शैशवकाल💐

मेरा शैशवकाल सामान्य बच्चों -सा रहा होगा।होश सँभालने पर धूँधली -सी स्मृति उभरती है कि यह जगह महुलीगढ ,गिद्धौर का शाही महल था।जिसे राजा शिवदान सिंह चौहान ने अपशकुन मानकर राजकीय प्रशिक्षण महाविद्यालय को भाडे पर देकर छोड दिया था।हमारे पापा जी उसी महाविद्यालय में प्राध्यापक थे।हमलोग सारा परिवार उसी महल के कोने के छोटे […]

शैशवकाल💐

वास्तुसर्प 🙏

संथाल परगना जिले (सम्प्रति झारखंड प्रदेश) के पाकुड़ निवास मे बिताये गये लगभग 5-6 वर्षों मे जो घटित हुआ उसमें से कुछ बातें हमारे द्वारा “छोटी-सी भूल” मे लिखा गया है। हमारा निवास चारों ओर से झाडियों से घिरा हुआ था।क्वार्टर हमें जीर्ण-शीर्ण अवस्था में मिला था।उसे मरम्मत करवा कर हमलोग रह रहे थे।उस निवास मे दो कमरे,बडा-सा बरामदा ,आँगन और आँगन के पार छोटी-सी रसोई घर थी।हमारा आवास अनाजों से हमेशा भरा रहता था।निवास के चारों तरफ झाडियों मे अक्सर सर्पों के दर्शन हो जाया करते थे।हमारे यहां साँपों को मारने का रिवाज नहीं है, क्यूंकि हमारे यहाँ उनकी बहुत श्रद्धा के साथ पूजा होती है ।एक सवेरे तो हमारे रसोई घर मे चूल्हे की राख के साथ माता जी के हाथों में बहरा सर्प आ गया जिसे उठाकर हमारे द्वारा दूर मैदान में छोडा गया था। हमारे नौकर शंकर जी जब आउट हाउस से गोइठा निकाल रहे थे तो बडा सा नागदेवता जो किसी जीव का भक्षण कर वहां आराम फरमाते हुए पाये गये।

हमलोगों के पाकुड़ निवास के दौरान एक अजीब बात हमें स्मरण हो रही है कि वहां बारी-बारी से परिवार के सभी सदस्य बीमार पडते रहे।खासकर बडे भैया कई महीनों तक गंभीर रूप से बीमार रहे।उनकी खटिया बरामदे मे ही रहती थी।उस समय बिजली तो थी नहीं ,एक लैम्प रात भर जलता रहता था। एक रात की बात है एक बडा-सा सर्प निकल कर बडे भैया जहां सोये हुए थे उस खाट के समीप जलते हुए लैम्प के कीटों का भक्षण कर रहे थे।पता नहीं कैसे छोटे भैया की नजर उस पर पड गयी ।वे जोर से चिल्लाये ।मै तो साँप देखकर सहम-सा गया था और हमारी बोलती बंद हो गयी थी ।छोटे भैया के चिल्लाते ही सर्प तेजी से बरामदे के कोने मे अवस्थित एक छोटी सुराख की ओर भागा और प्रवेश कर गया ।छोटे भैया चाहते थे कि उसे घर से बाहर किया जाये।उन्होंने उसके पूँछ को लाठी से दबा दिया और हमें पूँछ पकडकर खींचने को कहा।हमारे द्वारा पूँछ पकड़ कर खींचने की कोशिश की गई, पर सर्प की पकड इतनी मजबूत थी कि उसके पूंछ का छोटा हिस्सा हमारे हाथ मे आ गया और सर्प उसमे प्रवेश कर गया ।दूसरे दिन हमलोगों के द्वारा उस सुराख को सीमेंट से बंद कर दिया गया।बाद मे कई पंडितों-विद्वानों से चर्चा हुई तो उन्होंने बताया कि वह वास्तुसर्प था ,जो बहुत समय से वहां रह रहा था।💐

वे सघर्ष के दिन💐

दिसंबर 1985 मे कई प्रतियोगिता परीक्षा मे असफल हो गया।हमारे अनुज ने एकमात्र साक्षात्कार जिसका आवेदन पत्र हमारे द्वारा तैयार किया गया मे सफलता प्राप्त कर ली ।जाहिर है कि इतने परिश्रम के बाद भी असफल होने से मै काफी व्यथित हो गया था।मै बुरी तरह निराश था।पटना में हमारे संगीत शौक एवं गुनगुनाने की आदत के विरूद्ध काफी शिकायत की गई।पापा जी ने पटना छोडकर मुंगेर वापस लौटने का आदेश दिया।फिर सारे सामान ,भारी भारी किताबों को उठाकर मुंगेर लेकर लौट आया।व्यथित मन से भटकते हुए गंगा के किनारे कष्टहरणी घाट पहुंचा।गंगा नदी के किनारे काफी देर बैठने के बाद नरसिंह बाबू, ज्योतिषाचार्य के घर शास्त्रीनगर चले गये संयोग से उनसे मुलाकात हो गई।हमारे कुछ कहने के पहले ही उन्होंने पूछ लिया कि मै क्यूँ दुःखी हूँ।हमारे द्वारा पूरी बात सुनाई गई।नरसिंह बाबू ने हमसे जन्मदिन और जन्मस्थान की जानकारी प्राप्त कर हमारी कुंडली तैयार कर दिया और कहा कि जीवन जैसे जैसे खुलता जाता है ,उसे उसी रूप मे लेना चाहिए।उन्होंने आगे कहा,”अपने भाग्य को स्वीकार करो और जीवन में आगे बढो ।तुम्हारी तकदीर मे क्या क्या बनना लिखा है ये अभी स्पष्ट नहीं है ।लेकिन, सही समय पर वो सामने आ जायेगा ।पिछली असफलता को भूल जाओ। क्रमशः……

जिंदगी भर नहीं भूलेंगे वो बारात😊

ये सब बहुत आद की बातें हैं।मै अपनी किशोरावस्था की ओर लौटूं ।

हमारा प्रवेश एस.पी,कालेज दुमका, मे हो गया था हमारे पापा जी दुमका मे शिक्षा विभाग के पदाधिकारी के रूप में कार्यरत थे कालेज के ठीक सामने हमारा क्वार्टर था।क्वार्टर के समीप प्राइमरी स्कूल में श्री अर्जुन ठाकुर जी शिक्षक थे।वे यदाकदा हमारे यहां आया करते थे ।हमलोग सम्मान में उन्हें चाचाजी कहकर पुकारते थे।वे हँसमुख और मिलनसार थे।दुमका मे हमारी मित्रमंडली थी ,जिसमें मास्टर साहब का भतीजा भी था।हमारी मित्रमंडली मे प्रशांत उर्फ मुन्ना था,जो हमारे छोटे भाई का Classmate था,पर दोस्ती हमसे ज्यादा था।पर हमें वह लाल भैया कहकर ही पुकारता था।हमारी मित्रमंडली मास्टर साहब से मजाक में कुछ कहती भी थी तो भी मास्टर साहब कभी बुरा नहीं मानते ,हँसकर बात टाल जाते।खासकर जब हमारी मित्रमंडली मास्टर साहब से राष्ट्र गान सुनाने का अनुरोध करती तो वे हँसकर टाल जाते।मास्टर साहब के भतीजे की शादी तय हो गयी और हमें बारात चलने का न्यौता दिया गया।बारात गोड्डा जिले के ठाकुर गंगटी प्रखंड के समीप किसी गाँव मे जाना था। हमारी पूरी मित्रमंडली के साथ हम भी जीवन की पहली बारात चलने के लिए रोमांचित थे। मुन्ना ने बताया कि उधर ही उसका ननिहाल पडता है इसलिए वह बारात चलने के लिए ज्यादा ही उत्साहित था और दबाव बनाकर हमें भी बारात चलने के लिए तैयार कर दिया।हमलोग बस मे सवार होकर चल पडे।दोपहर बाद हमलोग गोड्डा पहुंचे।ठाकुर गंगटी प्रखंड पहुंचते पहुंचते शाम हो गयी ।हमें बताया गया कि वहीं रेफरल अस्पताल परिसर में मे रूकने की व्यवस्था होगी,पर वहां किसी आदमी का अतापता नहीं था। हमलोग वहीं प्रतीक्षा करते रहे ।अँधेरा होने के बाद दूर से टिमटिमाती हुई लालटेन के साथ बैलगाड़ी पर कुछ लोग स्वागतार्थ पहुंचे।गाँव दिहात की प्रथा है कि वे लोग किसी भी दूरी को दूर नहीं बताकर कहतें हैं कि वह तो बिल्कुल पास है।हम दोनों मित्रों ने तय किया कि हमलोग पैदल ही बारात चलेंगे।बैलगाड़ी पर सवार दूल्हे के साथ पूरे बारातियों को गाँव के सारे मंदिरों की परिक्रमा कराई गयीं।दैवी स्थानों पर दंडवत कराये गये।आखिरकार बारात वधूपक्ष के द्वार पर पहुंची।बडा-सा शामियाना लगा हुआ था।हमलोगो ने चैन की साँस ली और बैठकर सोच ही रहे थे कि जोरों की आँधी-पानी से पूरा शामियाना उड गया ।जोरों की बारिश से बचने के लिए हमलोग घर मे प्रवेश कर गये।पता चला कि उस दिन एक नहीं दो जुडँवा बहनों की शादी का कार्यक्रम था।दोनों अभी तैयार ही हो रही थी।

चलिए, चलिए। आपलोग बगल वाले कमरे मे चलिए।यह रूम खाली कीजिए।

मुन्ना ने चुहल मे कह दिया ,”मै तो नहीं जाऊंगा”

वधूपक्ष वाले मुस्कुराते हुए बोले,”वो आप बारात पक्ष के हैं, इसलिए कह रहे हैं ।नहीं तो मै देखता कि कैसे नहीं जाते”

मुन्ना का चेहरा तमतमाया हुआ था।गुस्से के कारण हमलोगो को ठीक से खाया या सोया भी नहीं गया।जैसे तैसे सवेरा हुआ।मुन्ना तडके ही तैयार हो गया और कहा,”लाल भैया ,आप भी जल्दी तैयार हो जाइए।अब हमलोग यहां तनिक देर नहीं रूकेंगे।जहां बारातियों की खिदमत इस तरह की जाती है।मास्टर साहब समझाते रह गये, “मुन्ना जी,रूक जाइए, आज दिन मे विशेष खानपान की वयवस्था है,पर वह कहां मानने वाला था।नहीं, हमारा ननिहाल पास ही है और हमें लेकर निकल पडा।फिर वही ठाकुर गंगटी प्रखंड का रेफरल अस्पताल।उसके समीप दुकान में हमलोगो ने नाश्ता किया और बिना समय गँवाए आगे बढ गये।राहगीरों से रास्ता और दूरी पता कर चलते रहे ।अधिकांश राहगीर कहते कि लक्ष्मीपुर गाँव पास ही है।हमलोग चलते रहे, सामने पहाड़ी नजर आई,जिस पर चढकर हमलोग पार कर गये पर मंजिल का दूर दूर तक अतापता नहीं था।भरी दोपहिया मे भी हमलोग चलते रहे। रात मे ठीक से नहीं सोने के कारण आँखें बोझिल हो रही थीं।कभी कभी हवा की ठंढी झोंके आती तो मन करता कि वहीं कहीं सो जाएं।पर,मुन्ना हमें जगाता ,चलिए अब ज्यादा दूर नहीं है।मन करता कि अपनी ऊंगली काट लूं ताकि निद्रा पर विजय पा सकूं।पर उतनी हिम्मत नहीं थी।शरीर को घसीटते हुए मुन्ना के पीछे चल पडा।कुछेक छोटी पहाडियों को पार करने के बाद शाम हो गई।दूर गाडियों की लाइट नजर आने के बाद बांछें खिल उठीं।सामने सडक पर वाहनों का आवागमन हो रहा था।पर,हाय री किस्मत!हमलोगो के सामने एक बरसाती नदी रास्ता रोके हमें चिढा रही थी,जिसके ओर-छोर का पता नहीं था।जल प्रवाह धीरे-धीरे बढ ही रहा था।हमदोनों एक दूसरे का हाथ पकड कर डूबते हुए पार होकर सडक पर पहुंचे।वहां कुछ नाश्ता कर लक्ष्मीपुर गांव पहुंचे।ननिहाल पहूंच कर मूर्छित होकर गिर पडे।रात मे कोई हमें खाना खाने के लिए जगाने आये।खाना खाकर जो हम सोये तो आँखें खुली तो सूरज चढ चुका था।तैयार होकर हमलोग सडक के माध्यम दुमका वापस लौट गये।

पहली नौकरी💐

कहते हैं कि पहली नौकरी और पहला प्यार इंसान जिंदगी भर याद रखता है। 1985 की बात होगी,मुंगेर मे वकील का पेशा रास नहीं आया ।सिविल सेवा और अन्य प्रतियोगिता परीक्षा की तैयारी हेतु पटना पहुंचा।पटना में दीदीया, जीजाजी के फ्लैट मे टिका।माँ,पापाजी हमे बोरिंग रोड बडका बाबू (स्व.सर्वेश्वर प्रसाद ,”जनक” भूतपूर्व आयकर आयुक्त)के यहां ले गये । प्यारू भैया (डा.प्रोफेसर बालगंगाधर प्रसाद) के मित्र विनय कंठ साहब राजेंद्र नगर मे East &West कोचिंग संस्थान का संचालन करते थे ।प्यारू भैया ने उनके नाम की चिट्ठी हमें सौंप दी।हमारा दाखिला उस कोचिंग संस्थान में हो गया।उस कोचिंग संस्थान में हमारे कुछ मित्रों के नाम जो संस्मरण मे है, वे,सदय,शिवेंदु जयपुरियार ,विकास ठाकुर आदि।हमलोग कंठ सर की प्रतिभा से अभिभूत थे ।उनके व्यक्तित्व, उनके व्यवहार ,उनकी विद्वता ,उनके अनुशासन, उनकी कर्मठता, उनके स्नेह से।आज भी उनकी याद आती है तो उनका सौम्य मुस्कुराता हुआ चेहरा हमारे आँखों के सामने आ जाता है।वे गणित के शिक्षक थे पर प्रायः हर विषय पर उनकी पकड थी।

कुछ ऐसे सगे-सम्बन्धी मिले जो बार बार कहते थे कि सरकारी नौकरी प्रतियोगिता परीक्षा मे सफल होने के लिए कम-से-कम दस वर्ष चाहिए।हौसला डिगा हुआ था ।रात में सोते समय आँखें बंद होते ही खुद से प्रश्न करने लगता कि यदि सफल नहीं हुआ तो मेरा क्या होगा?परिवार की उम्मीदों का क्या होगा?यही सोच-सोचकर एक अन्जाम आशंका से कभी -कभार आंखों में पानी आ जाता।

पटना आने पर 1985 के जुलाई-अगस्त महीने में खुशखबरी मिली की अपनी जिंदगी के प्रथम प्रतियोगिता परीक्षा बिहार राज्य अवर सेवा चयन पर्षद द्वारा आयोजित परीक्षा मे उतीर्ण हो गया ।पर उसका नियुक्ति पत्र नहीं मिला।हमारी पढाई जारी रही ।इसी समय बिहार लोक सेवा आयोग, पटना द्वारा अपने कार्यालय के रिक्तियों के लिए परीक्षा आयोजित की गयी ।हमारी तैयारी इतनी थी कि हमें उस परीक्षा में सर्वोच्च स्थान प्राप्त हुआ और हमें तुरंत नियुक्ति पत्र दे दिया गया।कार्यालय मे अच्छा माहौल था।हमारे साथ योगदान करने वाले अच्छे मित्र अनिल, शमीम, सुरेश दास थे।हमारे पहले Section Officer तारकेश्वर प्रसाद(तारा बाबू)थे ।

हमारे यहां आज भी कुछ लोगों की मानसिकता है कि हर बात को अपनी स्वार्थ की नजरों से देखते हैं।सिर्फ अपनी जातियों के लोगों का स्वार्थ मे समर्थन करना और दूसरे कमजोर जाति के लोगों को परेशान करना एक प्रचलन है।इस तरह की भेदभाव की मानसिकता आज भी विद्दमान है जिसे महसूस कर मन खराब हो जाता है।

कार्यालय मे दोपहर को अपने जगह पर नाश्ता कर रहा था कि एक सज्जन हमारे टेबल के करीब आये ।उन्हें मैं पहचानता नहीं था ।उन्होंने पाकेट से शराब का बोतल निकाल कर शराब हमारे गिलास मे डालकर खडे -खडे पीने लगे ।हमारे द्वारा विरोध करने पर गुस्से में बरसने लगे और कमर से तमंचे निकाल लिए ।सहकर्मियों के बीच बचाव करके घर भेज दिया गया।बाद मे पता चला कि वे उस कार्यालय के पुराने कर्मचारी थे।इस घटनाक्रम ने कार्यालय के पूरे माहौल की पोल खोल दी ।आयोग के तत्कालीन माननीय अध्यक्ष A.K.M.Hasan साहब का भी ध्यान इस ओर गया ।हालांकि उक्त शराबी कर्मचारी जिनका नाम हमें स्मरण नहीं हो रहा है को पहले भी कई बार दंडित किया जा चुका था।

उक्त कार्यालय का एक रोचक वाक्या हमें याद है।हमारे कायस्थ जाति मे एक कहावत है कि “नौकरी नहीं तो छोकरी नहीं”अर्थात जब तक लडके को नौकरी नहीं मिलेगी तब तक शादी के.लिए रिश्ता नहीं आयेगा।उस कार्यालय मे योगदान करते ही रिश्तों की लाइन लग गयी ।कुछ लोग तो सीधे हमारे सम्पर्क मे आये।हमारा सीधा सा उत्तर होता कि हमारे माता पिता अभिभावक से सम्पर्क करें।एक सज्जन कुछ ज्यादा व्याकुल थे।उन्होंने ने कहा कि शादी आपको करनी है या आपके अभिभावक को ? मै कुछ समय सोचने लगा,फिर जबाब दिया ,सर जी,ऐसी बात है तो शादी आपको करनी है या आपकी लडकी को।यदि आपका सोच ऐसा है तो अपनी लडकी को ही हमसे सम्पर्क करने कहिए।हमलोग बातें कर तय कर लेंगे।बाद मे वे सज्जन फिर नजर नहीं आये।

सचिवालय के लिए नियुक्ति पत्र प्राप्त होते ही हमारे द्वारा लोक सेवा आयोग कार्यालय छोडऩे की इच्छा जाहिर की गयी।हमारे तत्कालीन माननीय अध्यक्ष महोदय नहीं चाहते थे कि मै आयोग कार्यालय छोडू।उन्होंने इसके लिए हमें समझाने का प्रयास किया।

अविनाश, जब इस कार्यालय और सचिवालय का पद,वेतन एक समान है तो आप यह कार्यालय छोडकर सचिवालय क्यूँ जाना चाहते हैं।फिर उन्होंने मजाकिया लहजे मे कहा ,ओ मै समझ गया।आप सचिवालय में ऊपरी कमाई के लिए जा रहे हो।उस समय हमें ज्यादा ज्ञान नहीं था कि तुरंत उनके सवाल का जबाब दे।एक -दो दिनो के बाद सोचकर कहा सर जी।सचिवालय बहुत बडा है, वहां प्रोन्नति के ज्यादा अवसर प्राप्त होंगे।इस जबाब से वे संतुष्ट हुए और सचिवालय योगदान करने की अनुमति दे दी गयी।💐

लाकडाउन💐

पवन एक क्षण विश्राम नहीं ले रहा ,

पक्षियों का झुंड उडा चला जा रहा

नदियों की धारा बहती चली जा रही

बागों मे फूल खिलते चले जा रहे

चाय का दौर चलता जा रहा

किचेन से मसालों. की खूशबू आती जा रही

जिम्मेदारियां थकने नहीं दे रही

ईश्वर सबों के लिए रोटी की व्यवस्था कर रहे

सादे खान-पान पर भी गुजर हो रहा

मित्र,रिश्ते दूर होने के बावजूद प्रेम बढता जा रहा

प्रदूषण कम होता चला जा रहा

स्वच्छता अभियान सफल होता जा रहा

सूकून की पूरी नींद हो रही

खुशियां ही खुशियां बढती जा रही

नकारात्मक सोच डाउन होता जा रहा

लक्ष्मण रेखा की महत्ता बढती जा रही

रहती है लाकडाउन रहती रहे

इंसानों मे प्रेम की गाडी चलती रहे।💐

छोटी-सी भूल 💐

हमारे पापाजी की बदली मुंगेर से संथाल परगना जिले ,(सम्प्रति झारखंड)के पाकुड़ अनुमंडल हो गयी ।हमारा निवास शहर से दूर धनुषपूजा गाँव मे था।निवास के चारों ओर पेडों का बगीचा था।शरीफा ,बेल,आम,इमली ,नीम आदि पेड लगे हुए थे।क्वार्टर के पीछे गिरिजाघर और कब्रगाह भी था।सामने वाली जमीन पर सब्जियां,मूँगफली बोये जाते थे।उस गाँव के ईर्दगिर्द पहाडियों का समूह और उसके बीच छोटी-छोटी नदियां,-झरने होते ।हम सभी मित्रों के साथ छुट्टी के दिन दूर बाहरी इलाके की ओर निकल जाया करते थे ।छोटी-छोटी नदियां बहती ,बगीचे और ढेर सारे खेत ।बगीचे से फल ,खेतों से मटर के दाने या मूँगफली वगैरह निकाल लेते ।तब कोई टोकता नहीं था कि फल क्यूँ तोडे या मटर-मूँगफली क्यूँ ले ली?

क्वार्टर के पीछे छोटी कुइयां थी ।कुइयां की गहराई इतनी थी कि कोई भी झुककर हाथ नीचे लटकाकर पानी निकाल सकता था ।नीचे उतरने के लिए सीढियां भी बनी थी ।गर्मियों मे पानी एकदम कम हो जाता था तब सीढियों का इस्तेमाल किया जा सकता था ।हमलोगों का उसमे उतरकर हाथ से पानी पीना और एक दूसरे पर उछालना अच्छा लगता था ।

होली का दिन था।बच्चों के शैतान टोली की मस्ती के कहने ही क्या ।आपस मे रंग खेलते खेलते जब मन भर जाता तो सडक पर जाकर राहगीरों पर रंग फेंकते ।कुछ बुजुर्ग नाराज हो जाते तो उनकी डाँट से घबराकर पीछे हट जाते ।लेकिन बच्चों की जात जो मना करो वही करते हैं।पुनः दल-बल के साथ पिचकारी लेकर सडक पर पहुंचे ।कोई बुजुर्ग नहीं दिखाई पडे तो शरारतें बढ गई।किसीने सवार सहित ताँगेवाले पर पिचकारी दाग दी ।ताँगे का घोडा बिदक गया ।सवार बाल-बाल बचे। टोपीधारी ताँगेवाला चाबुक लेकर पीछे पडा।सभी भाग निकले ।मै थोडा कमजोर पडा तो ताँगेवाले ने मेरा पीछा किया।मै थोडी दूर भागने के बाद गिर पडा।हमारा ठेहुना बुरी तरह घायल होकर लहूलुहान हो गया।उसी हालत मे घर पहुंचा।पापाजी सत्यनारायण पूजा मे तल्लीन थे।माताजी ने ऊपर से और सुताई कर दी ।कितने महीनों तक लंगडाता रहा ।घाव इतना गहरा था कि इसका दाग अभी भी विद्ममान है और दर्द की याद दिला रहा है।💐

जिला स्कूल, मुंगेर💐

सप्तम वर्ग मे सफलता प्राप्त करने के बाद हमारा प्रवेश जिला स्कूल मे दिला दिया गया।हमारे पूरबसराय क्वार्टर से स्कूल दूर था।इसी समय हमारे पापाजी ने एक भूखंड स्टेशन के समीप खरीदा था।भूखंड के पडोसी उमेश्वर प्रसाद के लडके अजीत (,विजय)भैया से जान-पहचान हुई।चूंकि वे भी जिला स्कूल के ही विद्दार्थी थे,इसलिए हम सामान्यतः उनके साथ ही स्कूल पैदल जाते थे।जिला स्कूल के कुछ मित्रों के नाम अभी भी स्मरण मे है, ब्रह्मदेव मंडल, कमल,नवीन, राजीव, अखिलेश, निरंजन ।इनमे कमल बहुत अच्छा चित्रकार था ।बेकापुर बाजार मे उसकी रेडिमेड इम्पोरियम नामक दूकान थी।उस समय स्कूल के प्रिसिंपल बालगोविंद मिश्र थे।छवि सर ,इत्यादि शिक्षकों के नाम स्मरण मे हैं।स्कूल में हमें Interval मे अच्छे नाश्ता दी जाती थी।प्रत्येक शनिवार को हाल मे चलचित्र दिखाया जाता था।इस स्कूल मे हमे कोई खास उपलब्धि हासिल नहीं हुई।हमारा क्वार्टर वही रहा।हमारे मित्र भानु का प्रवेश किसी अंग्रेजी स्कूल मे हुआ था।हमें याद है कि वह पूरे ड्रेस में टाई लगाकर स्कूल रिक्शा पर सवार होता था।खेलने के नाम पर हम क्वार्टर के सामने वाले मैदान में गुल्ली-डंडा, फुटबॉल ,कबड्डी आदि खेलते थे ।बाद मे क्रिकेट का प्रचलन प्रारंभ हुआ।मै अपनी प्रशस्ति मे यही कह सकता हूँ कि मैने शतरंज को छोडकर किसी खेल मे कोई पुरस्कार अब तक नहीं जीता हूँ।हमारे पडोसी अरूण से प्रायः झगड़ा होता था वह हमसे तगडा था। 💐