वास्तुसर्प 🙏

संथाल परगना जिले (सम्प्रति झारखंड प्रदेश) के पाकुड़ निवास मे बिताये गये लगभग 5-6 वर्षों मे जो घटित हुआ उसमें से कुछ बातें हमारे द्वारा “छोटी-सी भूल” मे लिखा गया है। हमारा निवास चारों ओर से झाडियों से घिरा हुआ था।क्वार्टर हमें जीर्ण-शीर्ण अवस्था में मिला था।उसे मरम्मत करवा कर हमलोग रह रहे थे।उस निवास मे दो कमरे,बडा-सा बरामदा ,आँगन और आँगन के पार छोटी-सी रसोई घर थी।हमारा आवास अनाजों से हमेशा भरा रहता था।निवास के चारों तरफ झाडियों मे अक्सर सर्पों के दर्शन हो जाया करते थे।हमारे यहां साँपों को मारने का रिवाज नहीं है, क्यूंकि हमारे यहाँ उनकी बहुत श्रद्धा के साथ पूजा होती है ।एक सवेरे तो हमारे रसोई घर मे चूल्हे की राख के साथ माता जी के हाथों में बहरा सर्प आ गया जिसे उठाकर हमारे द्वारा दूर मैदान में छोडा गया था। हमारे नौकर शंकर जी जब आउट हाउस से गोइठा निकाल रहे थे तो बडा सा नागदेवता जो किसी जीव का भक्षण कर वहां आराम फरमाते हुए पाये गये।

हमलोगों के पाकुड़ निवास के दौरान एक अजीब बात हमें स्मरण हो रही है कि वहां बारी-बारी से परिवार के सभी सदस्य बीमार पडते रहे।खासकर बडे भैया कई महीनों तक गंभीर रूप से बीमार रहे।उनकी खटिया बरामदे मे ही रहती थी।उस समय बिजली तो थी नहीं ,एक लैम्प रात भर जलता रहता था। एक रात की बात है एक बडा-सा सर्प निकल कर बडे भैया जहां सोये हुए थे उस खाट के समीप जलते हुए लैम्प के कीटों का भक्षण कर रहे थे।पता नहीं कैसे छोटे भैया की नजर उस पर पड गयी ।वे जोर से चिल्लाये ।मै तो साँप देखकर सहम-सा गया था और हमारी बोलती बंद हो गयी थी ।छोटे भैया के चिल्लाते ही सर्प तेजी से बरामदे के कोने मे अवस्थित एक छोटी सुराख की ओर भागा और प्रवेश कर गया ।छोटे भैया चाहते थे कि उसे घर से बाहर किया जाये।उन्होंने उसके पूँछ को लाठी से दबा दिया और हमें पूँछ पकडकर खींचने को कहा।हमारे द्वारा पूँछ पकड़ कर खींचने की कोशिश की गई, पर सर्प की पकड इतनी मजबूत थी कि उसके पूंछ का छोटा हिस्सा हमारे हाथ मे आ गया और सर्प उसमे प्रवेश कर गया ।दूसरे दिन हमलोगों के द्वारा उस सुराख को सीमेंट से बंद कर दिया गया।बाद मे कई पंडितों-विद्वानों से चर्चा हुई तो उन्होंने बताया कि वह वास्तुसर्प था ,जो बहुत समय से वहां रह रहा था।💐

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