जिंदगी भर नहीं भूलेंगे वो बारात😊

ये सब बहुत आद की बातें हैं।मै अपनी किशोरावस्था की ओर लौटूं ।

हमारा प्रवेश एस.पी,कालेज दुमका, मे हो गया था हमारे पापा जी दुमका मे शिक्षा विभाग के पदाधिकारी के रूप में कार्यरत थे कालेज के ठीक सामने हमारा क्वार्टर था।क्वार्टर के समीप प्राइमरी स्कूल में श्री अर्जुन ठाकुर जी शिक्षक थे।वे यदाकदा हमारे यहां आया करते थे ।हमलोग सम्मान में उन्हें चाचाजी कहकर पुकारते थे।वे हँसमुख और मिलनसार थे।दुमका मे हमारी मित्रमंडली थी ,जिसमें मास्टर साहब का भतीजा भी था।हमारी मित्रमंडली मे प्रशांत उर्फ मुन्ना था,जो हमारे छोटे भाई का Classmate था,पर दोस्ती हमसे ज्यादा था।पर हमें वह लाल भैया कहकर ही पुकारता था।हमारी मित्रमंडली मास्टर साहब से मजाक में कुछ कहती भी थी तो भी मास्टर साहब कभी बुरा नहीं मानते ,हँसकर बात टाल जाते।खासकर जब हमारी मित्रमंडली मास्टर साहब से राष्ट्र गान सुनाने का अनुरोध करती तो वे हँसकर टाल जाते।मास्टर साहब के भतीजे की शादी तय हो गयी और हमें बारात चलने का न्यौता दिया गया।बारात गोड्डा जिले के ठाकुर गंगटी प्रखंड के समीप किसी गाँव मे जाना था। हमारी पूरी मित्रमंडली के साथ हम भी जीवन की पहली बारात चलने के लिए रोमांचित थे। मुन्ना ने बताया कि उधर ही उसका ननिहाल पडता है इसलिए वह बारात चलने के लिए ज्यादा ही उत्साहित था और दबाव बनाकर हमें भी बारात चलने के लिए तैयार कर दिया।हमलोग बस मे सवार होकर चल पडे।दोपहर बाद हमलोग गोड्डा पहुंचे।ठाकुर गंगटी प्रखंड पहुंचते पहुंचते शाम हो गयी ।हमें बताया गया कि वहीं रेफरल अस्पताल परिसर में मे रूकने की व्यवस्था होगी,पर वहां किसी आदमी का अतापता नहीं था। हमलोग वहीं प्रतीक्षा करते रहे ।अँधेरा होने के बाद दूर से टिमटिमाती हुई लालटेन के साथ बैलगाड़ी पर कुछ लोग स्वागतार्थ पहुंचे।गाँव दिहात की प्रथा है कि वे लोग किसी भी दूरी को दूर नहीं बताकर कहतें हैं कि वह तो बिल्कुल पास है।हम दोनों मित्रों ने तय किया कि हमलोग पैदल ही बारात चलेंगे।बैलगाड़ी पर सवार दूल्हे के साथ पूरे बारातियों को गाँव के सारे मंदिरों की परिक्रमा कराई गयीं।दैवी स्थानों पर दंडवत कराये गये।आखिरकार बारात वधूपक्ष के द्वार पर पहुंची।बडा-सा शामियाना लगा हुआ था।हमलोगो ने चैन की साँस ली और बैठकर सोच ही रहे थे कि जोरों की आँधी-पानी से पूरा शामियाना उड गया ।जोरों की बारिश से बचने के लिए हमलोग घर मे प्रवेश कर गये।पता चला कि उस दिन एक नहीं दो जुडँवा बहनों की शादी का कार्यक्रम था।दोनों अभी तैयार ही हो रही थी।

चलिए, चलिए। आपलोग बगल वाले कमरे मे चलिए।यह रूम खाली कीजिए।

मुन्ना ने चुहल मे कह दिया ,”मै तो नहीं जाऊंगा”

वधूपक्ष वाले मुस्कुराते हुए बोले,”वो आप बारात पक्ष के हैं, इसलिए कह रहे हैं ।नहीं तो मै देखता कि कैसे नहीं जाते”

मुन्ना का चेहरा तमतमाया हुआ था।गुस्से के कारण हमलोगो को ठीक से खाया या सोया भी नहीं गया।जैसे तैसे सवेरा हुआ।मुन्ना तडके ही तैयार हो गया और कहा,”लाल भैया ,आप भी जल्दी तैयार हो जाइए।अब हमलोग यहां तनिक देर नहीं रूकेंगे।जहां बारातियों की खिदमत इस तरह की जाती है।मास्टर साहब समझाते रह गये, “मुन्ना जी,रूक जाइए, आज दिन मे विशेष खानपान की वयवस्था है,पर वह कहां मानने वाला था।नहीं, हमारा ननिहाल पास ही है और हमें लेकर निकल पडा।फिर वही ठाकुर गंगटी प्रखंड का रेफरल अस्पताल।उसके समीप दुकान में हमलोगो ने नाश्ता किया और बिना समय गँवाए आगे बढ गये।राहगीरों से रास्ता और दूरी पता कर चलते रहे ।अधिकांश राहगीर कहते कि लक्ष्मीपुर गाँव पास ही है।हमलोग चलते रहे, सामने पहाड़ी नजर आई,जिस पर चढकर हमलोग पार कर गये पर मंजिल का दूर दूर तक अतापता नहीं था।भरी दोपहिया मे भी हमलोग चलते रहे। रात मे ठीक से नहीं सोने के कारण आँखें बोझिल हो रही थीं।कभी कभी हवा की ठंढी झोंके आती तो मन करता कि वहीं कहीं सो जाएं।पर,मुन्ना हमें जगाता ,चलिए अब ज्यादा दूर नहीं है।मन करता कि अपनी ऊंगली काट लूं ताकि निद्रा पर विजय पा सकूं।पर उतनी हिम्मत नहीं थी।शरीर को घसीटते हुए मुन्ना के पीछे चल पडा।कुछेक छोटी पहाडियों को पार करने के बाद शाम हो गई।दूर गाडियों की लाइट नजर आने के बाद बांछें खिल उठीं।सामने सडक पर वाहनों का आवागमन हो रहा था।पर,हाय री किस्मत!हमलोगो के सामने एक बरसाती नदी रास्ता रोके हमें चिढा रही थी,जिसके ओर-छोर का पता नहीं था।जल प्रवाह धीरे-धीरे बढ ही रहा था।हमदोनों एक दूसरे का हाथ पकड कर डूबते हुए पार होकर सडक पर पहुंचे।वहां कुछ नाश्ता कर लक्ष्मीपुर गांव पहुंचे।ननिहाल पहूंच कर मूर्छित होकर गिर पडे।रात मे कोई हमें खाना खाने के लिए जगाने आये।खाना खाकर जो हम सोये तो आँखें खुली तो सूरज चढ चुका था।तैयार होकर हमलोग सडक के माध्यम दुमका वापस लौट गये।

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