सरकारी जीवन और मोक्ष।

सरकारी जीवन ः

रानी मधुमक्खी जैसा ही यह होता है।

हर वर्ग का सेवक उसको मिलजुलकर सेता है।

नीति, नियम,योजना,लक्ष्य,समय जब तय होता है।

लीची,आम,महुआ,नीम भी मीठा मधु देता है।

एक के बाद एक ने बढकर हाथ गले लगाया ।

सृजक पालनहार प्रधान सचिव कक्ष मे हो आया।

मधुमक्खी छत्ता जैसा विभाग को जिसने जहां बनाया।

निर्बल, शोषित, दीन हीन भी मधु कलश भर लाया।

मत विभेद तो जीवन के हर क्षण मे होता है।

कलश छीन कर भाग कोई छुप कर मधु पीता है।

निःस्वार्थ सेवा धर्म जब खडा होता है।

चित्रगुप्त का लेखा -जोखा विष्णु को देता है।

सरकारी सेवा केवल जांच नहीं तुल्यों का।

रक्षक और परीक्षक भी यह सामाजिक मूल्यों का।

सुनता गुनता रंग बताता फाइलों के रंग का।

राह दिखाता जीवन पथ पर मित्र सभी मित्रों का।

जीवन के कुछ मापदंड है, बालिग सब होता है।

छोड घोंसला खुले व्योम मे उडना ही होता है।

बहती नदियां जब विकास की पात बडा होता है।

गिरते पडते जीवन पथ मे चलना ही होता है।

इसी सत्य से उद्भाषित है,सरकारी जीवन भी।

विकसित हर जन हो जाये,तब चिंता क्यों कर किसी की।

वार्द्धक्य भी अटल सत्य है, जीवन मे आता है ।

सफर हुआ जो जीवन मे वही इसे पाता है।

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आ लौट के आजा।

जैसे पतझड के बाद

वसंत आता है

वृक्षों मे कोपले लौटती है

वैसे ही तुम लौट आना ।

जैसे शाम होते ही

पंछी घोंसले मे लौटते हैं

वैसे ही तुम लौट आना

जैसे कितनी चीजें

लौट आती है अपनी जगह पर

वैसे ही तुम लौट आना ।

अपने संग बिताये गये

पल दो पल को याद करके

वैसे ही तुम लौट आना।

तुम्हारे इंतजार मे हूँ,

इंतजार की भी इम्तिहान हो रही है

समय रफ्तार से चल रही है

कल मै न रहूं

वैसे ही तुम लौट आना।

मेरी बात ,प्रेम के मायने।

उदासी के इस लंबे दौर मे मैने बना लिए हैं, मुस्कुराहटों के कुछ ठिकाने! यूं तो न जाने कितनी कहानियां हैं, इन उदासियों के हिस्से मे, जिसमें एक कहानी तुम्हारी भी तो है……..।अपने जीवन के सबसे खूबसूरत और मीठे शब्द मैने तुम्हारे ही नाम किए थे,पर नहीं जानता था कि उसका मूल्य तुम्हारे लिए दो कौडी भी नहीं रहेगा !तुम्हें पाने का कभी इरादा न था,लेकिन तुम्हें खो देने के डर से मुझसे जो गलतियां हुई और उनका पूर्ण स्वीकार भी मै करता हूं पर,तुम्हारी माफी नहीं पा सका ।जाते-जाते जो शब्दवाण तुमने छोडे उनसे बहुत कुछ मर चुका था मेरे भीतर।पर मैं नहीं जानता कि वह कौन -सी भावना होती है जो तुमसे लगातार मिले अपमान ,तिरस्कार और व्यंग्य वाणों के बावजूद खत्म होने का नाम नहीं लेती।क्यों हमारे बीच भ्रम पैदा करने की कोशिश को सफल होने दिया?

तुम्हें अहसास भी नहीं कि सारी दुनिया की ईष्या से बचने की कवायद मे तुम उससे ही ईष्या कर बैठे ,जिसके होंठो पर सदा तुम्हारे लिए दुआएं बसती है।जानता हूं प्रेम के उच्चतम तल को मैं नहीं छू पाया ,इसलिए ये सारी शिकायतें हैं, ये सारे प्रश्न हैं।पर भी हर रोज तुम याद आती हो और मैं खुद को भूल जाता हूं।शायद तुम सिखा रही हो अपेक्षाओं के पर काटना और मै सीख रहा हूं फिर से प्यार बांटना।लम्हा-लम्हा दर्ज हो रहा है तुम्हारा दिया दर्द मन के किसी कोने मे और शायद एक दिन यही सिखाएगा मुझे सही मायने मे ‘प्रेम’ ।

शुभ संध्या।

संध्या प्रार्थना ः

आलोकित पथ करो हमारा, हे जग के अन्तर्यामी।

शुभ प्रकाश दो,स्वच्छ दृष्टि दो,जड चेतन सब के स्वामी।

तुच्छ हमारे मन के हे प्रभु,दुर्विचार सब दूर करो।

प्रेरित हों हम केवल तुमसे, ऐसी हममें शक्ति भरो।

तुम्ही बंधु हो ,तुम्ही पिता हो,तुम्ही मार्ग दर्शक जीवन के।

शक्ति और आलोक तुम्हारा, हम उतार लें निज तन मन मे।