शैशवकाल💐

मेरा शैशवकाल सामान्य बच्चों -सा रहा होगा।होश सँभालने पर धूँधली -सी स्मृति उभरती है कि यह जगह महुलीगढ ,गिद्धौर का शाही महल था।जिसे राजा शिवदान सिंह चौहान ने अपशकुन मानकर राजकीय प्रशिक्षण महाविद्यालय को भाडे पर देकर छोड दिया था।हमारे पापा जी उसी महाविद्यालय में प्राध्यापक थे।हमलोग सारा परिवार उसी महल के कोने के छोटे से हिस्से में रहते थे।वहाँ का ठीक-ठाक ज्यादा स्मरण नहीं है मुझे।इतना ही याद है कि महल का विशाल दरवाजा था।दरवाजा के सामने विशालकाय बरगद का वृक्ष था।पापाजी अपने ड्यूटी के प्रति समर्पित थे।हम सारे भाई-,बहन माँ से ही चिपके रहते थे। हमारी दादी काफी भक्तिमय स्त्री थीं।पूजा-पाठ के बिना कभी भोजन नहीं करती ,रोज मंदिर जाती और कठिन-से-कठिन ब्रत करती ।बीमार पड जाने पर भी ब्रतो को न छोडती। महुलीगढ की वह हवेली के दो-तीन कमरों मे हमलोग रहते थे।जाडे मे काफी ठंड रहती थी।माँ चूल्हे मे आग जलाकर सेंकती थी।एक बार उनकी साडी मे आग लग गयी थी।हमारे छोटे भैया महाराज के बडे पुत्र कृपाशंकर सिंह के मित्र थे।वे दोनों कहीं घूमने जाते तो मेरी भी इच्छा रहती थी कि मै भी साथ हो लूं,पर छोटे भैया समझा बुझाकर या डाँट कर मुझे घर वापस भेज देते थे। हमारे यहाँ गाय एवं तोता पालतू थे।एक भयानक अँधेरी तूफानी रात मे कोई जंगली जानवर हमारे तोता को पिँजडे समेत लेकर भाग गया था।दूसरे सुबह सामने वाले विशालकाय वृक्ष के तले तोता मृत पाया गया।मुझे पढने -लिखने की प्रवृत्ति शैशवावस्था से ही थी।मुझे इच्छा होती थी कि मै भी अपने बडे भाइयों-बहनों के साथ विद्यालय जाँऊ।इसके लिए खल्ली-छुलाई की परंपरा थी।हमारे बडे भाई-बहन प्रसंडा के स्कूल मे पढते थे।हमारे खल्ली-छुलाई के लिए सरस्वती पूजा का दिन निर्धारित हुआ। माँ हमारी आँखों में मोटा मोटा काजल लगाकर विदूषक जैसेनये कपडे पहनाकर तैयार की थी।हमारी दीदीया मुझे अपनी गोद मे उठाकर स्कूल ले गयी थी।स्कूल मे हमें मास्टर साहब के हवाले कर दिया गया था।सरस्वती माता की प्रतिमा के सामने एक नये स्लेट मे “अ” लिखकर हमारे द्वारा रख दिया गया था।पर ,वहां हमारी पढाई-लिखाई नहीं हुई।मुझे अक्षर ज्ञान कब और कहाँ हुआ, इसका मुझे स्पष्ट स्मरण नहीं है।बस इतना ही याद है कि हमारे घर जब भी माँ के पास महिलाओं का जुटान होता था तो माँ मुझे बुलाकर कोई पुस्तक वाचन करने को कहती थी,और हमें धडाधर पढने मे काफी खुशी होती थी।तब तक मै कुछ समझ नहीं पाता था।किंतु मेरे पढने के पश्चात मेरी प्रशंसा प्रारंभ होती थी कि देखो य छोटा बच्चा बडी कक्षा के पुस्तकें पढ सकता है।💐

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