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🔮अनमोल मोती🔮
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आदमी के हाथ मे कुछ भी नही है, अपने स्वयं के शरीर की छोटी से छोटी क्रिया तक अपने हाथ मे नही है , छींक तक । अपने ही शरीर के किसी भी वेग का नियन्त्रण आदमी के स्वयं के हाथ मे नही है, बाक़ी और तो क्या होगा।श्वास तक अपने नियन्त्रण मे नहीं है , जब तक चल रही है, चल रही है, जब रूक जायेगी, तब एक साँस तक न ली जा सकेगी, गला सुखा हुआ होगा,प्यास घनीभूत होगी, पर एक घूँट पानी अंदर न जा सकेगा, तब पता चलेगा कि आदमी कितना असहाय है, जो चल रहा था, उसे चलाने वाला वो नही था ,कोई और ही शक्ति चला रही थी, ये अंत मे तो पता चलता है, पर ये अनुभूति यदि बहुत पहले हो जाये, तो सारा अंहकार गिर जाये , सारे झगड़े , सारे फ़साद, सारे उपद्रव , ख़त्म हो जाये।जिसने ऐसा जान लिया कि मैं नहीं , कोई और ही है, जिससे मेरे साथ साथ सारा अस्तित्व तरंगायित है, चलाये मान है, और वो शक्ति है परमात्मा , जिसने भी ऐसा जान लिया, वही ज्ञानी है, फिर अंहकार नही बच सकता , और जिसने इसे अभी तक नही जाना, वही अज्ञानी है।

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