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हमारे पूज्य गुरुदेव के सौजन्य से 🙏
“मित्र”
.. एक कुशल मार्गदर्शक और नीति निपुण मित्र की जीवन में क्या भूमिका होती है, यह भगवान श्री कृष्ण के जीवन में देखनी चाहिए ।
अपने परम् प्रिय मित्र अर्जुन को भगवान श्री कृष्ण ने कैसे-कैसे सँभाला और एक आदर्श क्षेत्रीय के सोपान तक उन्हें ले गए।यही कारण था कि अर्जुन ने भी जब महाभारत का युद्ध अनिवार्य हो गया तो हजारों सैनिकों के बदले केवल एक श्री कृष्ण का ही नेतृत्व माँगा था।
जब आपका मित्र किसी घोर विषाद, निराशा मे घिरकर किंकर्तव्यविमूढ़ हो जाये तो उस समय उस मित्र के प्रति हमारा क्या कर्तव्य होना चाहिए, जिससे वह अपने कर्तव्य पथ से विमुख होकर हँसी का पात्र न बने ,वे अपने जीवन का एक अहम और श्रेष्ठ किरदार बने ।
अपने शरणागतों को घोर विषाद, निराशा से उबारकर प्रसाद तक पहुँचाना तो कोई उन.शरणागत वत्सल श्री कृष्ण से सीखें ।श्री कृष्ण केवल मित्रता करना ही नहीं जानते, अपितु हर हाल मे मित्रता निभाना भी जानते हैं, अब वो चाहे अर्जुन से हो,उद्धव से हो या विप्र सुदामा से ही क्यूँ न हो। पवित्र भावना मे, पवित्र उद्देश्यों के लिए बिना किसी सम्मान की अपेक्षा के सदैव प्रसन्नतापूर्वक कर्म करते रहना ही कृष्ण होना है।
श्री भगवतगीता मे खास शरणागति की बात है।जब तक अर्जुन ने शरणागत होकर अपने कल्याण की बात नहीं पूछी, तब तक गीतोपदेश आरंभ नहीं हुआ।अतः यदि कोई भगवान श्री कृष्ण के शरण हो जाये तो बिना पढे भगवतगीता समझ में आ जायेगी।ऐसे ही हम भगवान के हो जाये यही स्वधर्म है।
भगवतगीता व्यवहार में परमार्थ सिद्धि बताती है।लौकिक-परमार्थिक, सभी कर्म दूसरों के लिए करने हैं।समाधि भी अपने लिए नहीं।अपने लिए कुछ भी कर्म करना बंधन का कारण है।कल्याण भी अपने लिए नहीं करना है।अपने लिए करने से नाशवान वस्तु मिलती है।नाशवान मे आशक्ति होने के कारण सहज सुख-शांति की अनुभूति नहीं होती है।क्रिया के द्वारा संसार की सेवा होगी, परमात्मा की प्राप्ति नहीं होगी।
समाधि से व्युत्पन्न तभी तक होता है, जब तक तत्व की प्राप्ति नहीं होती।तत्व की प्राप्ति होने पर सहज समाधि होती है।संसार में संबंध विच्छेद होने पर परमात्मा शेष रह जायेंगे।उन्नति धन से नहीं होती, प्रत्युत स्वभाव शुद्ध बनने से होती है।
आपका भविष्य मंगलमय हो।🙏🌷🙏

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हमारे पूज्य गुरुदेव के सौजन्य से🙏
देवत्व आपके जीवन में घटना चाहिए।देवता वे नहीं जिन्होंने स्वर्ग में घर बनाया है, अपितु वे हैं जिन्होंने घर को ही स्वर्ग बनाया है।सदगुण, सदाचार और सद्चरित्रों का जीवन में प्रवेश ही जीवन में दैवत्व घटना है और इन्हीं गुणों का ह्रास ही जीवन से दैवत्व की कमी होना है।
महत्वपूर्ण यह नहीं है कि आप विशिष्ट बनें अपितु यह है कि आप शिष्ट बनें ।हमें महान् बनने का नहीं अपितु एक अच्छे इंसान बनने का प्रयास करना चाहिए।जहाँ एक अच्छे और सच्चे इंसान का निर्माण होता है महान् बनने की प्रक्रिया भी वहीं से प्रारंभ होती है।
महान् बनने के लिए अगर कोई शर्त है तै वह मात्र इतनी कि पहले एक इंसान बना जाये। मनुष्य जन्म मिलना कोई बडी बात नहीं है, अपितु मनुष्यता का जन्म होना बडी और दुर्लभ बात है।
कभी-कभी भक्ति मार्ग मे कई तरह की बाधाएं आती रहती है तो इससे सच्चे भक्तों को नहीं घबराना चाहिए, ये तो प्रभु की लीला है कि वे समय समय पर अपने भक्तों की धैर्यता की परीक्षा लेते रहते हैं, और जो परीक्षा में सफल हो गए तो समझिए कि उनकी भक्ति श्री हरि के प्रति पक्की है और जो उनकी परीक्षा में सफल हो गए तो समझो उनकी भके श्री हरि के प्रति पक्की है और जो इन बाधाओं से घबरा गए तो उनमें अभी आस्था और विश्वास की कमी है, जब विश्वास और श्रद्धा श्री नारायण के प्रति अटूट हो जाये और उनके चरणों में पूर्णरूपेण समर्पण का भाव आ जाए तो समझ लेना चाहिए कि भक्ति सही ढंग से हो रही है।

मेरा मुझमें कुछ नाहीं, जो कुछ है सो तोर ।
तेरा तुझको सौंपते, क्या लागत है मोर ।।
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हमारे पूज्य गुरुदेव के सौजन्य से,🙏

हमारे पूज्य गुरुदेव के सौजन्य से।🙏🌹🙏
या देवी सर्वभूतेषु शक्ति रूपेण संस्थिता ।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः।।
नवरात्रि पर्व की हार्दिक शुभकामनाएं
जैसे प्रभु हमें दिखाई नहीं देते, ठीक वैसे ही जो हम “प्रभुनाम “लेते हैं…. उसका प्रभाव हमें दिखाई नहीं देता… बल्कि समय आने पर महसूस जरूर होता है,
” प्रभुनाम”लेने से हमारी “अंतरात्मा”की सुरक्षा होती है… जिसे इस कलियुग के किसी भी तरह का कोई पाप हमारी..
“अंतरात्मा” को छू नहीं सकते,
और हम बुरे कर्मों से बच जाते हैं,
भवसागर यात्रा निश्कलंक पूर्ण करने के लिए जब भी,जहाँ भी, जैसे भी स्थिति में “प्रभुनाम” ले सकते हैं। पतझड़ होता है तो सभी वृक्षों पर हरी कोपलें फूटती हैं और सूर्यास्त होता है तो तभी अंधकार के बाद एक नया सबेरा भी जन्म लेता है।पतझड़ होता है ताकि हरियाली छा सके एवं अंधकार होता है ताकि अरूणोदय की लालिमा का आनंद हम सबको प्राप्त हो सके।जीवन भी कुछ इस तरह का ही है।यहाँ विसर्जन के साथ ही सृजन जुडा हुआ है । हमारे दुखों का एक प्रमुख कारण यह भी है कि हम जीवन को केवल एक दृष्टि से तो देखते हैं । हम जीवन को सूर्यास्त की दृष्टि से तो देखते हैं पर सूर्योदय की दृष्टि से नहीं देख पाते।परमात्मा से शिकायत मत कीजिए क्योंकि वो हमसे बेहतर इस बात को जानते हैं कि हमारे लिए क्या अच्छा हो सकता है। उस ईश्वर ने आपकी झोली खाली की है तो चिंता मत कीजिए क्योंकि वे पहले से कुछ बेहतर उसमें डालना चाहते हों।सुख और दुख जीवन रूपी रथ के दो पहिये हैं।सुख के बिना दुख का कोई अस्तित्व नहीं तो दुख के बिना सुख का भी कोई महत्व नहीं।इसलिए दुख आने पर धैर्य के साथ प्रभुनाम का आश्रय लेकर इस विश्वास के साथ प्रतीक्षा कीजिए कि प्रकाश भी नहीं टिका तो भला अंधकार कैसे टिक सकता है? 🙏🙏😊🙏🙏

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हमारे पूज्य गुरुदेव के सौजन्य से
“संगीत “
इतिहास संक्षिप्त मे ः संगीत वैदिक काल से आज तक ,अनेक उतार-चढाव झेलते हुए हमारे समक्ष उपस्थित है, वह भी अत्यंत विकसित एवं विस्तृत रूप में।विभिन्न शैलियों तथा स्वर संसाधनों मे संगीत वैदिक काल से वर्तमान में पाया जाता है, जो भारतीय संस्कृति व पद्धति की गरिमा है ।
परिभाषा ः “संगीत रत्नाकर” नामक ग्रंथ मे निम्नलिखित श्लोक से संगीत की परिभाषा स्पष्ट होती है।
” गीतं वाद्दं तथा नृत्यं त्रयं संगीतमुच्यते।
नृत्यं वाद्दानुगं प्रोक्तं वाद्दं गीतानुवृत्ति च “।।
अर्थात् गायन,वादन तथा नृत्य इन तीनों कलाओं के मेल को संगीत कहते हैं।
संगीत एक उत्कृष्ट ललित कला है, और इसका मुख्य आधार है- नाद अथवा ध्वनि ।इसलिए इसे “नाद ब्रह्म ” कहा जाता है।संगीत को हृदय की भावनाओं को प्रकट करने की भाषा मानी जाती है ।संगीत कला का प्राणि मात्र से अत्यंत ही घनिष्ठ संबंध है।यहाँ तक कि पशु-पक्षी भी इस पर न्योछावर होते हैं।
संगीत एक ऐसी कला है, जिसे हर मनुष्य लगभग किसी न किसी रूप में इसे अपना ही लेता है ।यदि किसी को गायन मे रूचि है, तो वह गाने में, वादन मे रूचि है तो विभिन्न वाद्दयंत्र बजाने मे और किसी को नर्तन मे रूचि है ,तो वह नृत्य के रूप में इसे अपनाता ही है।इसके अलावा अधिकांश लोगों को संगीत सुनने और सांस्कृतिक कार्यक्रम देखने में भी उतना ही आनंद आता है जितना कि एक गायक को गाने में।जिन्हें संगीत के किसी रूप से कोई रूचि नहीं है, वह मनुष्य जाति मे अपवाद है।संगीत एक भावना है, और जो मनुष्य भावुक सही मे नहीं है, वह अपवाद तो है ही और ऐसे लोग अपने को कलाकार या संगीतज्ञ कहते हैं तो वे कभी भी संगीत के ऊँचाइयों को छू नहीं सकते।
संगीत सीखना ः सर्वप्रथम यह समझ लेना आवश्यक है कि संगीत का स्वरूप चाहे जो भी हो,उसकी नींव शास्त्रीय संगीत ही है।
भाव संगीत के अनेक रूप भजन या गजल, लोकगीत या चित्रपट संगीत इत्यादि हैं।इन्हें सीखने हेतु कुछ रागों की जानकारी आवश्यक है।अलंकारों का पूरा अभ्यास, कुछ रागों के तान,द आलाप इत्यादि को नियमित रूप से स्मरण करना होगा।
शास्त्रीय संगीत सीखने में अनेक नियमों के अन्तर्गत रहना पडता है।इनकी कुछ सीमाएं होती हैं। उन सीमाओं से बाहर जाने पर रागों के नियमों का उल्लंघन माना जाता है।लेकिन ,भाव संगीत में ऐसी सीमाएं नहीं होती हैं। किसी भजन या गजल मे हम एक राग की सीमा से बाहर भी जा सकते हैं ।भाव संगीत मे शब्दों के भाव पर विशेष ध्यान दिया जाता है, जबकि शास्त्रीय संगीत मे रागों के नियम पर।
आपका दिन शुभ हो।🌷

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हमारे पूज्य गुरुदेव के सौजन्य से
“संगीत “
इतिहास संक्षिप्त मे ः संगीत वैदिक काल से आज तक ,अनेक उतार-चढाव झेलते हुए हमारे समक्ष उपस्थित है, वह भी अत्यंत विकसित एवं विस्तृत रूप में।विभिन्न शैलियों तथा स्वर संसाधनों मे संगीत वैदिक काल से वर्तमान में पाया जाता है, जो भारतीय संस्कृति व पद्धति की गरिमा है ।
परिभाषा ः “संगीत रत्नाकर” नामक ग्रंथ मे निम्नलिखित श्लोक से संगीत की परिभाषा स्पष्ट होती है।
” गीतं वाद्दं तथा नृत्यं त्रयं संगीतमुच्यते।
नृत्यं वाद्दानुगं प्रोक्तं वाद्दं गीतानुवृत्ति च “।।
अर्थात् गायन,वादन तथा नृत्य इन तीनों कलाओं के मेल को संगीत कहते हैं।
संगीत एक उत्कृष्ट ललित कला है, और इसका मुख्य आधार है- नाद अथवा ध्वनि ।इसलिए इसे “नाद ब्रह्म ” कहा जाता है।संगीत को हृदय की भावनाओं को प्रकट करने की भाषा मानी जाती है ।संगीत कला का प्राणि मात्र से अत्यंत ही घनिष्ठ संबंध है।यहाँ तक कि पशु-पक्षी भी इस पर न्योछावर होते हैं।
संगीत एक ऐसी कला है, जिसे हर मनुष्य लगभग किसी न किसी रूप में इसे अपना ही लेता है ।यदि किसी को गायन मे रूचि है, तो वह गाने में, वादन मे रूचि है तो विभिन्न वाद्दयंत्र बजाने मे और किसी को नर्तन मे रूचि है ,तो वह नृत्य के रूप में इसे अपनाता ही है।इसके अलावा अधिकांश लोगों को संगीत सुनने और सांस्कृतिक कार्यक्रम देखने में भी उतना ही आनंद आता है जितना कि एक गायक को गाने में।जिन्हें संगीत के किसी रूप से कोई रूचि नहीं है, वह मनुष्य जाति मे अपवाद है।संगीत एक भावना है, और जो मनुष्य भावुक सही मे नहीं है, वह अपवाद तो है ही और ऐसे लोग अपने को कलाकार या संगीतज्ञ कहते हैं तो वे कभी भी संगीत के ऊँचाइयों को छू नहीं सकते।
संगीत सीखना ः सर्वप्रथम यह समझ लेना आवश्यक है कि संगीत का स्वरूप चाहे जो भी हो,उसकी नींव शास्त्रीय संगीत ही है।
भाव संगीत के अनेक रूप भजन या गजल, लोकगीत या चित्रपट संगीत इत्यादि हैं।इन्हें सीखने हेतु कुछ रागों की जानकारी आवश्यक है।अलंकारों का पूरा अभ्यास, कुछ रागों के तान,द आलाप इत्यादि को नियमित रूप से स्मरण करना होगा।
शास्त्रीय संगीत सीखने में अनेक नियमों के अन्तर्गत रहना पडता है।इनकी कुछ सीमाएं होती हैं। उन सीमाओं से बाहर जाने पर रागों के नियमों का उल्लंघन माना जाता है।लेकिन ,भाव संगीत में ऐसी सीमाएं नहीं होती हैं। किसी भजन या गजल मे हम एक राग की सीमा से बाहर भी जा सकते हैं ।भाव संगीत मे शब्दों के भाव पर विशेष ध्यान दिया जाता है, जबकि शास्त्रीय संगीत मे रागों के नियम पर।
आपका दिन शुभ हो।🌷

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अंग्रेजी में एक कहावत है “Justice delayed is Justice denied” यानि देर से मिला हुआ न्याय ,न्याय नहीं मिलने के बराबर है ।यदि हम अन्याय पर अंकुश लगाने में असमर्थ हैं तो कहीं न कहीं हमारे न्याय व्यवस्था के लचीलेपन एवं खामियों को दर्शाती है।समय पर न्याय नहीं मिलने के कारण कई बार निर्दोषों को किसी और के अपराध की सजा भुगतनी पडती है।आज आवश्यकता है कमजोरों के विरुद्ध हो रहे अन्यायों के खिलाफ आवाज़ उठाने का।तो आइए आज 17 जुलाई को हम सब अन्तर्राष्ट्रीय न्याय दिवस पर कमजोरों के विरुद्ध हो रहे अन्याय के खिलाफ आवाज़ उठाकर न्याय को बढावा दे।
हमारे पूज्य गुरुदेव के सौजन्य से🙏🌷🙏

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गुरू कृपा ही केवलम् 🌷
“विवेक”
विवेक नाम का अर्थ बेहद ‘यूनिक’है।विवेक नाम का अर्थ “न्याय, विवेक, ज्ञान, भले-बुरे का ज्ञान, समझ,कारण,आदि होता है।जैसे:-विवेक से काम करना।
कारणनिरपेक्ष साधन की सिद्धि तत्काल होती है, जबकि कारणसापेक्ष साधन की सिद्धि समय पाकर होती है ।शरीर में नहीं हूँ-इसके अनुभव मे बाधा यह है कि आप इसे बुद्धि से पकडना और अनुभव करना चाहते हैं।स्वयं से होनेवाले अनुभव का आदर करें।स्वीकृति अस्वीकृति स्वयं की होती है ।मै हूँ, इसमें जो बात “हूँ”के साथ लग जाती है ,उसकी विस्मृति नहीं होती।जैसे-मै ब्राह्मण हूँ, मै धनवान हूँ आदि।अपने विवेक का अनादर करने के समान कोई पाप नहीं है।जो अपने विवेक का आदर नहीं करता, वह शास्त्र, गुरू, संत की वाणी का भी आदर नहीं कर सकता।शरीर जानेवाला है-इस विवेक का अनादर ही जन्म-मरण देनेवाला है।विवेक विरोधी संबंध का त्याग करें तो अभी मुक्ति है ।अंतःकरण शुद्ध नहीं है, अच्छे महात्मा नहीं मिले, हमारे कर्म ऐसे नहीं हैं, भगवान ने कृपा नहीं की-यह सब बहानेबाजी है।खास बीमारी यह है कि हम संयोगजन्य सुख लेना चाहते हैं।यदि आप अपने विवेक का आदर न करें तो वर्षों तक समाधि लगाने से भी कल्याण नहीं होगा ।मैं शरीर नहीं हूँ-यह स्वीकृति है, अभ्यास नहीं।यह विवेक आप सभी को है, पर आप इसका आदर नहीं करते।
हमारे पूज्य गुरुदेव के सौजन्य से।🙏

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गुरू कृपा ही केवलम् 🌷
“विवेक”
विवेक नाम का अर्थ बेहद ‘यूनिक’है।विवेक नाम का अर्थ “न्याय, विवेक, ज्ञान, भले-बुरे का ज्ञान, समझ,कारण,आदि होता है।जैसे:-विवेक से काम करना।
कारणनिरपेक्ष साधन की सिद्धि तत्काल होती है, जबकि कारणसापेक्ष साधन की सिद्धि समय पाकर होती है ।शरीर में नहीं हूँ-इसके अनुभव मे बाधा यह है कि आप इसे बुद्धि से पकडना और अनुभव करना चाहते हैं।स्वयं से होनेवाले अनुभव का आदर करें।स्वीकृति अस्वीकृति स्वयं की होती है ।मै हूँ, इसमें जो बात “हूँ”के साथ लग जाती है ,उसकी विस्मृति नहीं होती।जैसे-मै ब्राह्मण हूँ, मै धनवान हूँ आदि।अपने विवेक का अनादर करने के समान कोई पाप नहीं है।जो अपने विवेक का आदर नहीं करता, वह शास्त्र, गुरू, संत की वाणी का भी आदर नहीं कर सकता।शरीर जानेवाला है-इस विवेक का अनादर ही जन्म-मरण देनेवाला है।विवेक विरोधी संबंध का त्याग करें तो अभी मुक्ति है ।अंतःकरण शुद्ध नहीं है, अच्छे महात्मा नहीं मिले, हमारे कर्म ऐसे नहीं हैं, भगवान ने कृपा नहीं की-यह सब बहानेबाजी है।खास बीमारी यह है कि हम संयोगजन्य सुख लेना चाहते हैं।यदि आप अपने विवेक का आदर न करें तो वर्षों तक समाधि लगाने से भी कल्याण नहीं होगा ।मैं शरीर नहीं हूँ-यह स्वीकृति है, अभ्यास नहीं।यह विवेक आप सभी को है, पर आप इसका आदर नहीं करते।
हमारे पूज्य गुरुदेव के सौजन्य से।🙏

हमारे पूज्य गुरुदेव के सौजन्य से🙏

गुरू कृपा ही केवलम्🌷
“मित्र”
मित्र वह है जो आपको आपकी गलतियों और कमजोरियों का बार बार स्मरण कराती है ,ऐसा व्यक्ति किंचित आपका शत्रु नहीं हो सकता।अपितु, वह आपका शत्रु जरूर है जो आपके गलत दिशा में बढते हुए कदम को देखकर भी मुस्कुराता रहे और आपको रोकने का प्रयास न करे ।
विरोध करने वाला शत्रु नहीं, बल्कि गलत कार्यों का विरोध ना करनेवाला ही परम् शत्रु होता है ।आज अपने और पराये की परिभाषा थोडी बदल सी गई है ।लोग सोचते हैं कि स्वजन-प्रियजन वही है ,जो हर स्थिति में आपका साथ दे ,लेकिन वास्तव में प्रियजन वही है जो अप्रिय कर्म अथवा कुकर्म से सदैव आपको बचाने का प्रयास करते रहे।
दुर्योधन ने चाचा विदुर की बात मान ली होती तो महाभारत ना होता ।रावण ने विभिषण की बात मानी होती तो लंका विध्वंस ना होता ।
वास्तव में सच्चा मित्र वही है जो हमारी मति सुधार दे ।जीवन को श्रेष्ठ गति देते हुए गोविंद के चरणों में रति प्रदान कर दे।
हमारे पूज्य गुरुदेव के सौजन्य से।🙏