पिता की पुत्र को शिक्षा।💐महत्वपूर्ण पत्र।घनश्यामदास जी बिडला का अपने पुत्र वसंत कुमार जी बिडला के नाम 1934 मे लिखित एक अत्यंत प्रेरक पत्र जो हर एक को जरूर पढना चाहिए।

चि.वसंत ,

यह जो लिखता हूँ उसे बडे होकर और बूढ़े होकर भी पढना।अपने अनुभव की बात कहता हूँ।

संसार मे मनुष्य जन्म दुर्लभ है, और मनुष्य जन्म पाकर जिसने शरीर का दुरुपयोग किया ,वह पशु है।तुम्हारे पास धन.है, तन्दुरुस्ती है और अच्छे साधन हैं, उनको सेवा के लिए उपयोग किया तब तो साधन सफल है, अन्यथा वे शैतान के औजार हैं।तुम इन बातों को ध्यान में रखना।

धन का मौज -शौक मे कभी उपयोग न करना।ऐसा नहीं की धन सदा रहेगा ही,इसलिए जितने पास मे है उसका उपयोग सेवा के लिए करो ।अपने ऊपर कम-से-कम खर्च करो ,बाकी जनकल्याण और दुःखियों का दुःख दूर करने मे व्यय करो। धन शक्ति है ,इस शक्ति के नशे मे किसी के साथ अन्याय हो जाना संभव है, इसका ध्यान रखो कि अपने धन के दुरूपयोग से किसी पर अन्याय न हो।

भअपनी संतान के लिए भी यही उपदेश छोडकर जाओ ।यदि बच्चे मौज-शौक ,ऐसो-आराम वाले होंगे तो पाप करेंगे और अपने भविष्य, व्यापार को चौपट करेंगे।ऐसे नालायकों को कभी धन न देना ।धन नालायकों के हाथ मे जाये उससे पहले ही जनकल्याण के किसी काम मे लगा देना या गरीबों में बाँट देना।तुम उसे अपने मन ,अंधेपन से संतान के मोह मे स्वार्थ के लिए उपयोग नहीं कर सकते ।हम भाइयों ने अपार मिहनत से व्यापार को बढाया है, तो यह समझकर कि वे लोग धन का सदुपयोग करेंगे।

भगवान को कभी न भूलना, वह हमें अच्छी बुद्धि देता है।इंद्रियों पर काबू रखना, वरना यह तुम्हें डुबो देगी ।नित्य नियम से व्ययाम -योग करना ।स्वास्थ्य ही सबसे बडी सम्पदा है।स्वास्थ्य से ही कार्य में कुशलता आती है, कुशलता से कार्यसिद्धि और कार्यसिद्धि से समृद्धि आती है।सुख समृद्धि के लिए स्वास्थ्य ही पहली शर्त है।स्वास्थ्य के अभाव में सुख साधनों का कोई मूल्य नहीं।स्वास्थ्य सम्पदा की रक्षा हर उपाय से करना।भोजन को स्वाद के लिए नहीं दवा/टानिक समझकर खाना।स्वाद के वश होकर खाते मत रहना।जीने के लिए खाना है न कि खाने के लिए जीना।💐

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