तक पहुँचे तभी वह रामराज्य है”|(अंतयोदय)

राम वन में इसलिए आया है, ताकि भविष्य स्मरण रखे कि प्रतीक्षाएँ अवश्य पूरी होती हैं| राम रावण को मारने भर के लिए नहीं आया हैं मां|

माता सबरी एकटक राम को निहारती रहीं |

राम ने फिर कहा :-

राम की वन यात्रा रावण युद्ध के लिए नहीं है माता ! “राम की यात्रा प्रारंभ हुई है, भविष्य के आदर्श की स्थापना के लिए”|

राम निकला है, ताकि “विश्व को संदेश दे सके कि माँ की अवांछनीय इच्छओं को भी पूरा करना ही ‘राम’ होना है”|

राम निकला है, कि ताकि “भारत को सीख दे सके कि किसी सीता के अपमान का दण्ड असभ्य रावण के पूरे साम्राज्य के विध्वंस से पूरा होता है”|

राम आया है, ताकि “भारत को बता सके कि अन्याय का अंत करना ही धर्म है”|

राम आया है, ताकि “युगों को सीख दे सके कि विदेश में बैठे शत्रु की समाप्ति के लिए आवश्यक है, कि पहले देश में बैठी उसकी समर्थक सूर्पणखाओं की नाक काटी जाय, और खर-दूषणों का घमंड तोड़ा जाय”|

और

राम आया है, ताकि “युगों को बता सके कि रावणों से युद्ध केवल राम की शक्ति से नहीं बल्कि वन में बैठी सबरी के आशीर्वाद से जीते जाते हैं”|

सबरी की आँखों में जल भर आया था|
उसने बात बदलकर कहा :- “बेर खाओगे राम” ?

राम मुस्कुराए, “बिना खाये जाऊंगा भी नहीं मां”

सबरी अपनी कुटिया से झपोली में बेर ले कर आई और राम के समक्ष रख दिया|

राम और लक्ष्मण खाने लगे तो कहा :-
“बेर मीठे हैं न प्रभु” ?

“यहाँ आ कर मीठे और खट्टे का भेद भूल गया हूँ मां ! बस इतना समझ रहा हूँ, कि यही अमृत है”|

सबरी मुस्कुराईं, बोलीं :- “सचमुच तुम मर्यादा पुरुषोत्तम हो, राम”

अखंड भारत-राष्ट्र के महानायक, मर्यादा-पुरुषोत्तम, भगवान श्री राम को बारंबार सादर वन्दन !🙏🙏

जय श्री राम…🙏🚩

हमारे पूज्य गुरूदेव के सौजन्य से🙏

भगवान का अवतार क्यों होता है, अधिकतर लोग यही समझते हैं कि भगवान का अवतार राक्षसों का संहार करने के लिये और धर्म की संस्थापना के लिये होता है,

यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत।
अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्।।

परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम्।
धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे।।
(गीता 4-6, 7)

किन्तु जो सर्वशक्तिमान है, सबके हृदय में बैठा है, चाहे राक्षस हो चाहे साधु हो तो क्या वह राक्षसों का संहार अपने दिव्य धाम में रहकर नहीं कर सकता, वह तो सर्वसमर्थ है, सत्यसंकल्प है। बस संकल्प कर ले, सब काम अपने आप ही जाये। फिर यहाँ अवतार लेकर आने की क्या आवश्यकता है? इसका मतलब है कोई और कारण है।

केवल एक कारण है – जीव कल्याण। अवतार लेने से पहले मीटिंग हुई भगवान के सब पार्षदों की भगवान के साथ। तो भगवान ने कहा कि भई पृथ्वी पर जाना है, वहाँ अपना नाम, रुप, लीला, गुण छोड़कर आना है जिसका सहारा लेकर जीव मुझे आसानी से प्राप्त कर सकें। ‘दशरथ का रोल (अभिनय) कौन करेगा’, कौशल्या, सुमित्रा, लक्ष्मण, भरत, शत्रुघ्न सबका निश्चित हो गया। ‘अरे रावण का रोल कौन करेगा, कैकेयी का रोल कौन करेगा, बदनामी होगी लोग गाली देंगे।’ ‘कोई बात नहीं हमारे प्रभु का काम होना चाहिये बस हमें उनकी इच्छा में इच्छा रखना है।’ (उनके भक्तों की सोच इस प्रकार होती है, वे उनकी लीला की पूर्ति के लिये बदनामी भी मोल लेने को तैयार हो जाते हैं।) यानी भगवान अपने परिकरों, पार्षदों को लेकर आते हैं और यहाँ लीला करते हैं। जितने भी उस लीला में सम्मिलित होते हैं, वे सब महापुरुष ही होते हैं अर्थात सब मायातीत होते हैं। उनके समस्त कार्यों का कर्ता भगवान ही होता है अतः उन्हें अपने कर्म का फल नहीं मिलता।

रावण भी भगवान का पार्षद ही था। भगवान ने सोचा लड़ना चाहिये, लेकिन लड़ें किससे? सब तो हमसे कमजोर हैं और कमजोर से लड़ना ये तो मजा नहीं आयेगा। अपने बराबर वाले से लड़ना चाहिये। भगवान के बराबर कौन है? महापुरुष में भगवान की सारी शक्तियाँ होती हैं। लेकिन कोई महापुरुष भगवान से क्यों लड़ेगा? अगर भगवान कहते भी हैं लड़ने के लिये तो कह देगा महाराज मैं तो शरणागत हूँ, अगर आप शरीर चाहते हैं तो मैं पहले ही दे रहा हूँ। फिर क्या किया जाये, तो भगवान ने कहा कि भई ऐसा करो कि किसी महापुरुष का श्राप दिलवाओ और उसको राक्षसी कर्म के लिये मृत्युलोक भेजो, फिर मैं वहाँ जाऊँ और उसको मारूँ तो जमकर युद्ध होगा।

तो गोलोक के दो पार्षद थे नित्य सिद्ध सदा से महापुरुष, भगवान के गेट कीपर, उनको श्राप दिला दिया सनकादि परमहंसों से जबरदस्ती। उनको प्रेरणा किया तुम हमसे मिलने आओ और गेट कीपर्स को आर्डर दे दिया कि कोई अन्दर न आने पाये। सनकादि चल पड़े भगवान से मिलने तो जय विजय ने रोक दिया, इन्होंने कहा आज तक तो किसी ने रोका नहीं था, आज क्या हो गया, श्राप दे दिया, जाओ मृत्युलोक में जाओ राक्षस बन जाओ। फिर प्रेरणा किया सनकादि को कि हमेशा के राक्षस न बनाओ बस तीन जन्म के लिये राक्षस बनकर पृथ्वी पर रहें, फिर यहाँ आ जायें। हिरण्याक्ष-हिरण्यकशिपु, रावण-कुम्भकर्ण, कंस-शिशुपाल ये थे जय-विजय। अतः रावण वास्तव में भगवान का पार्षद था, राक्षस नहीं था, भगवान की इच्छा से ही उसने यह सब किया। अतः दुर्भावना नहीं करना उसके प्रति। हमारी रावण से कोई दुश्मनी नहीं है और न राम की दुश्मनी रावण से थी। वो तो राम को केवल ये जनता को दिखाना था कि जो भी गलत काम है उससे ऐतराज करो, गलत काम करो उसका परिणाम हानिकारक है।

मायिक जो भी वर्क है चाहे सात्विक हो चाहे राजसिक हो चाहे तामसिक हो तीनों हानिकारक हैं। सात्विक भी निन्दनीय है, उससे अधिक निन्दनीय राजस है और तामस सबसे अधिक निन्दनीय है। केवल राम की भक्ति करने वाला ही तीनों गुणों से परे होकर परमानन्द प्राप्त कर सकता है इसलिये रावण दहन का अर्थ ये नहीं है कि रावण नाम का जो राक्षस था वो जला दिया गया, छुट्टी मिली। रावण जलाने से तात्पर्य है कि रावण से जो गलत काम कराया गया था उस कर्म को छोड़ना है। भले ही हम शास्त्र वेद के ज्ञाता हो जायें, निन्दनीय कर्म किसी भी प्रकार क्षम्य नहीं है जब तक उस अवस्था पर न पहुँच जायँ कि हमारा कर्ता भगवान हो जाय अर्थात भगवत्प्राप्ति से पहले कोई भी आचरण जो शास्त्र-विरुद्ध है, वह निन्दनीय है। दशहरे वाले दिन जो रावण का पुतला जलाया जाता है वह इसी बात का द्योतक है कि सात्विक, राजसिक, तामसिक सब कर्म बन्धन कारक हैं, निन्दनीय हैं। केवल भगवान की भक्ति ही वन्दनीय है। भगवान के नाम, रुप, लीला, गुण, धाम, जन में ही निरंतर मन को लगाना, यही दशहरे पर्व का मनाने का मुख्य उद्देश्य है।

हमारे पूज्य गुरुदेव के सौजन्य से🙏🏼

🌹 मनसा वाचा कर्मणा🌹
“कथनी-करनी”
रेडियो पर कोई शायर एक शेर कह रहा था- उल्फत के इस बाजार में मैं अक्सर ठगा गया,सब बेचते कुछ और हैं, तौलते कुछ और हैं।मानव जीवन की यह त्रासदी हर युग में रही है।कथनी और करनी का अंतर हमेशा रहा है।कम या ज्यादा यह बस परिस्थिति पर निर्भर है।
भारतीय परंपरा में शब्द को ब्रह्म कहा गया है, क्योंकि यह ईश्वर और जीव को एक श्रंखला में बांधने का काम करता है। एक शब्द,जो मुंह से निकलता है, वह पूरे ब्रह्मांड में गूंजता रहता है। लेकिन उसकी कीमत तभी होती है, जब कथनी का सार हो। इसलिए मनीषियों ने मौन को बेहतर बताया है। इसका आशय यह नहीं था कि आप हमेशा चुप ही रहें, बल्कि जो भी कहें, वह माप-तौलकर। और जो कहें, वह आपके अपने आचरण में भी दिखे।हम अक्सर नेताओं को एक-दूसरे पर करनी-कथनी में अंतर के आरोप लगाते देखते हैं, लेकिन याद रखें,कथनी और करनी का अंतर केवल जिम्मेदार पदों पर रहने वालों में नहीं, बल्कि आम आदमी में भी दिखता है।आप घर में अपने बच्चों के सामने जो भी कह रहे होते हैं, वह कर नहीं रहे होते।
एक महात्मा ने अपने आगंतुकों से पूछा-इस विश्व में किन दो चीजों के बीच सबसे ज्यादा दूरी है? पास बैठे लोगों में से किसी ने कहा- धरती से चांद की, किसी ने कहा- मध्यलोक से सिदधलोक की; तो किसी ने कहा अमुक स्थल से अमुक स्थान तक की,पर गुरुदेव की मुस्कुराहट कुछ और ही कह रही थी।सबकी जिज्ञासा शांत करते हुए उन्होंने कहा, इस दुनिया में सबसे अधिक दूरी है, सुख और शांति के बीच की। वह दूरी है जीभ और जीवन,वचन और कर्म के बीच की।
प्रवीण कुमार।🌹🙏🌹

हमारे पूज्य गुरुदेव के सौजन्य से🙏🏼

जो भी हमारे सनातन धर्म को मानते हैं वह इस पोस्ट को जरूर पढ़े.. पाखंडी दूर रहें ✌️
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क्या हमारे ऋषि मुनि पागल थे?
जो कौवों के लिए खीर बनाने को कहते थे?
और कहते थे कि कौवों को खिलाएंगे तो हमारे पूर्वजों को मिल जाएगा?
नहीं, हमारे ऋषि मुनि क्रांतिकारी विचारों के थे।
यह है सही कारण।

तुमने किसी भी दिन पीपल और बरगद के पौधे लगाए हैं?
या किसी को लगाते हुए देखा है?
क्या पीपल या बड़ के बीज मिलते हैं?
इसका जवाब है ना.. नहीं….
बरगद या पीपल की कलम जितनी चाहे उतनी रोपने की कोशिश करो परंतु नहीं लगेगी।
कारण प्रकृति/कुदरत ने यह दोनों उपयोगी वृक्षों को लगाने के लिए अलग ही व्यवस्था कर रखी है।
यह दोनों वृक्षों के टेटे कौवे खाते हैं और उनके पेट में ही बीज की processing होती है और तब जाकर बीज उगने लायक होते हैं। उसके पश्चात
कौवे जहां-जहां बीट करते हैं, वहां वहां पर यह दोनों वृक्ष उगते हैं।
पीपल जगत का एकमात्र ऐसा वृक्ष है जो round-the-clock ऑक्सीजन O2 छोड़ता है और बरगद के औषधि गुण अपरम्पार है।
देखो अगर यह दोनों वृक्षों को उगाना है तो बिना कौवे की मदद से संभव नहीं है इसलिए कौवे को बचाना पड़ेगा।
और यह होगा कैसे?
मादा कौआ भादो महीने में अंडा देती है और नवजात बच्चा पैदा होता है।
तो इस नयी पीढ़ी के उपयोगी पक्षी को पौष्टिक और भरपूर आहार मिलना जरूरी है इसलिए ऋषि मुनियों ने
कौवों के नवजात बच्चों के लिए हर छत पर श्राघ्द के रूप मे पौष्टिक आहार
की व्यवस्था कर दी।
जिससे कि कौवों की नई जनरेशन का पालन पोषण हो जाये……

इसलिए दिमाग को दौड़ाए बिना श्राघ्द करना प्रकृति के रक्षण के लिए नितांत आवश्यक है।
घ्यान रखना जब भी बरगद और पीपल के पेड़ को देखो तो अपने पूर्वज तो याद आएंगे ही क्योंकि उन्होंने श्राद्ध दिया था इसीलिए यह दोनों उपयोगी पेड़ हम देख रहे हैं।
🙏सनातन धर्म पे उंगली उठाने वालों, पहले सनातन धर्म को जानो फिर उस पर ऊँगली उठाओ।जब आपके विज्ञान भी नहीं था हमारे सनातन धर्म को पता था कि किस बीमारी का इलाज क्या है, कौन सी चीज खाने लायक है कौन सी नहीं…? अथाह ज्ञान का भंडार है हमारा सनातन धर्म और उनके नियम, मैकाले के शिक्षा पद्धति में पढ़ के केवल अपने पूर्वजों, ऋषि मुनियों के नियमों पर ऊँगली उठाने के बजाय , उसकी गहराई को जानिये👍🙏

हमारे पूज्य गुरुदेव के सौजन्य से🙏🏼

सप्तव्यसन (मांसाहार)
part – 2

सात व्यसनों में दूसरे नम्बर का व्यसन है—मांसाहार। यह जहां नैतिकता एवं आध्यात्मिकता का पतन करता है वहीं मानव के अन्दर निर्दयता को पनपाकर उसे पशु से भी निम्न श्रेणी में पहुंचा देता है। मांसाहार से मस्तिष्क की सहनशीलता नष्ट होकर वासना व उत्तेजना वाली प्रवृत्ति बढ़ती है। जब किसी बालक को शुरू से ही मांसाहार कराया जाता है तब वह अपने स्वार्थ के लिए दूसरे जीवों को मारने-कष्ट देने में कभी गलती का अहसास ही नहीं करता है जबकि मानव को स्वभावतः अहिंसक प्राणी माना गया है।
यूं तो प्राचीनकाल से ही शाकाहारी और मांसाहारी दोनों प्रकार के मनुष्य इस धरती पर हुए हैं किन्तु वर्तमान में मांसाहार का जो खुला और वीभत्स रूप हमारे देश में पनप रहा है इसे कलियुग का अभिशाप ही कहना होगा। भारतीय संस्कृति खोखली होकर अपने भाग्य पर आंसू बहाने को मजबूर हो गई है। जहां रक्षक ही भक्षक बना हुआ है अर्थात् सरकार स्वयं पशुओं का मांस निर्यात कर पाश्चात्य देशों की श्रेणी में अपना नाम दर्ज करा रही है तब मानवता भला किसके दरवाजे भीख मांगने जाएगी ? वह कराह-कराह कर एक दिन पंगु हो जाएगी और मानव की शक्ल के पशु देश का राज्य संचालित कर अपनी स्वार्थपूर्ति करके धरती पर ही नरकों के दृश्य उपस्थित कर देंगे।
पुराण ग्रन्थ हमें बताते हैं कि यदि राजा भी मांसाहारी बन गया तो नीतिप्रिय जनता ने उसे राजिंसहासन से अपदस्थ कर जंगल का राजा बना दिया। एक लघु कथानक है—
श्रुतपुर नामक एक नगर में राजा बक राज्य करता था, वह मांसाहारी था, एक दिन उसके रसोइए को किसी कारणवश पशु का मांस न मिला तो उसने एक मरे हुए बालक का मांस पकाकर राजा को खिला दिया। राजा को वह मांस बड़ा स्वादिष्ट लगा अतः उसने रसोइये से प्रतिदिन मनुष्य का ही मांस तैयार करने को कहा। अब रसोइया गांव की गलियों में जाकर रोज बच्चों को मिठाई आदि का प्रलोभन देकर लाने लगा और राजा की भोजनपूर्ति करने लगा। इस तरह नगर में बच्चों की संख्या घटते देख जब पता लगाया तो राजा को जबरदस्ती जंगल में भगा दिया।
किन्तु जंगल में भी वह आते-जाते निरपराधी मनुष्यों को मार-मारकर खाने लगा और वह सचमुच में भेषधारी राक्षस ही बन गया था। गांव वालों ने पुनः इस पर विचार करके प्रतिदिन एक-एक मनुष्य को बक राक्षस के भोजन हेतु भेजना स्वीकार किया। फिर एक बार पांचों पांडव सहित माता कुन्ती वनवास के मध्य उस नगर में आए। वे लोग एक वैश्य के घर में ठहर गए, संध्या होते ही घर की स्त्री जोर-जोर से रोने लगी। कुन्ती के पूछने पर उसने सारा वृत्तान्त सुनाते हुए कहा कि कल प्रातः मेरा पुत्र उस राक्षस का भोजन बनकर जाएगा। अपने इकलौते पुत्र को मरने हेतु भेजने के नाम से ही मेरा कलेजा फटा जा रहा है।
एक माँ की करुण व्यथा कुन्ती को समझते देर न लगी और उसने उसे सांत्वना देते हुए कहा कि तुम्हारे पुत्र की जगह कल मेरा भीम उस राक्षस के पास जाएगा और उसे समाप्त कर समस्त ग्रामवासियों को भयमुक्त करेगा। पुनः कुन्ती ने भीम को सारी बात बताई और अगले दिन उसे बक राक्षस के पास भेज दिया। वहां पहुंचकर भीम ने अपने बाहुबल से राक्षस को समाप्त कर दिया तथा समस्त नगरवासियों के समक्ष वीरत्व दिखाया।
इस प्रकार से उस नरभक्षी राक्षस का आतंक नगर से दूर हो गया और वे लोग सुखपूर्वक रहने लगे। देखो! मांसाहार करने वाला राजा भी राक्षस बन गया एवं जिह्वालोलुपता के कारण उसे कितना दुःख, अपमान सहना पड़ा।
वर्तमान में मांसाहार आधुनिक फैशन का एक अंग-सा बन गया है अतः मांसाहारियों को दूसरों के सुख-दुख का कोई अनुभव ही नहीं होता है। प्रकृति ने हमें इतनी सारी सब्जियां, अनाज, फल, मेवा प्रदान किए हैं कि मांसाहार के लिए कोई गुंजाइश ही नहीं रह जाती है फिर भी न जाने क्यों मानव मांसाहार की ओर बढ़ रहा है ? मांसाहार के त्यागने में केवल मन के दृढ़ निश्चय की आवश्यकता है। इसको छोड़ने में कोई भी असुविधा नहीं होती है प्रत्युत् छोड़ने वालों को मानसिक शान्ति का ही अनुभव होता है। नित्यप्रति मांसाहार करने वालों ने भी एक क्षण के सत्संग से जीवन भर के लिए मांसाहार का त्याग किया है। इसके जीवन्त उदाहरण प्रत्यक्ष में देखे जाते हैं।
वर्तमान वैज्ञानिक युग में मानव भौतिक पदार्थों की चकाचौंध में फंसकर सामाजिक, आर्थिक, नैतिक जीवन मूल्यों में परिवर्तन करता जा रहा है। अहिंसा को मानने वाले भी आज अपने आपको दूसरों से कुछ पृथक् सा दिखाने के लिए प्रयासरत रहते हैं और इसी होड़ में वे विवाह, जन्मदिन आदि की पार्टियो में ऐसे कुछ खाद्य पदार्थ बनवाते हैं जिनसे मांसाहार का दोष लगता है। आपको ज्ञान कराने के लिए ऐसे ही कुछ खाद्य पदार्थ जो मांसाहारियों की नकल करके बनाए जा रहे हैं यहाँ प्रस्तुत किये जा रहे हैं। शाकाहारी नर—नारी इन पर ध्यान दें और संकल्पी हिंसा के पाप से अपने का बचाएं। जैसे—
शाकाहारी अण्डे—मावे (खोये) को भूनकर हल्का पीला रंग लगाकर पीला कर लेते हैं तथा गोल करके चारों ओर मावे की सफेत पर्त चढ़ाकर तथा तलकर चाशनी में पका लेते हैं। खाते समय अण्डे के स्वाद का आभास करते हैं। यह है अहिंसक धर्मावलम्बियों का शाकाहारी अण्डा जो राजा यशोधर के द्वारा किये गए आटे के मुर्गे की बलि के समान ही संकल्पी हिन्सा है।
इसी प्रकार शाकाहारी सींक कबाब, शाकाहारी मुर्गा आदि अनेक भोज्य पदार्थ शाकाहारी वस्तुओं से तैयार करने पर भी मांसाहार का दोष उत्पन्न कराते हैं इसलिए अहिंसक समाज को अपने बच्चों में भी संकल्पी हिन्सा के त्याग के संस्कार डालकर उन्हें इस पाप से दूर रखना चाहिए, फलों से बनने वाली सलाद और बर्थडे केक पर भी कई बार लोग विभिन्न पशुओं की आकृतियाँ बना कर खाते हैं। दीपावली की मिठाइयों में भी पशुओं के आकार बनाने की परम्परा है यह सब संकल्पी हिंसा के द्योतक हैं अतः हिन्साजनित पापों से बचने के लिए इन्हें दूर से ही त्याग कर देना चाहिए।
भारत की इस शस्यश्यामला भूमि के इतिहास को पढ़कर हृदय प्रसन्नता से फूला नहीं समाता परन्तु जब इस देश की वर्तमान दुर्दशा को देखते हैं तो दिल पीड़ा से व्यथित हो उठता है।

हमारे पूज्य गुरुदेव के सौजन्य से🙏🏼

कुछ कहानी हटके हैं👍👍👍Must read
Team_work
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कछुआ और खरगोश कहानी एक नये अन्दाज़ में – वो कहानी जो आपने नहीं सुनी…..

एक बार खरगोश को अपनी तेज चाल पर घमंड हो गया और वो जो मिलता उसे रेस लगाने के लिए challenge करता रहता।

कछुए ने उसकी चुनौती स्वीकार कर ली।

रेस हुई। खरगोश तेजी से भागा और काफी आगे जाने पर पीछे मुड़ कर देखा, कछुआ कहीं आता नज़र नहीं आया, उसने मन ही मन सोचा कछुए को तो यहाँ तक आने में बहुत समय लगेगा, चलो थोड़ी देर आराम कर लेते हैं, और वह एक पेड़ के नीचे लेट गया। लेटे-लेटे कब उसकी आँख लग गयी पता ही नहीं चला।

उधर कछुआ धीरे-धीरे मगर लगातार चलता रहा। बहुत देर बाद जब खरगोश की आँख खुली तो कछुआ फिनिशिंग लाइन तक पहुँचने वाला था। खरगोश तेजी से भागा, लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी और कछुआ रेस जीत गया।

Moral of the story: Slow and steady wins the race. धीमा और लगातार चलने वाला रेस जीतता है।

ये कहानी तो हम सब जानते हैं, अब आगे की कहानी देखते हैं:

रेस हारने के बाद खरगोश निराश हो जाता है, वो अपनी हार पर चिंतन करता है और उसे समझ आता है कि वो over-confident होने के कारण ये रेस हार गया…उसे अपनी मंजिल तक पहुँच कर ही रुकना चाहिए था।

अगले दिन वो फिर से कछुए को दौड़ की चुनौती देता है। कछुआ पहली रेस जीत कर आत्मविश्वाश से भरा होता है और तुरंत मान जाता है।

रेस होती है, इस बार खरगोश बिना रुके अंत तक दौड़ता जाता है, और कछुए को एक बहुत बड़े अंतर से हराता है।

Moral of the story: Fast and consistent will always beat the slow and steady. / तेज और लगातार चलने वाला धीमे और लगातार चलने वाले से हमेशा जीत जाता है।

यानि slow and steady होना अच्छा है लेकिन fast and consistent होना और भी अच्छा है।

For example, अगर किसी ऑफिस में इन दो टाइप्स के लोग हैं तो वे ज्यादा तेजी से आगे बढ़ते हैं जो fast भी हैं और अपने फील्ड में consistent भी हैं।

कहानी अभी बाकी है ……………… .

इस बार कछुआ कुछ सोच-विचार करता है और उसे ये बात समझ आती है कि जिस तरह से अभी रेस हो रही है वो कभी-भी इसे जीत नहीं सकता।

वो एक बार फिर खरगोश को एक नयी रेस के लिए चैलेंज करता है, पर इस बार वो रेस का रूट अपने मुताबिक रखने को कहता है। खरगोश तैयार हो जाता है।

रेस शुरू होती है। खरगोश तेजी से तय स्थान की और भागता है, पर उस रास्ते में एक तेज धार नदी बह रही होती है, बेचारे खरगोश को वहीँ रुकना पड़ता है। कछुआ धीरे-धीरे चलता हुआ वहां पहुँचता है, आराम से नदी पार करता है और लक्ष्य तक पहुँच कर रेस जीत जाता है।

Moral of the story:
Know your core competencies and do home work accordingly to succeed. पहले अपनी strengths को जानो और उसके मुताबिक काम करो जीत ज़रुर मिलेगी।

For Ex: अगर आप एक अच्छे वक्ता हैं तो आपको आगे बढ़कर ऐसे अवसरों को लेना चाहिए जहाँ public speaking का मौका मिले। ऐसा करके आप अपनी organization में तेजी से ग्रो कर सकते हैं।

कहानी अभी भी बाकी है ……………….

इतनी रेस करने के बाद अब कछुआ और खरगोश अच्छे दोस्त बन गए थे और एक दुसरे की ताकत और कमजोरी समझने लगे थे। दोनों ने मिलकर विचार किया कि अगर हम एक दुसरे का साथ दें तो कोई भी रेस आसानी से जीत सकते हैं।

इसलिए दोनों ने आखिरी रेस एक बार फिर से मिलकर दौड़ने का फैसला किया, पर इस बार as a competitor नहीं बल्कि as a team काम करने का निश्चय लिया।

दोनों स्टार्टिंग लाइन पे खड़े हो गए….get set go…. और तुरंत ही खरगोश ने कछुए को ऊपर उठा लिया और तेजी से दौड़ने लगा। दोनों जल्द ही नहीं के किनारे पहुँच गए। अब कछुए की बारी थी, कछुए ने खरगोश को अपनी पीठ बैठाया और दोनों आराम से नदी पार कर गए। अब एक बार फिर खरगोश कछुए को उठा फिनिशिंग लाइन की ओर दौड़ पड़ा और दोनों ने साथ मिलकर रिकॉर्ड टाइम में रेस पूरी कर ली। दोनों बहुत ही खुश और संतुष्ट थे, आज से पहले कोई रेस जीत कर उन्हें इतनी ख़ुशी नहीं मिली थी।

Moral of the story: Team Work is always better than individual performance. / टीम वर्क हमेशा व्यक्तिगत प्रदर्शन से बेहतर होता है।

Individually चाहे आप जितने बड़े performer हों लेकिन अकेले दम पर हर मैच नहीं जीता सकते।

अगर लगातार जीतना है तो आपको टीम में काम करना सीखना होगा, आपको अपनी काबिलियत के आलावा दूसरों की ताकत को भी समझना होगा। और जब जैसी situation हो, उसके हिसाब से टीम की strengths को use करना होगा।

यहाँ एक बात और ध्यान देने वाली है। खरगोश और कछुआ दोनों ही अपनी हार के बाद निराश हो कर बैठ नहीं गए, बल्कि उन्होंने स्थिति को समझने की कोशिश की और अपने आप को नयी चुनौती के लिए तैयार किया। जहाँ खरगोश ने अपनी हार के बाद और अधिक मेहनत की वहीँ कछुए ने अपनी हार को जीत में बदलने के लिए अपनी strategy में बदलाव किया।

जब कभी आप फेल हों तो या तो अधिक मेहनत करें या अपनी रणनीति में बदलाव लाएं या दोनों ही करें, पर कभी भी हार को आखिरी मान कर निराश न हों…बड़ी से बड़ी हार के बाद भी जीत हासिल की जा सकती है!

हमारे पूज्य गुरुदेव के सौजन्य से🙏

हिंदुओं के श्राद्ध (पितृपक्ष) मनाने के पीछे बहुत महत्वपूर्ण वैज्ञानिक कारण हैं…
क्यों हमारे पूर्वज पितृपक्ष मे कौवों के लिए खीर बनाने को कहते थे ?
क्यों पीपल ओर बरगद को सनातन धर्म मे पूर्वजों की संज्ञा दी गई है..?

इन सब प्रश्नों का उत्तर बड़ा रोचक और वैज्ञानिक है, हम स्पष्ट कर दें कि श्राद्ध के नाम पर चल रही ढकोसलेबाजी(अनर्गल चढ़ावे, धर्म के नाम का सहारा लेकर अनायास लूट, कई अन्य अंधविश्वास) का हम बिल्कुल समर्थन नहीं करते, ना ही ऐसा कोई तर्क देते हैं कि आप यहां कौवों को तर्पण देंगे और वो वहां आपके पूर्वजों को प्राप्त होगा.. क्योंकि ये सब धर्म, शास्त्र, श्रीमद्भगवद्गीता और विज्ञान के विरुद्ध बातें मानी गई हैं, जो सेवा आप अपने माता-पिता, सास-ससुर, दादा-दादी की जीते जी कर सकते हैं वह कभी भी मृत्यु उपरांत नहीं कर पाएंगे

अब बात करते हैं अपनी सर्वश्रेष्ठ सनातन परंपरा की वैज्ञानिकता की…
आपने किस दिन पीपल और बरगद के पौधे लगाए हैं..?
या कभी किसी को उनका बीज बोते हुए देखा है..?
क्या पीपल या बरगद के बीज मिलते हैं..?
इसका स्पष्ट जवाब है…… “नहीं”
बरगद या पीपल की कलम जितनी चाहे उतनी रोपने की कोशिश करो परंतु नहीं लगेगी।
कारण प्रकृति/कुदरत ने इन दोनों उपयोगी वृक्षों को लगाने के लिए अलग ही व्यवस्था कर रखी है।
इन दोनों वृक्षों के फल कौवे खाते हैं और उनके पेट में ही बीज की प्रोसेसिंग होती है और तब जाकर बीज उगने लायक हो पाते हैं…
उसके पश्चात कौवे जहां-जहां बींट करते हैं, वहां वहां पर ये दोनों वृक्ष उगते हैं।
पीपल जगत का एकमात्र ऐसा वृक्ष है जो round-the-clock ऑक्सीजन छोड़ता है और बरगद के औषधीय गुण अपरम्पार है।
देखो अगर इन दोनों वृक्षों को उगाना है तो बिना कौवे की मदद के संभव नहीं है… इसलिए कौवों को बचाना पड़ेगा…
और ये होगा कैसे ?
मादा कौआ भादो(भाद्रपद) महीने में अंडे देती है और नवजात बच्चा पैदा होता है,
तो इस नयी पीढ़ी के बहुपयोगी पक्षी को पौष्टिक और भरपूर आहार मिलना जरूरी है इसलिए हमारे वैज्ञानिक ऋषि-मुनियों ने
कौवों के नवजात बच्चों के लिए हर छत पर श्राद्ध के रूप मे पौष्टिक आहार की व्यवस्था कर दी जिससे कि कौवों के नवजात बच्चों का पालन पोषण हो जाये….

इसीलिए हमारा यह पर्व भी संपूर्ण वैज्ञानिक, प्रकृति अनुकूल, और हमारे महान पूर्वजों के पुण्य कर्मों को स्मरण करने के निमित्त एक बहुमूल्य आयोजन है

सत्य सनातन 🚩 हर हर महादेव 🚩 जय श्री राम

हमारे पूज्य गुरुदेव के सौजन्य से🙏🏼

एक आदमी ने एक पेंटर को बुलाया और अपनी नाव दिखाकर कहा कि इसको पेंट कर दो !

पेंटर ने उस नाव को लाल रंग से पेंट कर दिया जैसा कि नाव का मालिक चाहता था।
फिर पेंटर ने अपने पैसे लिए और चला गया !

अगले दिन, पेंटर के घर पर वह नाव का मालिक पहुँचा और उसने एक बहुत बड़ी धनराशि का चेक उस पेंटर को दिया!

पेंटर भौंचक्का हो गया और पूछा – ये इतने सारे पैसे किस बात के हैं ?
मेरे पैसे तो आपने कल ही दे दिया थे !

मालिक ने कहा – भाई, ये पेंट का पैसा नहीं है, बल्कि ये उस नाव में जो “छेद” था, उसको रिपेयर करने का पैसा है !

पेंटर ने कहा – अरे साहब, वो तो एक छोटा सा छेद था, सो मैंने बंद कर दिया था। उस छोटे से छेद के लिए इतना पैसा मुझे ठीक नहीं लग रहा है !

मालिक ने कहा – दोस्त, तुम्हें पूरी बात पता नहीं !अच्छा में विस्तार से बताता हूँ। जब मैंने तुम्हें पेंट के लिए कहा तो जल्दबाजी में, मैं तुम्हें ये बताना भूल गया कि नाव में एक छेद भी है उसको रिपेयर कर देना !

और जब पेंट सूख गया, तो मेरे दोनों बच्चे उस नाव को लेकर समुद्र में नौकायन के लिए निकल गए !

मैं उस वक़्त घर पर नहीं था, लेकिन जब लौट कर आया और अपनी पत्नी से ये सुना कि बच्चे नाव को लेकर नौकायन पर निकल गए हैं ! तो मैं बदहवास हो गया। क्योंकि मुझे याद आया कि नाव में तो छेद है !

मैं गिरता पड़ता भागा उस तरफ, जिधर मेरे प्यारे बच्चे गए थे।
लेकिन थोड़ी दूर पर मुझे मेरे बच्चे दिख गए, जो सकुशल वापस आ रहे थे !

अब मेरी ख़ुशी और प्रसन्नता का आलम तुम समझ सकते हो !

फिर मैंने छेद चेक किया तो पता चला कि मुझे बिना बताये तुम उसको रिपेयर कर चुके हो !

तो मेरे दोस्त उस महान कार्य के लिए तो ये पैसे भी बहुत थोड़े हैं !

मेरी औकात नहीं कि उस कार्य के बदले तुम्हें ठीक ठाक पैसे दे पाऊं !

जीवन में “भलाई का कार्य” जब मौका लगे हमेशा कर देना चाहिए, भले ही वो बहुत छोटा सा कार्य ही क्यों न हो !

क्योंकि कभी कभी वो छोटा सा कार्य भी किसी के लिए बहुत अमूल्य हो सकता है।

सभी मित्रों को जिन्होंने ‘हमारी जिन्दगी की नाव’ कभी भी रिपेयर की है उन्हें हार्दिक धन्यवाद …..

और हम सब सदैव प्रयत्नशील रहें कि हम सभी किसी की नाव रिपेयरिंग करने के लिए हमेशा तत्पर रहें …

🙏🙏🏼

किसी दिन सुबह उठकर एक बार इसका जायज़ा लीजियेगा कि कितने घरों में अगली पीढ़ी के बच्चे रह रहे हैं ? कितने बाहर निकलकर नोएडा, गुड़गांव, पूना, बेंगलुरु, चंडीगढ़,बॉम्बे, कलकत्ता, मद्रास, हैदराबाद, बड़ौदा जैसे बड़े शहरों में जाकर बस गये हैं?
कल आप एक बार उन गली मोहल्लों से पैदल निकलिएगा जहां से आप बचपन में स्कूल जाते समय या दोस्तों के संग मस्ती करते हुए निकलते थे।
तिरछी नज़रों से झांकिए.. हर घर की ओर आपको एक चुपचाप सी सुनसानियत मिलेगी, न कोई आवाज़, न बच्चों का शोर, बस किसी किसी घर के बाहर या खिड़की में आते जाते लोगों को ताकते बूढ़े जरूर मिल जायेंगे।
आखिर इन सूने होते घरों और खाली होते मुहल्लों के कारण क्या हैं ?
भौतिकवादी युग में हर व्यक्ति चाहता है कि उसके एक बच्चा और ज्यादा से ज्यादा दो बच्चे हों और बेहतर से बेहतर पढ़ें लिखें। उनको लगता है या फिर दूसरे लोग उसको ऐसा महसूस कराने लगते हैं कि छोटे शहर या कस्बे में पढ़ने से उनके बच्चे का कैरियर खराब हो जायेगा या फिर बच्चा बिगड़ जायेगा। बस यहीं से बच्चे निकल जाते हैं बड़े शहरों के होस्टलों में। अब भले ही दिल्ली और उस छोटे शहर में उसी क्लास का सिलेबस और किताबें वही हों मगर मानसिक दबाव सा आ जाता है बड़े शहर में पढ़ने भेजने का।
हालांकि इतना बाहर भेजने पर भी मुश्किल से 1% बच्चे IIT, PMT या CLAT वगैरह में निकाल पाते हैं…। फिर वही मां बाप बाकी बच्चों का पेमेंट सीट पर इंजीनियरिंग, मेडिकल या फिर बिज़नेस मैनेजमेंट में दाखिला कराते हैं। 4 साल बाहर पढ़ते पढ़ते बच्चे बड़े शहरों के माहौल में रच बस जाते हैं। फिर वहीं नौकरी ढूंढ लेते हैं । सहपाठियों से शादी भी कर लेते हैं।आपको तो शादी के लिए हां करना ही है ,अपनी इज्जत बचानी है तो, अन्यथा शादी वह करेंगे ही अपने इच्छित साथी से। अब त्यौहारों पर घर आते हैं माँ बाप के पास सिर्फ रस्म अदायगी हेतु। माँ बाप भी सभी को अपने बच्चों के बारे में गर्व से बताते हैं । दो तीन साल तक उनके पैकेज के बारे में बताते हैं। एक साल, दो साल, कुछ साल बीत गये । मां बाप बूढ़े हो रहे हैं । बच्चों ने लोन लेकर बड़े शहरों में फ्लैट ले लिये हैं।
अब अपना फ्लैट है तो त्योहारों पर भी जाना बंद।
अब तो कोई जरूरी शादी ब्याह में ही आते जाते हैं। अब शादी ब्याह तो बेंकट हाल में होते हैं तो मुहल्ले में और घर जाने की भी ज्यादा जरूरत नहीं पड़ती है। होटल में ही रह लेते हैं। हाँ शादी ब्याह में कोई मुहल्ले वाला पूछ भी ले कि भाई अब कम आते जाते हो तो छोटे शहर, छोटे माहौल और बच्चों की पढ़ाई का उलाहना देकर बोल देते हैं कि अब यहां रखा ही क्या है?
खैर, बेटे बहुओं के साथ फ्लैट में शहर में रहने लगे हैं । अब फ्लैट में तो इतनी जगह होती नहीं कि बूढ़े खांसते बीमार माँ बाप को साथ में रखा जाये। बेचारे पड़े रहते हैं अपने बनाये या पैतृक मकानों में।
कोई बच्चा बागवान पिक्चर की तरह मां बाप को आधा – आधा रखने को भी तैयार नहीं। अब साहब, घर खाली खाली, मकान खाली खाली और धीरे धीरे मुहल्ला खाली हो रहा है। अब ऐसे में छोटे शहरों में कुकुरमुत्तों की तरह उग आये “प्रॉपर्टी डीलरों” की गिद्ध जैसी निगाह इन खाली होते मकानों पर पड़ती है । वो इन बच्चों को घुमा फिरा कर उनके मकान के रेट समझाने शुरू करते हैं । उनको गणित समझाते हैं कि कैसे घर बेचकर फ्लैट का लोन खत्म किया जा सकता है । एक प्लाट भी लिया जा सकता है। साथ ही ये किसी बड़े लाला को इन खाली होते मकानों में मार्केट और गोदामों का सुनहरा भविष्य दिखाने लगते हैं।
बाबू जी और अम्मा जी को भी बेटे बहू के साथ बड़े शहर में रहकर आराम से मज़ा लेने के सपने दिखाकर मकान बेचने को तैयार कर लेते हैं।
आप स्वयं खुद अपने ऐसे पड़ोसी के मकान पर नज़र रखते हैं । खरीद कर डाल देते हैं कि कब मार्केट बनाएंगे या गोदाम, जबकि आपका खुद का बेटा छोड़कर पूना की IT कंपनी में काम कर रहा है इसलिए आप खुद भी इसमें नहीं बस पायेंगे।
हर दूसरा घर, हर तीसरा परिवार सभी के बच्चे बाहर निकल गये हैं।
वही बड़े शहर में मकान ले लिया है, बच्चे पढ़ रहे हैं,अब वो वापस नहीं आयेंगे। छोटे शहर में रखा ही क्या है । इंग्लिश मीडियम स्कूल नहीं है, हॉबी क्लासेज नहीं है, IIT/PMT की कोचिंग नहीं है, मॉल नहीं है, माहौल नहीं है, कुछ नहीं है साहब, आखिर इनके बिना जीवन कैसे चलेगा?
पर कभी UPSC ,CIVIL SERVICES का रिजल्ट उठा कर देखियेगा, सबसे ज्यादा लोग ऐसे छोटे शहरों से ही मिलेंगे। बस मन का वहम है। मेरे जैसे लोगों के मन के किसी कोने में होता है कि भले ही बेटा कहीं फ्लैट खरीद ले, मगर रहे अपने उसी छोटे शहर या गांव में अपने लोगों के बीच में । पर जैसे ही मन की बात रखते हैं, बुद्धिजीवी अभिजात्य पड़ोसी समझाने आ जाते है कि “अरे पागल हो गये हो, यहाँ बसोगे, यहां क्या रखा है?”
वो भी गिद्ध की तरह मकान बिकने का इंतज़ार करते हैं, बस सीधे कह नहीं सकते।

अब ये मॉल, ये बड़े स्कूल, ये बड़े टॉवर वाले मकान सिर्फ इनसे तो ज़िन्दगी नहीं चलती। एक वक्त बुढ़ापा ऐसा आता है जब आपको अपनों की ज़रूरत होती है।

ये अपने आपको छोटे शहरों या गांवों में मिल सकते हैं, फ्लैटों की रेजीडेंट वेलफेयर एसोसिएशन में नहीं।
कोलकाता, दिल्ली, मुंबई,पुणे,चंडीगढ़,नौएडा, गुड़गांव, बेंगलुरु में देखा है कि वहां शव यात्रा चार कंधों पर नहीं बल्कि एक खुली गाड़ी में पीछे शीशे की केबिन में जाती है, सीधे शमशान, एक दो रिश्तेदार बस और सब खत्म।
भाईसाब ये खाली होते मकान, ये सूने होते मुहल्ले, इन्हें सिर्फ प्रोपेर्टी की नज़र से मत देखिए, बल्कि जीवन की खोती जीवंतता की नज़र से देखिए। आप पड़ोसी विहीन हो रहे हैं। आप वीरान हो रहे हैं। आज गांव सूने हो चुके हैं
शहर कराह रहे हैं |
सूने घर आज भी राह देखते हैं.. बंद दरवाजे बुलाते हैं पर कोई नहीं आता |
भूपेन हजारिका का यह गीत याद आता है–
गली के मोड़ पे.. सूना सा कोई दरवाजा
तरसती आंखों से रस्ता किसी का देखेगा
निगाह दूर तलक.. जा के लौट आयेगी
करोगे याद तो हर बात याद आयेगी ||
सब
समझाइए, बसाइए लोगों को छोटे शहरों और जन्मस्थानों के प्रति मोह जगाइए, प्रेम जगाइए। पढ़ने वाले तो सब जगह पढ़ लेते हैं।

हमारे पूज्य गुरुदेव के सौजन्य से🙏

श्रीगुरू:शरणम् आज आदमी ने बाहरी तौर पर बहुत बड़ी-बड़ी शिक्षाएं ग्रहण कर ली हैं। इसलिए वह बहुत ऊँचा तर्कवादी बन गया है। हर बात के पीछे क्यों लगा देना यह तर्कवाद ही तो है। तर्क से किसी को निरुत्तर तो किया जा सकता है मगर तर्क कभी भी किसी प्रश्न का उत्तर नही बन सकता है। सत्य को देखने की अलग अलग दृष्टियाँ हैं। इसलिए अपने को तर्कों में न उलझाकर सत्य को स्वीकार कर लेना ज्यादा श्रेष्ठ है। तर्क करने की अपेक्षा जिज्ञासा करना ज्यादा श्रेष्ठ है। तर्क मतलब आप गलत में सही और जिज्ञासा मतलब दूसरे के सत्य को जानने की इच्छा। जीवन में कई विवादों की वजह केवल और केवल तर्क है। तर्क का रास्ता नर्क की ओर जाता है और समर्पण का स्वर्ग की ओर। अन्याय, अत्याचार और अनीति से लड़ना भगवान श्री कृष्ण के जीवन से सीखें। आदमी सबका विरोध करता है मगर दो जगहों पर यह विरोध का सामर्थ्य खो बैठता है। पहला जब विरोध अपनों का करना पड़े और दूसरा जब विरोध किसी सामर्थ्यवान, शक्तिवान का करना पड़े। श्री कृष्ण का जीवन तो देखिये। उन्होंने अनीति के खिलाफ सबसे अधिक अपनों का और सर्व सामर्थ्यवानों का ही विरोध किया। सात वर्ष की आयु में इन्द्र को ही चुनौती दे डाली और उसके व्यर्थाभिमान का नाश किया। अपने ही कुल के लोग जब कुमार्ग पर चलने लगे तो बिना किसी संकोच व मोह के उनका परित्याग कर दिया। अत: अन्याय, अत्याचार और अनीति का विरोध ही श्री कृष्ण की सच्चा अनुसरण होगा। अन्याय का विरोध करना ही होगा, चाहे सामने कोई अपना हो अथवा कोई साधन संपन्न ही क्यों न हो।

जे गुर चरण रेनु सिर धरही।
ते जनु सकल बिभव बस करही।।
मोहि सम यहु अनुभयेऊ न दूजे।
सबु पायऊ रज पावनि पूजे।।

सीताराम चरण रति मोरे।
अनुदिन बढ़ऊ अनुग्रह तोरे।।

श्री सदगुरुदेव भगवान की‌ जय हो। 🙏🙏

श्री सीताराम जी महाराज की‌ जय हो। 🙏🙏

श्री कनक भवन में शुशोभित बिहारी बिहारिणी जू सरकार की‌* जय हो। 🙏🙏