हमारे पूज्य गुरुदेव के सौजन्य से🙏🏼

🙏 साभार अग्रेषित 🙏

महाकवि कालिदास के कंठ में साक्षात सरस्वती का वास था. शास्त्रार्थ में उन्हें कोई पराजित नहीं कर सकता था. अपार यश, प्रतिष्ठा और सम्मान पाकर एक बार कालिदास को अपनी विद्वत्ता का अहंकार हो गया.
उन्हें लगा कि उन्होंने विश्व का सारा ज्ञान प्राप्त कर लिया है और अब सीखने को कुछ बाकी नहीं बचा. उनसे बड़ा ज्ञानी संसार में कोई दूसरा नहीं. एक बार पड़ोसी राज्य से शास्त्रार्थ का निमंत्रण पाकर कालिदास विक्रमादित्य से अनुमति लेकर अपने घोड़े पर रवाना हुए.
गर्मी का मौसम था. धूप काफी तेज़ और लगातार यात्रा से कालिदास को प्यास लग आई. थोङी तलाश करने पर उन्हें एक टूटी झोपड़ी दिखाई दी. पानी की आशा में वह उस ओर बढ चले. झोपड़ी के सामने एक कुआं भी था.
कालिदास ने सोचा कि कोई झोपड़ी में हो तो उससे पानी देने का अनुरोध किया जाए. उसी समय झोपड़ी से एक छोटी बच्ची मटका लेकर निकली. बच्ची ने कुएं से पानी भरा और वहां से जाने लगी.
कालिदास उसके पास जाकर बोले- बालिके ! बहुत प्यास लगी है ज़रा पानी पिला दे. बच्ची ने पूछा- आप कौन हैं ? मैं आपको जानती भी नहीं, पहले अपना परिचय दीजिए. कालिदास को लगा कि मुझे कौन नहीं जानता भला, मुझे परिचय देने की क्या आवश्यकता ?
फिर भी प्यास से बेहाल थे तो बोले- बालिके अभी तुम छोटी हो. इसलिए मुझे नहीं जानती. घर में कोई बड़ा हो तो उसको भेजो. वह मुझे देखते ही पहचान लेगा. मेरा बहुत नाम और सम्मान है दूर-दूर तक. मैं बहुत विद्वान व्यक्ति हूं.
कालिदास के बड़बोलेपन और घमंड भरे वचनों से अप्रभावित बालिका बोली-आप असत्य कह रहे हैं. संसार में सिर्फ दो ही बलवान हैं और उन दोनों को मैं जानती हूं. अपनी प्यास बुझाना चाहते हैं तो उन दोनों का नाम बाताएं ?
थोङा सोचकर कालिदास बोले- मुझे नहीं पता, तुम ही बता दो मगर मुझे पानी पिला दो. मेरा गला सूख रहा है. बालिका बोली- दो बलवान हैं ‘अन्न’ और ‘जल‘. भूख और प्यास में इतनी शक्ति है कि बड़े से बड़े बलवान को भी झुका दें. देखिए प्यास ने आपकी क्या हालत बना दी है.

कलिदास चकित रह गए. लड़की का तर्क अकाट्य था. बड़े-बड़े विद्वानों को पराजित कर चुके कालिदास एक बच्ची के सामने निरुत्तर खङे थे. बालिका ने पुनः पूछा- सत्य बताएं, कौन हैं आप ? वह चलने की तैयारी में थी.
कालिदास थोड़ा विनम्र होकर बोले-बालिके ! मैं बटोही हूं. मुस्कुराते हुए बच्ची बोली- आप अभी भी झूठ बोल रहे हैं. संसार में दो ही बटोही हैं. उन दोनों को मैं जानती हूं, बताइए वे दोनों कौन हैं ? तेज़ प्यास ने पहले ही कालिदास की बुद्धि क्षीण कर दी थी पर लाचार होकर उन्होंने फिर से अनभिज्ञता व्यक्त कर दी.

बच्ची बोली- आप स्वयं को बङा विद्वान बता रहे हैं और ये भी नहीं जानते ? एक स्थान से दूसरे स्थान तक बिना थके जाने वाला बटोही कहलाता है. बटोही दो ही हैं, एक सूर्य और दूसरा चंद्रमा जो बिना थके चलते रहते हैं. आप तो थक गए हैं. भूख प्यास से बेदम हैं. आप कैसे बटोही हो सकते हैं ?
इतना कहकर बालिका ने पानी से भरा मटका उठाया और झोपड़ी के भीतर चली गई. अब तो कालिदास और भी दुखी हो गए. इतने अपमानित वे जीवन में कभी नहीं हुए. प्यास से शरीर की शक्ति घट रही थी. दिमाग़ चकरा रहा था. उन्होंने आशा से झोपड़ी की तरफ़ देखा. तभी अंदर से एक वृद्ध स्त्री निकली.
उसके हाथ में खाली मटका था. वह कुएं से पानी भरने लगी. अब तक काफी विनम्र हो चुके कालिदास बोले- माते पानी पिला दीजिए बङा पुण्य होगा.

स्त्री बोली- बेटा मैं तुम्हें जानती नहीं. अपना परिचय दो. मैं अवश्य पानी पिला दूंगी. कालिदास ने कहा- मैं मेहमान हूँ, कृपया पानी पिला दें. स्त्री बोली- तुम मेहमान कैसे हो सकते हो ? संसार में दो ही मेहमान हैं. पहला धन और दूसरा यौवन. इन्हें जाने में समय नहीं लगता. सत्य बताओ कौन हो तुम ?

अब तक के सारे तर्क से पराजित हताश कालिदास बोले- मैं सहनशील हूं. अब आप पानी पिला दें. स्त्री ने कहा- नहीं, सहनशील तो दो ही हैं. पहली, पृथ्वी जो पापी औऱ पुण्यात्मा सबका बोझ सहती है. उसकी छाती चीरकर बीज बो देने से भी अनाज के भंडार देती है.
दूसरे, वृक्ष जिनको पत्थर मारो फिर भी मीठे फल देते हैं. तुम सहनशील नहीं. सच बताओ तुम कौन हो ? कालिदास लगभग मूर्च्छा की स्थिति में आ गए और तर्क-वितर्क से झल्लाकर बोले- मैं हठी हूं.
स्त्री बोली- फिर असत्य. हठी तो दो ही हैं- पहला नख और दूसरे केश, कितना भी काटो बार-बार निकल आते हैं. सत्य कहें ब्राह्मण कौन हैं आप ? पूरी तरह अपमानित और पराजित हो चुके कालिदास ने कहा- फिर तो मैं मूर्ख ही हूं.
नहीं तुम मूर्ख कैसे हो सकते हो. मूर्ख दो ही हैं. पहला राजा जो बिना योग्यता के भी सब पर शासन करता है, और दूसरा दरबारी पंडित जो राजा को प्रसन्न करने के लिए ग़लत बात पर भी तर्क करके उसको सही सिद्ध करने की चेष्टा करता है.
कुछ बोल न सकने की स्थिति में कालिदास वृद्धा के पैर पर गिर पड़े और पानी की याचना में गिड़गिड़ाने लगे. वृद्धा ने कहा- उठो वत्स ! आवाज़ सुनकर कालिदास ने ऊपर देखा तो साक्षात माता सरस्वती वहां खड़ी थी. कालिदास पुनः नतमस्तक हो गए.

माता ने कहा- शिक्षा से ज्ञान आता है न कि अहंकार. तूने शिक्षा के बल पर प्राप्त मान और प्रतिष्ठा को ही अपनी उपलब्धि मान लिया और अहंकार कर बैठे इसलिए मुझे तुम्हारे चक्षु खोलने के लिए ये स्वांग करना पड़ा.
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कालिदास को अपनी गलती समझ में आ गई और भरपेट पानी पीकर वे आगे चल पड़े.

🙏जय रामजी की 🙏आप को दंडवत प्रणाम करता हूं ।
जय मिथिला
जय जय मिथिला

हमारे पूज्य गुरुदेव के सौजन्य से🙏

एक सौदागर को बाज़ार में घूमते हुए एक उम्दा नस्ल का ऊंट दिखाई पड़ा!
.सौदागर और ऊंट बेचने वाले के बीच काफी लंबी सौदेबाजी हुई और आखिर में सौदागर ऊंट खरीद कर घर ले आया!_
.घर पहुंचने पर सौदागर ने अपने नौकर को ऊंट का कजावा ( काठी) निकालने के लिए बुलाया..!
.कजावे के नीचे नौकर को एक छोटी सी मखमल की थैली मिली जिसे खोलने पर उसे कीमती हीरे जवाहरात भरे होने का पता चला..!_
.नौकर चिल्लाया,”मालिक आपने ऊंट खरीदा, लेकिन देखो, इसके साथ क्या मुफ्त में आया है!”_
.सौदागर भी हैरान था, उसने अपने नौकर के हाथों में हीरे देखे जो कि चमचमा रहे थे और सूरज की रोशनी में और भी टिम टिमा रहे थे!_
.सौदागर बोला: ” मैंने ऊंट ख़रीदा है, न कि हीरे, मुझे उसे फौरन वापस करना चाहिए!” .नौकर मन में सोच रहा था कि मेरा मालिक कितना बेवकूफ है…!
.बोला: “मालिक किसी को पता नहीं चलेगा!” पर, सौदागर ने एक न सुनी और वह फौरन बाज़ार पहुंचा और दुकानदार को मख़मली थैली वापिस दे दी!_
.ऊंट बेचने वाला बहुत ख़ुश था, बोला, “मैं भूल ही गया था कि अपने कीमती पत्थर मैंने कजावे के नीचे छुपा के रख दिए थे!_
.अब आप इनाम के तौर पर कोई भी एक हीरा चुन लीजिए!_
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“सौदागर बोला,” मैंने ऊंट के लिए सही कीमत चुकाई है इसलिए मुझे किसी शुक्राने और ईनाम की जरूरत नहीं है!
.जितना सौदागर मना करता जा रहा था, ऊंट बेचने वाला उतना ही ज़ोर दे रहा था!_
.आख़िर में सौदागर ने मुस्कुराते हुए कहा: असलियत में जब मैंने थैली वापस लाने का फैसला किया तो मैंने पहले से ही दो सबसे कीमती हीरे इसमें से अपने पास रख लिए थे!_
इस कबूलनामें के बाद ऊंट बेचने वाला भड़क गया उसने अपने हीरे जवाहरात गिनने के लिए थैली को फ़ौरन खाली कर लिया!
.पर वह था बड़ी पशोपेश में बोला,”मेरे सारे हीरे तो यही है, तो सबसे कीमती दो कौन से थे जो आपने रख़ लिए?”
सौदागर बोला:… ” मेरी ईमानदारी और मेरी खुद्दारी.”*

🌹हमें अपने अन्दर झांकना होगा कि हम में से किस किस के पास यह 2 हीरे है।🙏🏻

🌹जिन जिन के पास यह 2 हीरे है वह दुनिया के सबसे अमीर व्यक्ति हैं।

मेरे प्यारे देशवासियों“बुढ़ापा” और “वरिष्ठता”इंसान को उम्र बढ़ने पर “बूढ़ा” नहीं बनना चाहिये “वरिष्ठ” बनना चाहिए“बुढ़ापा” अन्य लोगों का आधार ढूँढता हैऔर “वरिष्ठता” तो लोगों को आधार देती है“बुढ़ापा” छुपाने का मन करता हैऔर “वरिष्ठता” को उजागर करने का मन करता है“बुढ़ापा” अहंकारी होता हैऔर “वरिष्ठता”अनुभवसंपन्न,विनम्र और संयमशील होती है“बुढ़ापा” नई पीढ़ी के विचारों से छेड़छाड़ करता हैऔर “वरिष्ठता” युवा पीढ़ी को बदलते समय के अनुसार जीने की छूट देती है“बुढ़ापा” “हमारे ज़माने में ऐसा था” की रट लगाता हैऔर “वरिष्ठता” बदलते समय से अपना नाता जोड़ लेती है उसे अपना लेती है“बुढ़ापा” नई पीढ़ी पर अपने विचार लादता है थोपता हैऔर “वरिष्ठता” तरुण पीढ़ी की राय को समझने का प्रयास करती है“बुढ़ापा” जीवन की शाम में अपना अंत ढूंढ़ता हैमगर“वरिष्ठता”वह तो जीवन की शाम में भी एक नए सवेरे का इंतजार करती है युवाओं की स्फूर्ति से प्रेरित होती है“वरिष्ठता”और “बुढ़ापे”के बीच के अंतर को गम्भीरतापूर्वक समझकर जीवन का आनंद पूर्ण रूप से लेने में सक्षम बनिएउम्र कोई भी हो सदैव फूल की तरह खिले रहिएसदा हँसते रहे मुस्कराते रहें

🙏कितना आसान है……..*अमीर बनना !* मैं बस में चढ़ गया। अंदर भीड़ देखकर मैं परेशान हो गया। बैठने की जगह नहीं थी। तभी, एक व्यक्ति ने अपनी सीट खाली कर दी। खाली सीट के बगल में खड़ा आदमी वहाँ बैठ सकता था, लेकिन इसके बजाय उसने मुझे सीट की पेशकश की। अगले पड़ाव पर फिर वही काम हुआ। उसने अपनी सीट दूसरे को दे दी। पूरी यात्रा के दौरान 4 बार ऐसा हुआ। वह आदमी एक सामान्य कार्यकर्ता की तरह लग रहा था, दिन भर काम करने के बाद घर लौट रहा था ... आखिरी पड़ाव पर जब हम सभी उतर गए, मैंने उससे बात की। "हर बार खाली सीट मिलने के बाद भी आप किसी अन्य व्यक्ति को अपनी सीट क्यों दे रहे थे?" *उनका जवाब मुझे आश्चर्यचकित कर गया:---* "मैंने अपने जीवन में बहुत अध्ययन नहीं किया है और न ही मुझे बहुत सी बातें पता हैं। मेरे पास ना तो बहुत पैसा है। इसलिए मेरे पास किसी को देने के लिए बहुत कुछ नहीं है। इसीलिए मैं यह रोज़ करता हूँ। यह एक ऐसी चीज़ है जो मैं कर सकता हूँ। आसानी से कर सकता हूं। पूरे दिन काम करने के बाद भी मैं थोड़ी देर खड़ा रह सकता हूं। मैंने अपनी सीट आपको दे दी और आपने *धन्यवाद* कहा। इससे मुझे संतोष हुआ कि मैंने किसी के लिए कुछ किया है।" मैं इसे दैनिक तौर पर करता हूं और महसूस करता हूं कि मैं किसी तरह से अपना योगदान दे रहा हूं। मैं हर दिन घर में ताज़ा और खुश होकर आता हूं कि मैंने किसी को कुछ दिया। " *मैं अवाक था!!!* किसी के लिए कुछ करने की चाहत ही अंतिम उपहार है। इस अजनबी ने मुझे बहुत कुछ सिखाया - *भीतर से अमीर बनना कितना आसान है!* *सुंदर कपड़े, बैंक खाते में बहुत सारे पैसे, महंगे गैजेट्स, सामान और विलासिता या शैक्षिक डिग्री - आपको अमीर और खुश नहीं कर सकते हैं; लेकिन देने का एक छोटा सा कार्य आपको हर रोज़ समृद्ध और खुश महसूस करने के लिए पर्याप्त हैं।* 🙏

🤷‍♂️गुरू से शिष्य ने कहा: गुरूदेव ! एक व्यक्ति ने आश्रम के लिये गाय भेंट की है।गुरू ने कहा – अच्छा हुआ । दूध पीने को मिलेगा। एक सप्ताह बाद शिष्य ने आकर गुरू से कहा: गुरू ! जिस व्यक्ति ने गाय दी थी, आज वह अपनी गाय वापिस ले गया ।गुरू ने कहा – अच्छा हुआ ! गोबर उठाने की झंझट से मुक्ति मिली।‘परिस्थिति’ बदले तो अपनी ‘मनस्थिति’ बदल लो। बस दुख सुख में बदल जायेगा.।“सुख दुख आख़िर दोनों मन के ही तो समीकरण हैं।“अंधे को मंदिर आया देखलोग हँसकर बोले -“मंदिर में दर्शन के लिए आए तो हो,पर क्या भगवान को देख पाओगे ?“अंधे ने कहा -“क्या फर्क पड़ता है,मेरा भगवान तो मुझे देख लेगा.” द्रष्टि नहीं द्रष्टिकोण सकारात्मक होना चाहिए। ❤

भ्रष्टाचार उन्मूलन मे सूचना का अधिकार अधिनियम की भूमिका।

भ्रष्टाचार शब्द ‘भ्रष्ट’ तथा ‘आचार’ दो शब्दों से मिलकर बना है ।’भ्रष्टाचार’का सामान्य अर्थ है–निकृष्ट कोटि का आचरण करना।अर्थात जब मनुष्य अपने शारिरिक ,मानसिक एवं आर्थिक बाहुबल का दुरूपयोग करता है तथा सामूहिक दायित्व को भूलकर व्यक्तिगत स्वार्थ के लिए सरकारी नियमों एवं नैतिक मर्यादा का उल्लंघन करके गलत लाभ उठाता है तब उसका आचरण ‘भ्रष्टाचार’ कहलाता है।

  आज के भौतिकवादी युग मे अयोग्य मनुष्य बिना कठिन परिश्रम किए रातों रात अधिकाधिक सुख-सुविधाओं का उपभोग एवं उच्च सामाजिक, आर्थिक हैसियत प्राप्त करना चाहता है।इसके लिए वह नैतिक मर्यादा को ताक पर रखकर भ्रष्टाचार एवं गलत तरीके अपनाकर धन कमाने के अंधे दौड़ मे शामिल हो जाता है।इस प्रकार समाज, देश व विश्व मे भ्रष्टाचार की जडें फैलती जा रही है।बेईमानी, चोरबाजारी, रिश्वतखोरी जैसी अनेक सामाजिक बुराईयां भ्रष्टाचार को जन्म दे रही है।सामाजिक, प्रशासनिक एवं राजनैतिक पदों, अधिकारों का दुरुपयोग भ्रष्टाचार को बढावा दे रही है।हर भ्रष्ट व्यक्ति अपने भविष्य को आर्थिक रूप से सुरक्षित व मजबूत कर लेना चाहता है।इसके लिए वह अनैतिक व भ्रष्ट तरीकें अपनाकर समाज, राष्ट्र एवं मानवता का भी अहित करने से नहीं हिचकिता है। आज  हमारे देश की अधिकांश व्यवस्था भ्रष्टाचार का शिकार हो चुकी है।अधिकांश राजनैतिक व प्रशासनिक ढाँचा भ्रष्टाचार मे आकंठ डूबी हुई है।भ्रष्टाचार ने अपनी जडें पूरे समाज में फैला ली है।समाज का हर वर्ग इससे बुरी तरह प्रभावित नजर आ रहा है।इसी कारण भ्रष्टाचार ने एक गंभीर व विकराल समस्या का रूप धारण कर लिया आ। स्पष्ट है कि ‘भ्रष्टाचार’ एक सामाजिक बुराई है।सरकार अथवा उसके द्वारा निर्मित कानूनो से ‘भ्रष्टाचार’ का पूर्ण उन्मूलन संभव नहीं है।दृढ इच्छा शक्ति के द्वारा अपने अंदर सदाचार सृजित कर ही भ्रष्टाचार का उन्मूलन संभव है। सरकार इस बुराई को सरकारी तंत्र से दूर करने के लिए कई कडे कदम उठाए गए हैं।ऐसे कानून बनाए गए हैं, जिससे भ्रष्टाचार को कम करने मे काफी मदद मिली  है।इन कानूनों में ‘सूचना का अधिकार अधिनियम’एक मील का पत्थर साबित हुए हैं।अब यह मान्य एवं स्थापित तथ्य है कि गोपनीयता भ्रष्टाचार का एक प्रमुख स्त्रोत है।इसलिए सरकारी एवं अन्य सार्वजनिक तंत्रों मे पारदर्शिता लाकर भ्रष्टाचार को दूर करने का प्रयास किया जा सकता है।प्रजातांत्रिक व्यवस्था में सरकार द्वारा जो कार्य किए जाते हैं वह जनकल्याण की भावना एवं लोकहित मे किए जाते हैं।सीमित संसाधनों से अधिकतम लाभ आम जनता को पहुंचाने का सरकारी ध्येय रहता है।लेकिन सरकारी तंत्रों मे अधिकारों का दुरूपयोग करने की प्रवृत्ति ,लालफीताशाही एवं मनमानी करने के चलते हमें लोकनिधि का दुरुपयोग एवं असावधानी पूर्वक खर्च किए जाने के गलत दृष्टांत प्रायः देखने को मिलते हैं।इसलिए आवश्यक है कि सरकारी कार्यों के हर स्तर पर पारदर्शिता बरती जाये।इससे लोकनिधि का उपयोग सही ढंग से होगा साथ ही पारदर्शिता से भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाया जा सकेगा।

भ्रष्टाचार उन्मूलन मे सूचना का अधिकार अधिनियम की भूमिका काफी महत्वपूर्ण है, जो निम्नलिखित है :-1.यह अधिनियम देश के नागरिकों के हाथ में शक्तिशाली अस्त्र प्रदान करता है, जिससे कि सरकारी कार्यालयो मे उपलब्ध सूचनाएं एवं दस्तावेज आसानी से प्राप्त किए जा सके।2.यह अधिनियम सरकारी कार्यालयों के विभिन्न स्तरो पर सम्पादित होने वाले क्रियाकलापों मे खुलापन एवं पूरी पारदर्शिता सुनिश्चित करता है। 3.सरकारी योजनाओं का चयन, क्रियान्वयन ,अनुश्रवण एवं मूल्यांकन सहित हर स्तर पर आम जनता को स सहभागिता आवश्यक है।इस अधिनियम के अन्तर्गत जानकारी प्राप्त कर आम जनता योजनाओं के संशोधन, परिवर्तन का सुझाव देकर अपनी सहभागिता सुनिश्चित कर सकते हैं।जिसके लाभप्रद परिणाम प्राप्त हो रहे हैं। 4. जब सरकारी कार्यकलापों मे गोपनीयता नहीं रहेगी और पूर्ण पारदर्शिता रहेगी तो निश्चित रूप से भ्रष्टाचार मे कमी आयेगी।आम नागरिकों को सरकारी कार्यकलापों के बारे में सूचना का अधिकार रहने से सरकारी तंत्र भी गलत करने से विरत रहते हैं। 5. प्रजातंत्र मे सरकारी कार्य किसी एक व्यक्ति या कुछ व्यक्तियों तक निहित नहीं होते हैं।इसलिए उच्च स्तर से निम्न स्तर तक का शासन आम जनता के प्रति जबाबदेह होता है।जनता को यह जानने का हक होता है कि उसकी सरकार उनके लिए क्या कर रही है।इस अधिनियम के तहत अधिकार मिलने से लोक प्राधिकारों को वे नियमित रूप से जबाबदेह बना सकते हैं। 6. जिस प्रकार स्वतंत्रता और अधिकार आपस मे जुड़े हुए हैं, ठीक उसी प्रकार सुशासन और सूचना का अधिकार का पारस्परिक संबंध है।सुशासन का मतलब है लोगों के लिए ऐसी नीतियां, योजनाएं बनाना और उसे क्रियान्वित करना जो न्यायसंगत ,पारदर्शी, भेदभावरहित ,सामाजिक रूप से संवेदनशील और जनसहभागिता जैसे मूल्यों से संपन्न हो तथा मुख्य रूप से लोगों के प्रति जबाबदेह हो ।यह अधिनियम सुशासन की प्राप्ति के लिए उपयुक्त वातावरण बनाता है। 7. यह अधिनियम सामान्य सूचना उपलब्ध कराने एवं संवेदनशील सूचना गोपनीय रखने में संतुलन कायम रखता है।

आम जनता को अँधेरे मे रखकर अपने व्यक्तिगत स्वार्थ के लिए पक्षपात करना और लोकनिधि का दुरुपयोग कर गलत लाभ उठाना अब बीते दिनों की बात होगी जिसमें’सूचना का अधिकार’अधिनियम की भूमिका प्रमुख होगी।ःहमारे पूज्य गुरुदेव के सौजन्य से।🙏🌹🙏🌹🙏

बहुत कम लोग जानते होंगे कि साहित्य सम्राट मुंशी प्रेमचंद ने “जेहाद” नाम की एक कहानी भी लिखी थी।जिसे हमारे सेकुलर प्रकाशकों ने पुस्तकों से लगभग गायब ही कर दिया।कहानी में मुंशी जी ने बहुत कम शब्दों में ही बहुत कुछ बता दिया है। जरूर पढ़ें…जेहादबहुत पुरानी बात है।हिंदुओं का एक काफ़िला अपने धर्म की रक्षा के लिए पश्चिमोत्तर के पर्वत-प्रदेश से भागा चला आ रहा था।मुद्दतों से उस प्रांत में हिंदू और मुसलमान साथ-साथ रहते चले आये थे। धार्मिक द्वेष का नाम न था।पठानों के जिरगे हमेशा लड़ते रहते थे। उनकी तलवारों पर कभी जंग न लगने पाता था।बात-बात पर उनके दल संगठित हो जाते थे। शासन की कोई व्यवस्था न थी। हर एक जिरगे और कबीले की व्यवस्था अलग थी। आपस के झगड़ों को निपटाने का भी तलवार के सिवा और कोई साधन न था।जान का बदला जान था, खून का बदला खून, इस नियम में कोई अपवाद न था। यही उनका धर्म था, यही ईमान, मगर उस भीषण रक्तपात में भी हिंदू परिवार शांति से जीवन व्यतीत करते थे।पर एक महीने से देश की हालत बदल गयी है। एक मुल्ला ने न जाने कहाँ से आ कर अनपढ़ धर्मशून्य पठानों में धर्म का भाव जागृत कर दिया है। उसकी वाणी में कोई ऐसी मोहिनी है कि बूढ़े, जवान, स्त्री-पुरुष खिंचे चले आते हैं। वह शेरों की तरह गरज कर कहता है- खुदा ने तुम्हें इसलिए पैदा किया है कि दुनिया को इस्लाम की रोशनी से रोशन कर दो, दुनिया से कुफ्र का नमोनिशान मिटा दो।एक काफिर के दिल को इस्लाम के उजाले से रोशनी कर देने का सवाब सारी उम्र के रोजे, नमाज और जकात से कहीं ज्यादा है। जन्नत की हूरें तुम्हारी बलाएँ लेंगी और फरिश्ते तुम्हारे कदमों की खाक माथे पर मलेंगे, खुदा तुम्हारी पेशानी पर बोसे देगा। और सारी जनता यह आवाज सुन कर मजहब के नारों से मतवाली हो जाती है। उसी धार्मिक उत्तेजना ने कुफ्र और इस्लाम का भेद उत्पन्न कर दिया है। प्रत्येक पठान जन्नत का सुख भोगने के लिए अधीर हो उठा है।उन्हीं हिंदुओं पर जो सदियों से शांति के साथ रहते थे, हमले होने लगे हैं। कहीं उनके मंदिर ढाये जाते हैं, कहीं उनके देवताओं को गालियाँ दी जाती हैं। कहीं उन्हें जबरदस्ती इस्लाम की दीक्षा दी जाती है। हिंदू संख्या में कम हैं, असंगठित हैं, बिखरे हुए हैं, इस नयी परिस्थिति के लिए बिलकुल तैयार नहीं। उनके हाथ-पाँव फूले हुए हैं, कितने ही तो अपनी जमा-जथा छोड़ कर भाग खड़े हुए हैं, कुछ इस आँधी के शांत हो जाने का अवसर देख रहे हैं। यह काफिला भी उन्हीं भागनेवालों में था।दोपहर का समय था। आसमान से आग बरस रही थी। पहाड़ों से ज्वाला-सी निकल रही थी। वृक्ष का कहीं नाम न था। ये लोग राज-पथ से हटे हुए, पेचीदा औघट रास्तों से चले आ रहे थे। पग-पग पर पकड़ लिये जाने का खटका लगा हुआ था। यहाँ तक कि भूख, प्यास और ताप से विकल होकर अंत को लोग एक उभरी हुई शिला की छाँह में विश्राम करने लगे। सहसा कुछ दूर पर एक कुआँ नजर आया। वहीं डेरे डाल दिये। भय लगा हुआ था कि जिहादियों का कोई दल पीछे से न आ रहा हो।दो युवकों ने बंदूक भर कर कंधे पर रखीं और चारों तरफ गश्त करने लगे। बूढ़े कम्बल बिछा कर कमर सीधी करने लगे। स्त्रियाँ बालकों को गोद से उतार कर माथे का पसीना पोंछने और बिखरे हुए केशों को सँभालने लगीं। सभी के चेहरे मुरझाये हुए थे।सभी चिंता और भय से त्रास्त हो रहे थे, यहाँ तक कि बच्चे भी जोर से न रोते थे।दोनों युवकों में एक लम्बा, गठीला रूपवान है। उसकी आँखों से अभिमान की रेखाएँ-सी निकल रही हैं, मानो वह अपने सामने किसी की हकीकत नहीं समझता, मानो उसकी एक-एक गत पर आकाश के देवता जयघोष कर रहे हैं। दूसरा कद का दुबला-पतला, रूपहीन-सा आदमी है, जिसके चेहरे से दीनता झलक रही है, मानो उसके लिए संसार में कोई आशा नहीं, मानो वह दीपक की भाँति रो-रो कर जीवन व्यतीत करने ही के लिए बनाया गया है। उसका नाम धर्मदास है, इसका ख़ज़ाँचन्द।धर्मदास ने बंदूक को जमीन पर टिका कर एक चट्टान पर बैठते हुए कहा-तुमने अपने लिए क्या सोचा?कोई लाख-सवा लाख की सम्पत्ति रही होगी तुम्हारी ?ख़ज़ाँचंद ने उदासीन भाव से उत्तर दिया-लाख-सवा लाख की तो नहीं, हाँ, पचास-साठ हजार तो नकद ही थे।‘तो अब क्या करोगे ?’‘जो कुछ सिर पर आयेगा, झेलूँगा ! रावलपिंडी में दो-चार सम्बन्धी हैं, शायद कुछ मदद करें।तुमने क्या सोचा है ?’‘मुझे क्या गम ! अपने दोनों हाथ अपने साथ हैं। वहाँ इन्हीं का सहारा था, आगे भी इन्हीं का सहारा है।’‘आज और कुशल से बीत जाये तो फिर कोई भय नहीं।’‘मैं तो मना रहा हूँ कि एकाध शिकार मिल जाय। एक दर्जन भी आ जायँ तो भून कर रख दूँ।’इतने में चट्टानों के नीचे से एक युवती हाथ में लोटा-डोर लिये निकली और सामने कुएँ की ओर चली। प्रभात की सुनहरी, मधुर, अरुणिमा मूर्तिमान हो गयी थी।धर्मदास पानी लेकर लौट ही रहा था कि उसे पश्चिम की ओर से कई आदमी घोड़ों पर सवार आते दिखायी दिये। जरा और समीप आने पर मालूम हुआ कि कुल पाँच आदमी हैं। उनकी बंदूक की नलियाँ धूप में साफ चमक रही थीं। धर्मदास पानी लिये हुए दौड़ा कि कहीं रास्ते ही में सवार उसे न पकड़ लें लेकिन कंधे पर बंदूक और एक हाथ में लोटा-डोर लिये वह बहुत तेज न दौड़ सकता था। फासला दो सौ गज से कम न था। रास्ते में पत्थरों के ढेर टूटे-फूटे पड़े हुए थे। भय होता था कि कहीं ठोकर न लग जाय, कहीं पैर न फिसल जायँ। इधर सवार प्रतिक्षण समीप होते जाते थे। अरबी घोड़ों से उसका मुकाबला ही क्या, उस पर मंजिलों का धावा हुआ। मुश्किल से पचास कदम गया होगा कि सवार उसके सिर पर आ पहुँचे और तुरंत उसे घेर लिया।धर्मदास बड़ा साहसी था, पर मृत्यु को सामने खड़ी देख कर उसकी आँखों में अँधेरा छा गया, उसके हाथ से बंदूक छूट कर गिर पड़ी। पाँचों उसी के गाँव के महसूदी पठान थे। एक पठान ने कहा-उड़ा दो सिर मरदूद का। दग़ाबाज़ काफिर।दूसरा-नहीं नहीं, ठहरो, अगर यह इस वक्त भी इस्लाम कबूल कर ले, तो हम इसे मुआफ कर सकते हैं। क्यों धर्मदास, तुम्हें इस दग़ा की क्या सजा दी जाय ?हमने तुम्हें रात-भर का वक्त फैसला करने के लिए दिया था। मगर तुम इसी वक्त जहन्नुम पहुँचा दिये जाओ, लेकिन हम तुम्हें फिर मौका देते हैं। यह आखिरी मौका है। अगर तुमने अब भी इस्लाम न कबूल किया, तो तुम्हें दिन की रोशनी देखनी नसीब न होगी।धर्मदास ने हिचकिचाते हुए कहा-जिस बात को अक्ल नहीं मानती, उसे कैसे…पहले सवार ने आवेश में आकर कहा-मजहब को अक्ल से कोई वास्ता नहीं।तीसरा-कुफ्र है ! कुफ्र है !पहला- उड़ा दो सिर मरदूद का, धुआँ इस पार।दूसरा-ठहरो-ठहरो, मार डालना मुश्किल नहीं, जिला लेना मुश्किल है। तुम्हारे और साथी कहाँ हैं धर्मदास ?धर्मदास-सब मेरे साथ ही हैं।दूसरा-कलामे शरीफ़ की कसम, अगर तुम सब खुदा और उनके रसूल पर ईमान लाओ, तो कोई तुम्हें तेज निगाहों से देख भी न सकेगा।धर्मदास-आप लोग सोचने के लिए और कुछ मौका न देंगे।इस पर चारों सवार चिल्ला उठे-नहीं, नहीं, हम तुम्हें न जाने देंगे, यह आखिरी मौका है।इतना कहते ही पहले सवार ने बंदूक छतिया ली और नली धर्मदास की छाती की ओर करके बोला-बस बोलो, क्या मंजूर है ?धर्मदास सिर से पैर तक काँप कर बोला-अगर मैं इस्लाम कबूल कर लूँ तो मेरे साथियों को तो कोई तकलीफ न दी जायेगी ?दूसरा-हाँ, अगर तुम जमानत करो कि वे भी इस्लाम कबूल कर लेंगे।पहला-हम इस शर्त को नहीं मानते। तुम्हारे साथियों से हम खुद निपट लेंगे। तुम अपनी कहो। क्या चाहते हो ? हाँ या नहीं ?धर्मदास ने जहर का घूँट पी कर कहा-मैं खुदा पर ईमान लाता हूँ।पाँचों ने एक स्वर से कहा-अलहमद व लिल्लाह ! और बारी-बारी से धर्मदास को गले लगाया।श्यामा हृदय को दोनों हाथों से थामे यह दृश्य देख रही थी। वह मन में पछता रही थी कि मैंने क्यों इन्हें पानी लाने भेजा ?अगर मालूम होता कि विधि यों धोखा देगा, तो मैं प्यासों मर जाती, पर इन्हें न जाने देती। श्यामा से कुछ दूर ख़ज़ाँचंद भी खड़ा था। श्यामा ने उसकी ओर क्षुब्ध नेत्रों से देख कर कहा- अब इनकी जान बचती नहीं मालूम होती।ख़ज़ाँचंद-बंदूक भी हाथ से छूट पड़ी है।श्यामा-न जाने क्या बातें हो रही हैं। अरे गजब ! दुष्ट ने उनकी ओर बंदूक तानी है !ख़ज़ाँ.-जरा और समीप आ जायँ, तो मैं बंदूक चलाऊँ। इतनी दूर की मार इसमें नहीं है।श्यामा-अरे ! देखो, वे सब धर्मदास को गले लगा रहे हैं। यह माजरा क्या है ?ख़ज़ाँ.-कुछ समझ में नहीं आता।श्यामा-कहीं इसने कलमा तो नहीं पढ़ लिया ?ख़ज़ाँ.-नहीं, ऐसा क्या होगा, धर्मदास से मुझे ऐसी आशा नहीं है।श्यामा-मैं समझ गयी। ठीक यही बात है। बंदूक चलाओ।ख़ज़ाँ.-धर्मदास बीच में हैं। कहीं उन्हें न लग जाय।श्यामा-कोई हर्ज नहीं। मैं चाहती हूँ, पहला निशाना धर्मदास ही पर पड़े। कायर ! निर्लज्ज ! प्राणों के लिए धर्म त्याग किया। ऐसी बेहयाई की जिंदगी से मर जाना कहीं अच्छा है। क्या सोचते हो। क्या तुम्हारे भी हाथ-पाँव फूल गये। लाओ, बंदूक मुझे दे दो। मैं इस कायर को अपने हाथों से मारूँगी।ख़ज़ाँ.-मुझे तो विश्वास नहीं होता कि धर्मदास …श्यामा-तुम्हें कभी विश्वास न आयेगा। लाओ, बंदूक मुझे दो। खडे़ क्या ताकते हो ?क्या जब वे सिर पर आ जायँगे, तब बंदूक चलाओ?क्या तुम्हें भी यह मंजूर है कि मुसलमान हो कर जान बचाओ ?अच्छी बात है, जाओ। श्यामा अपनी रक्षा आप कर सकती है; मगर उसे अब मुँह न दिखाना।ख़ज़ाँचंद ने बंदूक चलायी। एक सवार की पगड़ी को उड़ाती हुई निकल गयी। जिहादियों ने ‘अल्लाहो अकबर !’ की हाँक लगायी। दूसरी गोली चली और घोड़े की छाती पर बैठी। घोड़ा वहीं गिर पड़ा। जिहादियों ने फिर ‘अल्लाहो अकबर !’ की सदा लगायी और आगे बढ़े। तीसरी गोली आयी। एक पठान लोट गया, पर इसके पहले कि चौथी गोली छूटे, पठान ख़ज़ाँचंद के सिर पर पहुँच गये और बंदूक उसके हाथ से छीन ली।एक सवार ने ख़ज़ाँचंद की ओर बंदूक तान कर कहा-उड़ा दूँ सिर मरदूद का, इससे खून का बदला लेना है।दूसरे सवार ने जो इनका सरदार मालूम होता था, कहा-नहीं-नहीं, यह दिलेर आदमी है। ख़ज़ाँचंद, तुम्हारे ऊपर दगा, खून और कुफ्र, ये तीन इल्ज़ाम हैं, और तुम्हें कत्ल कर देना ऐन सवाब है, लेकिन हम तुम्हें एक मौका और देते हैं। अगर तुम अब भी खुदा और रसूल पर ईमान लाओ, तो हम तुम्हें सीने से लगाने को तैयार हैं। इसके सिवा तुम्हारे गुनाहों का और कोई कफारा (प्रायश्चित्त) नहीं है। यह हमारा आखिरी फैसला है। बोलो, क्या मंजूर है ?चारों पठानों ने कमर से तलवारें निकाल लीं, और उन्हें ख़ज़ाँचंद के सिर पर तान दिया मानो ‘नहीं’ का शब्द मुँह से निकलते ही चारों तलवारें उसकी गर्दन पर चल जायँगी !ख़ज़ाँचंद का मुखमंडल विलक्षण तेज से आलोकित हो उठा। उसकी दोनों आँखें स्वर्गीय ज्योति से चमकने लगीं। दृढ़ता से बोला-तुम एक हिन्दू से यह प्रश्न कर रहे हो ?क्या तुम समझते हो कि जान के खौफ से वह अपना ईमान बेच डालेगा ?हिंदू को अपने ईश्वर तक पहुँचने के लिए किसी नबी, वली या पैगम्बर की जरूरत नहीं ! चारों पठानों ने कहा-काफिर ! काफिर !ख़ज़ाँ.-अगर तुम मुझे काफिर समझते हो तो समझो। मैं अपने को तुमसे ज्यादा खुदापरस्त समझता हूँ। मैं उस धर्म को मानता हूँ, जिसकी बुनियाद अक्ल पर है। आदमी में अक्ल ही खुदा का नूर (प्रकाश) है और हमारा ईमान हमारी अक्ल…चारों पठानों के मुँह से निकला ‘काफिर ! काफिर !’ और चारों तलवारें एक साथ ख़ज़ाँचंद की गर्दन पर गिर पड़ीं। लाश जमीन पर फड़कने लगी। धर्मदास सिर झुकाये खड़ा रहा। वह दिल में खुश था कि अब ख़ज़ाँचंद की सारी सम्पत्ति उसके हाथ लगेगी और वह श्यामा के साथ सुख से रहेगा, पर विधाता को कुछ और ही मंजूर था। श्यामा अब तक मर्माहत-सी खड़ी यह दृश्य देख रही थी। ज्यों ही ख़ज़ाँचंद की लाश जमीन पर गिरी, वह झपट कर लाश के पास आयी और उसे गोद में लेकर आँचल से रक्त-प्रवाह को रोकने की चेष्टा करने लगी। उसके सारे कपड़े खून से तर हो गये। उसने बड़ी सुंदर बेल-बूटोंवाली साड़ियाँ पहनी होंगी, पर इस रक्त-रंजित साड़ी की शोभा अतुलनीय थी। बेल-बूटोंवाली साड़ियाँ रूप की शोभा बढ़ाती थीं, यह रक्त-रंजित साड़ी आत्मा की छवि दिखा रही थी।ऐसा जान पड़ा मानो ख़ज़ाँचंद की बुझती आँखें एक अलौकिक ज्योति से प्रकाशमान हो गयी हैं। उन नेत्रों में कितना संतोष, कितनी तृप्ति, कितनी उत्कंठा भरी हुई थी। जीवन में जिसने प्रेम की भिक्षा भी न पायी, वह मरने पर उत्सर्ग जैसे स्वर्गीय रत्न का स्वामी बना हुआ था।धर्मदास ने श्यामा का हाथ पकड़ कर कहा-श्यामा, होश में आओ, तुम्हारे सारे कपड़े खून से तर हो गये हैं। अब रोने से क्या हासिल होगा ?ये लोग हमारे मित्र हैं, हमें कोई कष्ट न देंगे। हम फिर अपने घर चलेंगे और जीवन के सुख भोगेंगे ?श्यामा ने तिरस्कारपूर्ण नेत्रों से देख कर कहा-तुम्हें अपना घर बहुत प्यारा है, तो जाओ। मेरी चिंता मत करो, मैं अब न जाऊँगी। हाँ, अगर अब भी मुझसे कुछ प्रेम हो तो इन लोगों से इन्हीं तलवारों से मेरा भी अंत करा दो।धर्मदास करुणा-कातर स्वर से बोला-श्यामा, यह तुम क्या कहती हो, तुम भूल गयीं कि हमसे-तुमसे क्या बातें हुई थीं ?मुझे खुद ख़ज़ाँचंद के मारे जाने का शोक है, पर भावी को कौन टाल सकता है ?श्यामा-अगर यह भावी थी, तो यह भी भावी है कि मैं अपना अधम जीवन उस पवित्र आत्मा के शोक में काटूँ, जिसका मैंने सदैव निरादर किया। यह कहते-कहते श्यामा का शोकोद्गार, जो अब तक क्रोध और घृणा के नीचे दबा हुआ था, उबल पड़ा और वह ख़ज़ाँचंद के निस्पंद हाथों को अपने गले में डाल कर रोने लगी।चारों पठान यह अलौकिक अनुराग और आत्म-समर्पण देख कर करुणार्द्र हो गये। सरदार ने धर्मदास से कहा-तुम इस पाकीजा खातून से कहो, हमारे साथ चले। हमारी जाति से इसे कोई तकलीफ न होगी। हम इसकी दिल से इज्जत करेंगे।धर्मदास के हृदय में ईर्ष्या की आग धधक रही थी। वह रमणी, जिसे वह अपनी समझे बैठा था, इस वक्त उसका मुँह भी नहीं देखना चाहती थी। बोला-श्यामा, तुम चाहो इस लाश पर आँसुओं की नदी बहा दो, पर यह जिंदा न होगी। यहाँ से चलने की तैयारी करो। मैं साथ के और लोगों को भी जा कर समझाता हूँ। खान लोेग हमारी रक्षा करने का जिम्मा ले रहे हैं। हमारी जायदाद, जमीन, दौलत सब हमको मिल जायगी। ख़ज़ाँचंद की दोैलत के भी हमीं मालिक होंगे। अब देर न करो। रोने-धोने से अब कुछ हासिल नहीं।श्यामा ने धर्मदास को आग्नेय नेत्रों से देख कर कहा-और इस वापसी की कीमत क्या देनी होगी ? वही जो तुमने दी है ?धर्मदास यह व्यंग्य न समझ सका।बोला-मैंने तो कोई कीमत नहीं दी। मेरे पास था ही क्या ?श्यामा-ऐसा न कहो। तुम्हारे पास वह खजाना था, जो तुम्हें आज कई लाख वर्ष हुए ऋषियों ने प्रदान किया था। जिसकी रक्षा रघु और मनु, राम और कृष्ण और शंकर, शिवाजी और गोविंदसिंह ने की थी।उस अमूल्य भंडार को आज तुमने तुच्छ प्राणों के लिए खो दिया। इन पाँवों पर लोटना तुम्हें मुबारक हो! तुम शौक से जाओ। जिन तलवारों ने वीर ख़ज़ाँचंद के जीवन का अंत किया, उन्होंने मेरे प्रेम का भी फैसला कर दिया।जीवन में इस वीरात्मा का मैंने जो निरादर और अपमान किया, इसके साथ जो उदासीनता दिखायी उसका अब मरने के बाद प्रायश्चित्त करूँगी। यह धर्म पर मरने वाला वीर था, धर्म को बेचनेवाला कायर नहीं !अगर तुममें अब भी कुछ शर्म और हया है, तो इसका क्रिया-कर्म करने में मेरी मदद करो और यदि तुम्हारे स्वामियों को यह भी पसंद न हो, तो रहने दो, मैं सब कुछ कर लूँगी।पठानों के हृदय दर्द से तड़प उठे। धर्मान्धता का प्रकोप शांत हो गया। देखते-देखते वहाँ लकड़ियों का ढेर लग गया। धर्मदास ग्लानि से सिर झुकाये बैठा था और चारों पठान लकड़ियाँ काट रहे थे। चिता तैयार हुई और जिन निर्दय हाथों ने ख़ज़ाँचंद की जान ली थी उन्हीं ने उसके शव को चिता पर रखा। ज्वाला प्रचंड हुई। अग्निदेव अपने अग्निमुख से उस धर्मवीर का यश गा रहे थे।पठानों ने ख़ज़ाँचंद की सारी जंगम सम्पत्ति ला कर श्यामा को दे दी। श्यामा ने वहीं पर एक छोटा-सा मकान बनवाया और वीर ख़ज़ाँचंद की उपासना में जीवन के दिन काटने लगी।उसकी वृद्धा बुआ तो उसके साथ रह गयी, और सब लोग पठानों के साथ लौट गये, क्योंकि अब मुसलमान होने की शर्त न थी। ख़ज़ाँचंद के बलिदान ने धर्म के भूत को परास्त कर दिया। मगर धर्मदास को पठानों ने इस्लाम की दीक्षा लेने पर मजबूर किया। एक दिन नियत किया गया। मसजिद में मुल्लाओं का मेला लगा और लोग धर्मदास को उसके घर से बुलाने आये, पर उसका वहाँ पता न था। चारों तरफ तलाश हुई। कहीं निशान न मिला।साल-भर गुजर गया। संध्या का समय था। श्यामा अपने झोंपड़े के सामने बैठी भविष्य की मधुर कल्पनाओं में मग्न थी। अतीत उसके लिए दुःख से भरा हुआ था। वर्तमान केवल एक निराशामय स्वप्न था। सारी अभिलाषाएँ भविष्य पर अवलम्बित थीं।और भविष्य भी वह, जिसका इस जीवन से कोई सम्बन्ध न था ! आकाश पर लालिमा छायी हुई थी। सामने की पर्वतमाला स्वर्णमयी शांति के आवरण से ढकी हुई थी। वृक्षों की काँपती हुई पत्तियों से सरसराहट की आवाज निकल रही थी, मानो कोई वियोगी आत्मा पत्तियों पर बैठी हुई सिसकियाँ भर रही हो।उसी वक्त एक भिखारी फटे हुए कपड़े पहने झोंपड़ी के सामने खड़ा हो गया। कुत्ता जोर से भूँक उठा। श्यामा ने चौंक कर देखा और चिल्ला उठी-धर्मदास !धर्मदास ने वहीं जमीन पर बैठते हुए कहा-हाँ श्यामा, मैं अभागा धर्मदास ही हूँ। साल-भर से मारा-मारा फिर रहा हूँ।मुझे खोज निकालने के लिए इनाम रख दिया गया है। सारा प्रांत मेरे पीछे पड़ा हुआ है। इस जीवन से अब ऊब उठा हूँ; पर मौत भी नहीं आती!धर्मदास एक क्षण के लिए चुप हो गया। फिर बोला-क्यों श्यामा, क्या अभी तुम्हारा हृदय मेरी तरफ से साफ नहीं हुआ ! तुमने मेरा अपराध क्षमा नहीं किया !श्यामा ने उदासीन भाव से कहा-मैं तुम्हारा मतलब नहीं समझी।‘मैं अब भी हिंदू हूँ। मैंने इस्लाम नहीं कबूल किया है।’‘जानती हूँ !’‘यह जान कर भी तुम्हें मुझ पर दया नहीं आती !’श्यामा ने कठोर नेत्रों से देखा और उत्तेजित होकर बोली-तुम्हें अपने मुँह से ऐसी बातें निकालते शर्म नहीं आती ! मैं उस धर्मवीर की ब्याहता हूँ, जिसने हिंदू-जाति का मुख उज्ज्वल किया है। तुम समझते हो कि वह मर गया ! यह तुम्हारा भ्रम है। वह अमर है। मैं इस समय भी उसे स्वर्ग में बैठा देख रही हूँ।तुमने हिंदू-जाति को कलंकित किया है। मेरे सामने से दूर हो जाओ।धर्मदास ने कुछ जवाब न दिया ! चुपके से उठा, एक लम्बी साँस ली और एक तरफ चल दिया।प्रातःकाल श्यामा पानी भरने जा रही थी, तब उसने रास्ते में एक लाश पड़ी हुई देखी। दो-चार गिद्ध उस पर मँडरा रहे थे। उसका हृदय धड़कने लगा। समीप जा कर देखा और पहचान गयी।यह धर्मदास की लाश थी।साभार – मुंशी प्रेमचंद द्वारा लिखित कहानी जेहाद…🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏बहुत कम लोग जानते होंगे कि साहित्य सम्राट मुंशी प्रेमचंद ने “जेहाद” नाम की एक कहानी भी लिखी थी।जिसे हमारे सेकुलर प्रकाशकों ने पुस्तकों से लगभग गायब ही कर दिया।कहानी में मुंशी जी ने बहुत कम शब्दों में ही बहुत कुछ बता दिया है। जरूर पढ़ें…जेहादबहुत पुरानी बात है।हिंदुओं का एक काफ़िला अपने धर्म की रक्षा के लिए पश्चिमोत्तर के पर्वत-प्रदेश से भागा चला आ रहा था।मुद्दतों से उस प्रांत में हिंदू और मुसलमान साथ-साथ रहते चले आये थे। धार्मिक द्वेष का नाम न था।पठानों के जिरगे हमेशा लड़ते रहते थे। उनकी तलवारों पर कभी जंग न लगने पाता था।बात-बात पर उनके दल संगठित हो जाते थे। शासन की कोई व्यवस्था न थी। हर एक जिरगे और कबीले की व्यवस्था अलग थी। आपस के झगड़ों को निपटाने का भी तलवार के सिवा और कोई साधन न था।जान का बदला जान था, खून का बदला खून, इस नियम में कोई अपवाद न था। यही उनका धर्म था, यही ईमान, मगर उस भीषण रक्तपात में भी हिंदू परिवार शांति से जीवन व्यतीत करते थे।पर एक महीने से देश की हालत बदल गयी है। एक मुल्ला ने न जाने कहाँ से आ कर अनपढ़ धर्मशून्य पठानों में धर्म का भाव जागृत कर दिया है। उसकी वाणी में कोई ऐसी मोहिनी है कि बूढ़े, जवान, स्त्री-पुरुष खिंचे चले आते हैं। वह शेरों की तरह गरज कर कहता है- खुदा ने तुम्हें इसलिए पैदा किया है कि दुनिया को इस्लाम की रोशनी से रोशन कर दो, दुनिया से कुफ्र का नमोनिशान मिटा दो।एक काफिर के दिल को इस्लाम के उजाले से रोशनी कर देने का सवाब सारी उम्र के रोजे, नमाज और जकात से कहीं ज्यादा है। जन्नत की हूरें तुम्हारी बलाएँ लेंगी और फरिश्ते तुम्हारे कदमों की खाक माथे पर मलेंगे, खुदा तुम्हारी पेशानी पर बोसे देगा। और सारी जनता यह आवाज सुन कर मजहब के नारों से मतवाली हो जाती है। उसी धार्मिक उत्तेजना ने कुफ्र और इस्लाम का भेद उत्पन्न कर दिया है। प्रत्येक पठान जन्नत का सुख भोगने के लिए अधीर हो उठा है।उन्हीं हिंदुओं पर जो सदियों से शांति के साथ रहते थे, हमले होने लगे हैं। कहीं उनके मंदिर ढाये जाते हैं, कहीं उनके देवताओं को गालियाँ दी जाती हैं। कहीं उन्हें जबरदस्ती इस्लाम की दीक्षा दी जाती है। हिंदू संख्या में कम हैं, असंगठित हैं, बिखरे हुए हैं, इस नयी परिस्थिति के लिए बिलकुल तैयार नहीं। उनके हाथ-पाँव फूले हुए हैं, कितने ही तो अपनी जमा-जथा छोड़ कर भाग खड़े हुए हैं, कुछ इस आँधी के शांत हो जाने का अवसर देख रहे हैं। यह काफिला भी उन्हीं भागनेवालों में था।दोपहर का समय था। आसमान से आग बरस रही थी। पहाड़ों से ज्वाला-सी निकल रही थी। वृक्ष का कहीं नाम न था। ये लोग राज-पथ से हटे हुए, पेचीदा औघट रास्तों से चले आ रहे थे। पग-पग पर पकड़ लिये जाने का खटका लगा हुआ था। यहाँ तक कि भूख, प्यास और ताप से विकल होकर अंत को लोग एक उभरी हुई शिला की छाँह में विश्राम करने लगे। सहसा कुछ दूर पर एक कुआँ नजर आया। वहीं डेरे डाल दिये। भय लगा हुआ था कि जिहादियों का कोई दल पीछे से न आ रहा हो।दो युवकों ने बंदूक भर कर कंधे पर रखीं और चारों तरफ गश्त करने लगे। बूढ़े कम्बल बिछा कर कमर सीधी करने लगे। स्त्रियाँ बालकों को गोद से उतार कर माथे का पसीना पोंछने और बिखरे हुए केशों को सँभालने लगीं। सभी के चेहरे मुरझाये हुए थे।सभी चिंता और भय से त्रास्त हो रहे थे, यहाँ तक कि बच्चे भी जोर से न रोते थे।दोनों युवकों में एक लम्बा, गठीला रूपवान है। उसकी आँखों से अभिमान की रेखाएँ-सी निकल रही हैं, मानो वह अपने सामने किसी की हकीकत नहीं समझता, मानो उसकी एक-एक गत पर आकाश के देवता जयघोष कर रहे हैं। दूसरा कद का दुबला-पतला, रूपहीन-सा आदमी है, जिसके चेहरे से दीनता झलक रही है, मानो उसके लिए संसार में कोई आशा नहीं, मानो वह दीपक की भाँति रो-रो कर जीवन व्यतीत करने ही के लिए बनाया गया है। उसका नाम धर्मदास है, इसका ख़ज़ाँचन्द।धर्मदास ने बंदूक को जमीन पर टिका कर एक चट्टान पर बैठते हुए कहा-तुमने अपने लिए क्या सोचा?कोई लाख-सवा लाख की सम्पत्ति रही होगी तुम्हारी ?ख़ज़ाँचंद ने उदासीन भाव से उत्तर दिया-लाख-सवा लाख की तो नहीं, हाँ, पचास-साठ हजार तो नकद ही थे।‘तो अब क्या करोगे ?’‘जो कुछ सिर पर आयेगा, झेलूँगा ! रावलपिंडी में दो-चार सम्बन्धी हैं, शायद कुछ मदद करें।तुमने क्या सोचा है ?’‘मुझे क्या गम ! अपने दोनों हाथ अपने साथ हैं। वहाँ इन्हीं का सहारा था, आगे भी इन्हीं का सहारा है।’‘आज और कुशल से बीत जाये तो फिर कोई भय नहीं।’‘मैं तो मना रहा हूँ कि एकाध शिकार मिल जाय। एक दर्जन भी आ जायँ तो भून कर रख दूँ।’इतने में चट्टानों के नीचे से एक युवती हाथ में लोटा-डोर लिये निकली और सामने कुएँ की ओर चली। प्रभात की सुनहरी, मधुर, अरुणिमा मूर्तिमान हो गयी थी।धर्मदास पानी लेकर लौट ही रहा था कि उसे पश्चिम की ओर से कई आदमी घोड़ों पर सवार आते दिखायी दिये। जरा और समीप आने पर मालूम हुआ कि कुल पाँच आदमी हैं। उनकी बंदूक की नलियाँ धूप में साफ चमक रही थीं। धर्मदास पानी लिये हुए दौड़ा कि कहीं रास्ते ही में सवार उसे न पकड़ लें लेकिन कंधे पर बंदूक और एक हाथ में लोटा-डोर लिये वह बहुत तेज न दौड़ सकता था। फासला दो सौ गज से कम न था। रास्ते में पत्थरों के ढेर टूटे-फूटे पड़े हुए थे। भय होता था कि कहीं ठोकर न लग जाय, कहीं पैर न फिसल जायँ। इधर सवार प्रतिक्षण समीप होते जाते थे। अरबी घोड़ों से उसका मुकाबला ही क्या, उस पर मंजिलों का धावा हुआ। मुश्किल से पचास कदम गया होगा कि सवार उसके सिर पर आ पहुँचे और तुरंत उसे घेर लिया।धर्मदास बड़ा साहसी था, पर मृत्यु को सामने खड़ी देख कर उसकी आँखों में अँधेरा छा गया, उसके हाथ से बंदूक छूट कर गिर पड़ी। पाँचों उसी के गाँव के महसूदी पठान थे। एक पठान ने कहा-उड़ा दो सिर मरदूद का। दग़ाबाज़ काफिर।दूसरा-नहीं नहीं, ठहरो, अगर यह इस वक्त भी इस्लाम कबूल कर ले, तो हम इसे मुआफ कर सकते हैं। क्यों धर्मदास, तुम्हें इस दग़ा की क्या सजा दी जाय ?हमने तुम्हें रात-भर का वक्त फैसला करने के लिए दिया था। मगर तुम इसी वक्त जहन्नुम पहुँचा दिये जाओ, लेकिन हम तुम्हें फिर मौका देते हैं। यह आखिरी मौका है। अगर तुमने अब भी इस्लाम न कबूल किया, तो तुम्हें दिन की रोशनी देखनी नसीब न होगी।धर्मदास ने हिचकिचाते हुए कहा-जिस बात को अक्ल नहीं मानती, उसे कैसे…पहले सवार ने आवेश में आकर कहा-मजहब को अक्ल से कोई वास्ता नहीं।तीसरा-कुफ्र है ! कुफ्र है !पहला- उड़ा दो सिर मरदूद का, धुआँ इस पार।दूसरा-ठहरो-ठहरो, मार डालना मुश्किल नहीं, जिला लेना मुश्किल है। तुम्हारे और साथी कहाँ हैं धर्मदास ?धर्मदास-सब मेरे साथ ही हैं।दूसरा-कलामे शरीफ़ की कसम, अगर तुम सब खुदा और उनके रसूल पर ईमान लाओ, तो कोई तुम्हें तेज निगाहों से देख भी न सकेगा।धर्मदास-आप लोग सोचने के लिए और कुछ मौका न देंगे।इस पर चारों सवार चिल्ला उठे-नहीं, नहीं, हम तुम्हें न जाने देंगे, यह आखिरी मौका है।इतना कहते ही पहले सवार ने बंदूक छतिया ली और नली धर्मदास की छाती की ओर करके बोला-बस बोलो, क्या मंजूर है ?धर्मदास सिर से पैर तक काँप कर बोला-अगर मैं इस्लाम कबूल कर लूँ तो मेरे साथियों को तो कोई तकलीफ न दी जायेगी ?दूसरा-हाँ, अगर तुम जमानत करो कि वे भी इस्लाम कबूल कर लेंगे।पहला-हम इस शर्त को नहीं मानते। तुम्हारे साथियों से हम खुद निपट लेंगे। तुम अपनी कहो। क्या चाहते हो ? हाँ या नहीं ?धर्मदास ने जहर का घूँट पी कर कहा-मैं खुदा पर ईमान लाता हूँ।पाँचों ने एक स्वर से कहा-अलहमद व लिल्लाह ! और बारी-बारी से धर्मदास को गले लगाया।श्यामा हृदय को दोनों हाथों से थामे यह दृश्य देख रही थी। वह मन में पछता रही थी कि मैंने क्यों इन्हें पानी लाने भेजा ?अगर मालूम होता कि विधि यों धोखा देगा, तो मैं प्यासों मर जाती, पर इन्हें न जाने देती। श्यामा से कुछ दूर ख़ज़ाँचंद भी खड़ा था। श्यामा ने उसकी ओर क्षुब्ध नेत्रों से देख कर कहा- अब इनकी जान बचती नहीं मालूम होती।ख़ज़ाँचंद-बंदूक भी हाथ से छूट पड़ी है।श्यामा-न जाने क्या बातें हो रही हैं। अरे गजब ! दुष्ट ने उनकी ओर बंदूक तानी है !ख़ज़ाँ.-जरा और समीप आ जायँ, तो मैं बंदूक चलाऊँ। इतनी दूर की मार इसमें नहीं है।श्यामा-अरे ! देखो, वे सब धर्मदास को गले लगा रहे हैं। यह माजरा क्या है ?ख़ज़ाँ.-कुछ समझ में नहीं आता।श्यामा-कहीं इसने कलमा तो नहीं पढ़ लिया ?ख़ज़ाँ.-नहीं, ऐसा क्या होगा, धर्मदास से मुझे ऐसी आशा नहीं है।श्यामा-मैं समझ गयी। ठीक यही बात है। बंदूक चलाओ।ख़ज़ाँ.-धर्मदास बीच में हैं। कहीं उन्हें न लग जाय।श्यामा-कोई हर्ज नहीं। मैं चाहती हूँ, पहला निशाना धर्मदास ही पर पड़े। कायर ! निर्लज्ज ! प्राणों के लिए धर्म त्याग किया। ऐसी बेहयाई की जिंदगी से मर जाना कहीं अच्छा है। क्या सोचते हो। क्या तुम्हारे भी हाथ-पाँव फूल गये। लाओ, बंदूक मुझे दे दो। मैं इस कायर को अपने हाथों से मारूँगी।ख़ज़ाँ.-मुझे तो विश्वास नहीं होता कि धर्मदास …श्यामा-तुम्हें कभी विश्वास न आयेगा। लाओ, बंदूक मुझे दो। खडे़ क्या ताकते हो ?क्या जब वे सिर पर आ जायँगे, तब बंदूक चलाओ?क्या तुम्हें भी यह मंजूर है कि मुसलमान हो कर जान बचाओ ?अच्छी बात है, जाओ। श्यामा अपनी रक्षा आप कर सकती है; मगर उसे अब मुँह न दिखाना।ख़ज़ाँचंद ने बंदूक चलायी। एक सवार की पगड़ी को उड़ाती हुई निकल गयी। जिहादियों ने ‘अल्लाहो अकबर !’ की हाँक लगायी। दूसरी गोली चली और घोड़े की छाती पर बैठी। घोड़ा वहीं गिर पड़ा। जिहादियों ने फिर ‘अल्लाहो अकबर !’ की सदा लगायी और आगे बढ़े। तीसर

हे दयानिधे ! रथ रोको अब,क्यों प्रलय की तैयारी है ।ये बिना शस्त्र का युद्ध है जो,महाभारत से भी भारी है ।कितने परिचित कितने अपने,कितने आखिर यूँ ही चले गए ।जिन हाथों में दौलत-संबल,सब क्रूर काल से छले गए ।हे राघव-माधव-मृत्युंजय,पिंघलो ये अर्ज हमारी है ।ये बिना शस्त्र का युद्ध है जो,महाभारत से भी भारी है ।।🙏 सुप्रभात🙏