पहली नौकरी💐

कहते हैं कि पहली नौकरी और पहला प्यार इंसान जिंदगी भर याद रखता है। 1985 की बात होगी,मुंगेर मे वकील का पेशा रास नहीं आया ।सिविल सेवा और अन्य प्रतियोगिता परीक्षा की तैयारी हेतु पटना पहुंचा।पटना में दीदीया, जीजाजी के फ्लैट मे टिका।माँ,पापाजी हमे बोरिंग रोड बडका बाबू (स्व.सर्वेश्वर प्रसाद ,”जनक” भूतपूर्व आयकर आयुक्त)के यहां ले गये । प्यारू भैया (डा.प्रोफेसर बालगंगाधर प्रसाद) के मित्र विनय कंठ साहब राजेंद्र नगर मे East &West कोचिंग संस्थान का संचालन करते थे ।प्यारू भैया ने उनके नाम की चिट्ठी हमें सौंप दी।हमारा दाखिला उस कोचिंग संस्थान में हो गया।उस कोचिंग संस्थान में हमारे कुछ मित्रों के नाम जो संस्मरण मे है, वे,सदय,शिवेंदु जयपुरियार ,विकास ठाकुर आदि।हमलोग कंठ सर की प्रतिभा से अभिभूत थे ।उनके व्यक्तित्व, उनके व्यवहार ,उनकी विद्वता ,उनके अनुशासन, उनकी कर्मठता, उनके स्नेह से।आज भी उनकी याद आती है तो उनका सौम्य मुस्कुराता हुआ चेहरा हमारे आँखों के सामने आ जाता है।वे गणित के शिक्षक थे पर प्रायः हर विषय पर उनकी पकड थी।

कुछ ऐसे सगे-सम्बन्धी मिले जो बार बार कहते थे कि सरकारी नौकरी प्रतियोगिता परीक्षा मे सफल होने के लिए कम-से-कम दस वर्ष चाहिए।हौसला डिगा हुआ था ।रात में सोते समय आँखें बंद होते ही खुद से प्रश्न करने लगता कि यदि सफल नहीं हुआ तो मेरा क्या होगा?परिवार की उम्मीदों का क्या होगा?यही सोच-सोचकर एक अन्जाम आशंका से कभी -कभार आंखों में पानी आ जाता।

पटना आने पर 1985 के जुलाई-अगस्त महीने में खुशखबरी मिली की अपनी जिंदगी के प्रथम प्रतियोगिता परीक्षा बिहार राज्य अवर सेवा चयन पर्षद द्वारा आयोजित परीक्षा मे उतीर्ण हो गया ।पर उसका नियुक्ति पत्र नहीं मिला।हमारी पढाई जारी रही ।इसी समय बिहार लोक सेवा आयोग, पटना द्वारा अपने कार्यालय के रिक्तियों के लिए परीक्षा आयोजित की गयी ।हमारी तैयारी इतनी थी कि हमें उस परीक्षा में सर्वोच्च स्थान प्राप्त हुआ और हमें तुरंत नियुक्ति पत्र दे दिया गया।कार्यालय मे अच्छा माहौल था।हमारे साथ योगदान करने वाले अच्छे मित्र अनिल, शमीम, सुरेश दास थे।हमारे पहले Section Officer तारकेश्वर प्रसाद(तारा बाबू)थे ।

हमारे यहां आज भी कुछ लोगों की मानसिकता है कि हर बात को अपनी स्वार्थ की नजरों से देखते हैं।सिर्फ अपनी जातियों के लोगों का स्वार्थ मे समर्थन करना और दूसरे कमजोर जाति के लोगों को परेशान करना एक प्रचलन है।इस तरह की भेदभाव की मानसिकता आज भी विद्दमान है जिसे महसूस कर मन खराब हो जाता है।

कार्यालय मे दोपहर को अपने जगह पर नाश्ता कर रहा था कि एक सज्जन हमारे टेबल के करीब आये ।उन्हें मैं पहचानता नहीं था ।उन्होंने पाकेट से शराब का बोतल निकाल कर शराब हमारे गिलास मे डालकर खडे -खडे पीने लगे ।हमारे द्वारा विरोध करने पर गुस्से में बरसने लगे और कमर से तमंचे निकाल लिए ।सहकर्मियों के बीच बचाव करके घर भेज दिया गया।बाद मे पता चला कि वे उस कार्यालय के पुराने कर्मचारी थे।इस घटनाक्रम ने कार्यालय के पूरे माहौल की पोल खोल दी ।आयोग के तत्कालीन माननीय अध्यक्ष A.K.M.Hasan साहब का भी ध्यान इस ओर गया ।हालांकि उक्त शराबी कर्मचारी जिनका नाम हमें स्मरण नहीं हो रहा है को पहले भी कई बार दंडित किया जा चुका था।

उक्त कार्यालय का एक रोचक वाक्या हमें याद है।हमारे कायस्थ जाति मे एक कहावत है कि “नौकरी नहीं तो छोकरी नहीं”अर्थात जब तक लडके को नौकरी नहीं मिलेगी तब तक शादी के.लिए रिश्ता नहीं आयेगा।उस कार्यालय मे योगदान करते ही रिश्तों की लाइन लग गयी ।कुछ लोग तो सीधे हमारे सम्पर्क मे आये।हमारा सीधा सा उत्तर होता कि हमारे माता पिता अभिभावक से सम्पर्क करें।एक सज्जन कुछ ज्यादा व्याकुल थे।उन्होंने ने कहा कि शादी आपको करनी है या आपके अभिभावक को ? मै कुछ समय सोचने लगा,फिर जबाब दिया ,सर जी,ऐसी बात है तो शादी आपको करनी है या आपकी लडकी को।यदि आपका सोच ऐसा है तो अपनी लडकी को ही हमसे सम्पर्क करने कहिए।हमलोग बातें कर तय कर लेंगे।बाद मे वे सज्जन फिर नजर नहीं आये।

सचिवालय के लिए नियुक्ति पत्र प्राप्त होते ही हमारे द्वारा लोक सेवा आयोग कार्यालय छोडऩे की इच्छा जाहिर की गयी।हमारे तत्कालीन माननीय अध्यक्ष महोदय नहीं चाहते थे कि मै आयोग कार्यालय छोडू।उन्होंने इसके लिए हमें समझाने का प्रयास किया।

अविनाश, जब इस कार्यालय और सचिवालय का पद,वेतन एक समान है तो आप यह कार्यालय छोडकर सचिवालय क्यूँ जाना चाहते हैं।फिर उन्होंने मजाकिया लहजे मे कहा ,ओ मै समझ गया।आप सचिवालय में ऊपरी कमाई के लिए जा रहे हो।उस समय हमें ज्यादा ज्ञान नहीं था कि तुरंत उनके सवाल का जबाब दे।एक -दो दिनो के बाद सोचकर कहा सर जी।सचिवालय बहुत बडा है, वहां प्रोन्नति के ज्यादा अवसर प्राप्त होंगे।इस जबाब से वे संतुष्ट हुए और सचिवालय योगदान करने की अनुमति दे दी गयी।💐

लाकडाउन💐

पवन एक क्षण विश्राम नहीं ले रहा ,

पक्षियों का झुंड उडा चला जा रहा

नदियों की धारा बहती चली जा रही

बागों मे फूल खिलते चले जा रहे

चाय का दौर चलता जा रहा

किचेन से मसालों. की खूशबू आती जा रही

जिम्मेदारियां थकने नहीं दे रही

ईश्वर सबों के लिए रोटी की व्यवस्था कर रहे

सादे खान-पान पर भी गुजर हो रहा

मित्र,रिश्ते दूर होने के बावजूद प्रेम बढता जा रहा

प्रदूषण कम होता चला जा रहा

स्वच्छता अभियान सफल होता जा रहा

सूकून की पूरी नींद हो रही

खुशियां ही खुशियां बढती जा रही

नकारात्मक सोच डाउन होता जा रहा

लक्ष्मण रेखा की महत्ता बढती जा रही

रहती है लाकडाउन रहती रहे

इंसानों मे प्रेम की गाडी चलती रहे।💐

छोटी-सी भूल 💐

हमारे पापाजी की बदली मुंगेर से संथाल परगना जिले ,(सम्प्रति झारखंड)के पाकुड़ अनुमंडल हो गयी ।हमारा निवास शहर से दूर धनुषपूजा गाँव मे था।निवास के चारों ओर पेडों का बगीचा था।शरीफा ,बेल,आम,इमली ,नीम आदि पेड लगे हुए थे।क्वार्टर के पीछे गिरिजाघर और कब्रगाह भी था।सामने वाली जमीन पर सब्जियां,मूँगफली बोये जाते थे।उस गाँव के ईर्दगिर्द पहाडियों का समूह और उसके बीच छोटी-छोटी नदियां,-झरने होते ।हम सभी मित्रों के साथ छुट्टी के दिन दूर बाहरी इलाके की ओर निकल जाया करते थे ।छोटी-छोटी नदियां बहती ,बगीचे और ढेर सारे खेत ।बगीचे से फल ,खेतों से मटर के दाने या मूँगफली वगैरह निकाल लेते ।तब कोई टोकता नहीं था कि फल क्यूँ तोडे या मटर-मूँगफली क्यूँ ले ली?

क्वार्टर के पीछे छोटी कुइयां थी ।कुइयां की गहराई इतनी थी कि कोई भी झुककर हाथ नीचे लटकाकर पानी निकाल सकता था ।नीचे उतरने के लिए सीढियां भी बनी थी ।गर्मियों मे पानी एकदम कम हो जाता था तब सीढियों का इस्तेमाल किया जा सकता था ।हमलोगों का उसमे उतरकर हाथ से पानी पीना और एक दूसरे पर उछालना अच्छा लगता था ।

होली का दिन था।बच्चों के शैतान टोली की मस्ती के कहने ही क्या ।आपस मे रंग खेलते खेलते जब मन भर जाता तो सडक पर जाकर राहगीरों पर रंग फेंकते ।कुछ बुजुर्ग नाराज हो जाते तो उनकी डाँट से घबराकर पीछे हट जाते ।लेकिन बच्चों की जात जो मना करो वही करते हैं।पुनः दल-बल के साथ पिचकारी लेकर सडक पर पहुंचे ।कोई बुजुर्ग नहीं दिखाई पडे तो शरारतें बढ गई।किसीने सवार सहित ताँगेवाले पर पिचकारी दाग दी ।ताँगे का घोडा बिदक गया ।सवार बाल-बाल बचे। टोपीधारी ताँगेवाला चाबुक लेकर पीछे पडा।सभी भाग निकले ।मै थोडा कमजोर पडा तो ताँगेवाले ने मेरा पीछा किया।मै थोडी दूर भागने के बाद गिर पडा।हमारा ठेहुना बुरी तरह घायल होकर लहूलुहान हो गया।उसी हालत मे घर पहुंचा।पापाजी सत्यनारायण पूजा मे तल्लीन थे।माताजी ने ऊपर से और सुताई कर दी ।कितने महीनों तक लंगडाता रहा ।घाव इतना गहरा था कि इसका दाग अभी भी विद्ममान है और दर्द की याद दिला रहा है।💐

जिला स्कूल, मुंगेर💐

सप्तम वर्ग मे सफलता प्राप्त करने के बाद हमारा प्रवेश जिला स्कूल मे दिला दिया गया।हमारे पूरबसराय क्वार्टर से स्कूल दूर था।इसी समय हमारे पापाजी ने एक भूखंड स्टेशन के समीप खरीदा था।भूखंड के पडोसी उमेश्वर प्रसाद के लडके अजीत (,विजय)भैया से जान-पहचान हुई।चूंकि वे भी जिला स्कूल के ही विद्दार्थी थे,इसलिए हम सामान्यतः उनके साथ ही स्कूल पैदल जाते थे।जिला स्कूल के कुछ मित्रों के नाम अभी भी स्मरण मे है, ब्रह्मदेव मंडल, कमल,नवीन, राजीव, अखिलेश, निरंजन ।इनमे कमल बहुत अच्छा चित्रकार था ।बेकापुर बाजार मे उसकी रेडिमेड इम्पोरियम नामक दूकान थी।उस समय स्कूल के प्रिसिंपल बालगोविंद मिश्र थे।छवि सर ,इत्यादि शिक्षकों के नाम स्मरण मे हैं।स्कूल में हमें Interval मे अच्छे नाश्ता दी जाती थी।प्रत्येक शनिवार को हाल मे चलचित्र दिखाया जाता था।इस स्कूल मे हमे कोई खास उपलब्धि हासिल नहीं हुई।हमारा क्वार्टर वही रहा।हमारे मित्र भानु का प्रवेश किसी अंग्रेजी स्कूल मे हुआ था।हमें याद है कि वह पूरे ड्रेस में टाई लगाकर स्कूल रिक्शा पर सवार होता था।खेलने के नाम पर हम क्वार्टर के सामने वाले मैदान में गुल्ली-डंडा, फुटबॉल ,कबड्डी आदि खेलते थे ।बाद मे क्रिकेट का प्रचलन प्रारंभ हुआ।मै अपनी प्रशस्ति मे यही कह सकता हूँ कि मैने शतरंज को छोडकर किसी खेल मे कोई पुरस्कार अब तक नहीं जीता हूँ।हमारे पडोसी अरूण से प्रायः झगड़ा होता था वह हमसे तगडा था। 💐

शैशवकाल1💐

गिद्धौर से हमारे पापाजी की बदली गोड्डा जिले के गुम्मा शिक्षक प्रशिक्षण महाविद्यालय हो गयी।हमे स्मरण है कि बिहार राज्य परिवहन निगम की लाल बस पर सवार होकर हमलोग सपरिवार चल पडे थे।वैद्यनाथ धाम मे हमें बस बदलनी थी।बस बदलने.के क्रम में कुली ने सामान पटक दिया जिससे झनाक की आवाज के साथ शीशे का सामान चकनाचूर हो गया था।हमलोग. सांयकाल मे गोड्डा बस स्टैंड पहुंचे।वहां से हमलोग बैलगाड़ी पर सवार होकर चले।रास्ते में कई बार बैल बिदक गये ।क्वार्टर तक पंहुचने मे रात हो चुकी थी।पडोसियों ने हमें खाना खिलाया था।वहां हमलोग ज्यादा समय नहीं रहे।इस कारण हमारी स्कूली शिक्षा यहां भी प्रारंभ नहीं हो सकी ।इतना स्मरण है कि वहाँ हाट -बाजार लगता था, जिसमें आवश्यक सामान मिल जातेथे।क्यूंकि यह स्थान शहर से काफी दूर था।यहां से हमारे पापाजी की बदली मुंगेर हो गयी।💐

शैशवकाल💐

मेरा शैशवकाल सामान्य बच्चों -सा रहा होगा।होश सँभालने पर धूँधली -सी स्मृति उभरती है कि यह जगह महुलीगढ ,गिद्धौर का शाही महल था।जिसे राजा शिवदान सिंह चौहान ने अपशकुन मानकर राजकीय प्रशिक्षण महाविद्यालय को भाडे पर देकर छोड दिया था।हमारे पापा जी उसी महाविद्यालय में प्राध्यापक थे।हमलोग सारा परिवार उसी महल के कोने के छोटे से हिस्से में रहते थे।वहाँ का ठीक-ठाक ज्यादा स्मरण नहीं है मुझे।इतना ही याद है कि महल का विशाल दरवाजा था।दरवाजा के सामने विशालकाय बरगद का वृक्ष था।पापाजी अपने ड्यूटी के प्रति समर्पित थे।हम सारे भाई-,बहन माँ से ही चिपके रहते थे। हमारी दादी काफी भक्तिमय स्त्री थीं।पूजा-पाठ के बिना कभी भोजन नहीं करती ,रोज मंदिर जाती और कठिन-से-कठिन ब्रत करती ।बीमार पड जाने पर भी ब्रतो को न छोडती। महुलीगढ की वह हवेली के दो-तीन कमरों मे हमलोग रहते थे।जाडे मे काफी ठंड रहती थी।माँ चूल्हे मे आग जलाकर सेंकती थी।एक बार उनकी साडी मे आग लग गयी थी।हमारे छोटे भैया महाराज के बडे पुत्र कृपाशंकर सिंह के मित्र थे।वे दोनों कहीं घूमने जाते तो मेरी भी इच्छा रहती थी कि मै भी साथ हो लूं,पर छोटे भैया समझा बुझाकर या डाँट कर मुझे घर वापस भेज देते थे। हमारे यहाँ गाय एवं तोता पालतू थे।एक भयानक अँधेरी तूफानी रात मे कोई जंगली जानवर हमारे तोता को पिँजडे समेत लेकर भाग गया था।दूसरे सुबह सामने वाले विशालकाय वृक्ष के तले तोता मृत पाया गया।मुझे पढने -लिखने की प्रवृत्ति शैशवावस्था से ही थी।मुझे इच्छा होती थी कि मै भी अपने बडे भाइयों-बहनों के साथ विद्यालय जाँऊ।इसके लिए खल्ली-छुलाई की परंपरा थी।हमारे बडे भाई-बहन प्रसंडा के स्कूल मे पढते थे।हमारे खल्ली-छुलाई के लिए सरस्वती पूजा का दिन निर्धारित हुआ। माँ हमारी आँखों में मोटा मोटा काजल लगाकर विदूषक जैसेनये कपडे पहनाकर तैयार की थी।हमारी दीदीया मुझे अपनी गोद मे उठाकर स्कूल ले गयी थी।स्कूल मे हमें मास्टर साहब के हवाले कर दिया गया था।सरस्वती माता की प्रतिमा के सामने एक नये स्लेट मे “अ” लिखकर हमारे द्वारा रख दिया गया था।पर ,वहां हमारी पढाई-लिखाई नहीं हुई।मुझे अक्षर ज्ञान कब और कहाँ हुआ, इसका मुझे स्पष्ट स्मरण नहीं है।बस इतना ही याद है कि हमारे घर जब भी माँ के पास महिलाओं का जुटान होता था तो माँ मुझे बुलाकर कोई पुस्तक वाचन करने को कहती थी,और हमें धडाधर पढने मे काफी खुशी होती थी।तब तक मै कुछ समझ नहीं पाता था।किंतु मेरे पढने के पश्चात मेरी प्रशंसा प्रारंभ होती थी कि देखो य छोटा बच्चा बडी कक्षा के पुस्तकें पढ सकता है।💐

हमारे परम् पूज्य गुरू जी का संदेश ःमाता-पिता को दें छह तोहफे।

1.पैर छूकर हर दिवस की शुरुआत ःयदि आपके माता-पिता आपके पास हैं तो आप यह जरूर कर सकते हैं।कुछ लोग इसे दकियानूसी समझते हैं।पर,अपनी अच्छी आदत,संस्कृति को छोडना बुद्धिमानी नहीं है।

2.सप्ताह में एक दिन अपने माता-पिता के साथ कुछ घंटे बातें करने के लिए निर्धारित करें।उनके साथ गपशप करें, उनकी बातें धीरज से सुने और मस्ती भी कर सकते हैं।उनको आपका सानिध्य चाहैिए।और हाँ,इस समय अपना मोबाइल बिल्कुल बंद रखें।

3.हर साल अपने माता-पिता के साथ देश -विदेश उनकी पसंद की जगह एक बार घूमने जरूर जाइए।

4. उनकी पसंद का उपहार उन्हें साल मे कम से कम एक बार सरप्राइज जरूर दीजिए।

5.उन्हें दान -पुण्य करने के लिए फंड,धनराशि सौंप दे।

6.किसी भी परिस्थिति में उनका अनादर ,अपमान करने को न सोंचे।आप उनके विचारों से असहमत हो सकते हैं ।आपको अलग राय रखने का हक है,अनादर कि नहीं।संकल्प लें हर हाल मे उनका मान बनाए रखेंगे।💐

पाठशाला💐

आभ्यासिक मध्य विद्यालय, पूरबसराय मे प्रवेश के कुछ समय के बाद ही मेरी धाक जम गई थी।विद्यालय हमारे निवास के सामने बिल्कुल समीप था।सामान्यतः कभी मै गैरहाजिर नहीं हुआ।जिस रोज किसी कारणवश गैरहाजिर होता, हमारे शिक्षक घर पहुंच कर हाल-समाचार पूछने लगते ।उस स्कूल मे सबसे बडी उपलब्धि यह थी कि हमारे पुस्तक वाचन, श्रुतिलेख मे सारे शिक्षक हमें शाबाशी देते थे।विद्यालय का नियम था कि प्रत्येक शनिवार का पहला पीरियड पुस्तक वाचन का होगा।उसमे कोई विषय दे दिया जाता था और प्रत्येक विद्यार्थियों को उसमें बोलना ही होता था।सारी कक्षाओं में पुस्तक वाचन चल रहा होता था और हेडमास्टर साहब विद्यालय मे चक्कर लगा रहे होते थे।एक बार वे हमारी कक्षा में आये तो मै अपनी बारी से बोल चुका था।किन्तु हेडमास्टर साहब को हमारे पुस्तक वाचन को सुनने की इच्छा थी।उन्हें सुनाने के लिए मुझे पुनः खडा कर दिया गया।हेडमास्टर साहब शाबाशी देकर गये।

चौथी कक्षा की एक घटना का मुझे स्मरण है।हमारे कक्षाध्यापक दिनेश सर थे।वे पढाते अच्छा थे।एक दिन वे पाँचवी कक्षा में पढा रहे थे।उन्होंने मुझे उस कक्षा में बुलाया।विचित्र दृश्य था।आधी कक्षा बेंचों पर खडी थी।उन्होंने मुझ अपनी निकट टेबल के पास बुलाया और मेरा मुँह कक्षा के लडकों की ओर कर दिया और मुझसे पूछा,”अंग्रेजी के वैसे शब्द जिसमें पाँच Vowels हो ,इन्हें बताओ”

जी, Education.

मुझे नहीं, इन लडकों को बताओ और जोर से बोलो ,ताकि सभी सुन सकें।कुछ नालायकों को इतना भी नहीं आता।”

मैंने जरा ऊँची आवाज मे कहा, Education.

सर बोले,देखो चौथी कक्षा का बच्चा जानता है ।और तुम पाँचवी कक्षा के ऊँट ,इतना भी नहीं जानते?

वे मेरी ओर मुडे ,कहा कि इन नालायकों के कान मलते मलते मेरी अँगुलियाँ दुःख गयीं ।अब तुम इनमें से हर लडके के गाल पर जोर का एक चाँटा रसीद करो।”इन्हें कुछ शर्म तो आए।

मै डर गया ।उन बडे लडकों को चाँटा मारूंगा तो बाद मे वे मुझे मारेंगे ।मैने कुछ लडकों को दिखावे मे हल्के हल्के चाँटे लगा दिए।

उन दिनों सप्तम वर्ग मे बोर्ड परीक्षा होती थी।मेरी तैयारी अच्छी थी ,पर परीक्षा प्रारंभ के दिन ही मुझे तेज ज्वर हो गया था।कुछ लोगों ने परीक्षा छोड देने की सलाह दी।पर,मैने परीक्षा में सम्मिलित होने की ठान ली।मुझे स्मरण है कि बडे भैया हमे साईकिल पर बिठाकर M.W.High School परीक्षा केंद्र ले गये थे।तबियत खराब के बावजूद सप्तम बोर्ड की परीक्षा में अच्छे अंकों से प्रथम रहा था।💐

अविर्भाव💐

अपने जन्म और अपने पूर्वजों के बारे में हमने जो कुछ सुना वो इस प्रकार है ःमुझे बताया गया कि मेरा जन्म धनबाद मे छठ पूजा के पहले अर्ध्य के दिन हुआ था।बडे होने पर वह जन्मपत्री भी मेरे हाथ लग गया जिसमें इस बात का प्रमाण है।हमारे पापाजीस्व.त्रिभुवन नारायण लाल अपने बच्चों के जन्म के मूहूर्त, समय और तिथि आदि के विषय मे विशेष रूप से सजग और सावधान थे।वे स्वयं पोथी पत्रा के ज्ञाता थे।उसी के आधार पर वे बाद मे जन्म पत्रिका भी बनवाते थे।

पूर्वजः हमारा पैतृक घर जोगसर (ग्वालटोली)भागलपुर मे था।हमारे दादा दो भाई थे ।हमारे दादाजी का नाम स्व. गिरिवर नारायण लाल और दादी का नाम बिंदेश्वरी देवी था ।मेरे पापाजी अकेले भाई व एक बहन थी। हमारी बुआ का नाम नारायणी था।हमारे पापाजी के शैशव काल मे ही दादाजी के गुजर जाने के बाद चचेरे दादाजी ने उनका लालन पालन किया एवं पढाई मे मदद की ।हमारे पापाजी ने टी.एन.बी.कालेज, भागलपुर से दो विषयों में स्नातकोत्तर डिग्री हासिल की थी।उनका हस्तलेख बेहद खूबसूरत होता था।हमारी माँ सावित्री देवी बरौनी के निकट गडहरा निवासी एक पुलिस दारोगा स्व.ईश्वरी प्रसाद की बेटी थी।माँ बताती थी कि हमारे नानाजी उन्हें बहुत मानते थे।चूंकि हमारी माँ के बाद ही उन्हें बेटा हुआ था।उस जमाने मे मैट्रिक पास की थी पर,हमलोगों ने उनका कोई सर्टिफिकेट नहीं देखा था।

भागलपुर का पैतृक मकान पर हमारे चचेरे चाचाओं ने ऐन केन प्रकारेण हडप लिया ।हमारे पापाजी अपने हिस्से को लेकर अपने चचेरे भाइयों से कभी कोई विवाद या झगडा नहीं किया।सेवा निवृत्ति के पूर्व ही मुंगेर मे उन्होंने अपना घर बना लिया।