हे दयानिधे ! रथ रोको अब,क्यों प्रलय की तैयारी है ।ये बिना शस्त्र का युद्ध है जो,महाभारत से भी भारी है ।कितने परिचित कितने अपने,कितने आखिर यूँ ही चले गए ।जिन हाथों में दौलत-संबल,सब क्रूर काल से छले गए ।हे राघव-माधव-मृत्युंजय,पिंघलो ये अर्ज हमारी है ।ये बिना शस्त्र का युद्ध है जो,महाभारत से भी भारी है ।।🙏 सुप्रभात🙏

महिला. दिवस की शुभकामनाएं🙏🏼

हमारे पूज्य गुरुदेव के सौजन्य से।🙏

🌳🦚आज की दूसरी कहानी🦚🌳

💐💐राजाभोज और व्यापारी💐💐

यह एक मनोवैज्ञानिक सत्य है कि जैसा भाव हमारे मन मेे होता है वैसा ही भाव सामने वाले के मन में आता है। इस सबंध में एक ऐतिहासिक घटना सुनी जाती है जो इस प्रकार है-

एक बार राजा भोज की सभा में एक व्यापारी ने प्रवेश किया। राजा ने उसे देखा तो देखते ही उनके मन में आया कि इस व्यापारी का सबकुछ छीन लिया जाना चाहिए। व्यापारी के जाने के बाद राजा ने सोचा –

मै प्रजा को हमेशा न्याय देता हूं। आज मेेरे मन में यह अन्याय पूर्ण भाव क्यों आ गया कि व्यापारी की संपत्ति छीन ली जाये?

उसने अपने मंत्री से सवाल किया मंत्री ने कहा, “इसका सही जवाब कुछ दिन बाद दे पाउंगा, राजा ने मंत्री की बात स्वीकार कर ली। मंत्री विलक्षण बुद्धि का था वह इधर-उधर के सोच-विचार में सयम न खोकर सीधा व्यापारी से मिलने पहूंचा। व्यापारी से दोस्ती करके उसने व्यापारी से पूछा, “तुम इतने चिंतित और दुखी क्यों हो? तुम तो भारी मुनाफे वाला चंदन का व्यापार करते हो।”

व्यापारी बोला, “धारा नगरी सहित मैं कई नगरों में चंदन की गाडीयां भरे फिर रहा हूं, पर चंदन इस बार चन्दन की बिक्री ही नहीं हुई! बहुत सारा धन इसमें फंसा पडा है। अब नुकसान से बच पाने का कोई उपाय नहीं है।

व्यापारी की बातें सुन मंत्री ने पूछा, “क्या अब कोई भी रास्ता नही बचा है?”

व्यापारी हंस कर कहने लगा अगर राजा भोज की मृत्यु हो जाये तो उनके दाह-संस्कार के लिए सारा चंदन बिक सकता है।

मंत्री को राजा का उत्तर देने की सामग्री मिल चुकी थी। अगले दिन मंत्री ने व्यापारी से कहा कि, तुम प्रतिदिन राजा का भोजन पकाने के लिए एक मन ४० किलो चंदन दे दिया करो और नगद पैसे उसी समय ले लिया करो। व्यापारी मंत्री के आदेश को सुनकर बड़ा खुश हुूआ। वह अब मन ही मन राजा की लंबी उम्र होने की कामना करने लगा।

एक दिन राज-सभा चल रही थी। व्यापारी दोबारा राजा को वहां दिखाई दे गया। तो राजा सोचने लगा यह कितना आकर्षक व्यक्ति है इसे क्या पुरस्कार दिया जाये?

राजा ने मंत्री को बुलाया और पूछा, “मंत्रीवर, यह व्यापारी जब पहली बार आया था तब मैंने तुमसे कुछ पूछा था, उसका उत्तर तुमने अभी तक नहीं दिया। खैर, आज जब मैंने इसे देखा तो मेरे मन का भाव बदल गया! पता नहीं आज मैं इसपर खुश क्यों हो रहा हूँ और इसे इनाम देना चाहता हूँ!

मंत्री को तो जैसे इसी क्षण की प्रतीक्षा थी। उसने समझाया-

महाराज! दोनों ही प्रश्नों का उत्तर आज दे रहा हूं। जब यह पहले आया था तब अपनी चन्दन की लकड़ियों का ढेर बेंचने के लिए आपकी मृत्यु के बारे में सोच रहा था। लेकिन अब यह रोज आपके भोजन के लिए एक मन लकड़ियाँ देता है इसलिए अब ये आपके लम्बे जीवन की कामना करता है। यही कारण है कि पहले आप इसे दण्डित करना चाहते थे और अब इनाम देना चाहते हैं।

मित्रों, अपनी जैसी भावना होती है वैसा ही प्रतिबिंब दूसरे के मन पर पड़ने लगता है। जैसे हम होते है वैसे ही परिस्थितियां हमारी ओर आकर्षित होती हैं। हमारी जैसी सोच होगी वैसे ही लोग हमें मिलेंगे। यहीं इस जगत का नियम है – हम जैसा बोते हैं वैसा काटते हैं…हम जैसा दूसरों के लिए मन में भाव रखते हैं वैसा ही भाव दूसरों के मन में हमारे प्रति हो जाता है!

अतः इस कहानी से हमें ये सीख मिलती है कि हमेशा औरों के प्रति सकारात्मक भाव रखें।

💐💐💐💐

सदैव प्रसन्न रहिये।
जो प्राप्त है, पर्याप्त है।।
🙏🙏🙏🙏🌳🌳🙏🙏🙏🙏🙏

हमारे पूज्य गुरूदेव के सौजन्य से🙏

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मुंसी प्रेमचंद जी की एक सुंदर कविता, जिसके एक-एक शब्द को बार-बार पढ़ने को मन करता है-

ख्वाहिश नहीं मुझे
मशहूर होने की,” _आप मुझे पहचानते हो_ _बस इतना ही काफी है।_

अच्छे ने अच्छा और
बुरे ने बुरा जाना मुझे, _जिसकी जितनी जरूरत थी_ _उसने उतना ही पहचाना मुझे!_

जिन्दगी का फलसफा भी
कितना अजीब है, _शामें कटती नहीं और_ _साल गुजरते चले जा रहे हैं!_

एक अजीब सी
‘दौड़’ है ये जिन्दगी, _जीत जाओ तो कई_ _अपने पीछे छूट जाते हैं और_

हार जाओ तो
अपने ही पीछे छोड़ जाते हैं!

बैठ जाता हूँ
मिट्टी पे अक्सर, _मुझे अपनी_ _औकात अच्छी लगती है।_

मैंने समंदर से
सीखा है जीने का सलीका, _चुपचाप से बहना और_ _अपनी मौज में रहना।_

ऐसा नहीं कि मुझमें
कोई ऐब नहीं है, _पर सच कहता हूँ_ _मुझमें कोई फरेब नहीं है।_

जल जाते हैं मेरे अंदाज से
मेरे दुश्मन, _एक मुद्दत से मैंने_ _न तो मोहब्बत बदली_ _और न ही दोस्त बदले हैं।_

एक घड़ी खरीदकर
हाथ में क्या बाँध ली, _वक्त पीछे ही_ _पड़ गया मेरे!_

सोचा था घर बनाकर
बैठूँगा सुकून से, _पर घर की जरूरतों ने_ _मुसाफिर बना डाला मुझे!_

सुकून की बात मत कर
ऐ गालिब, _बचपन वाला इतवार_ _अब नहीं आता!_

जीवन की भागदौड़ में
क्यूँ वक्त के साथ रंगत खो जाती है ? _हँसती-खेलती जिन्दगी भी_ _आम हो जाती है!_

एक सबेरा था
जब हँसकर उठते थे हम, _और आज कई बार बिना मुस्कुराए_ _ही शाम हो जाती है!_

कितने दूर निकल गए
रिश्तों को निभाते-निभाते, _खुद को खो दिया हमने_ _अपनों को पाते-पाते।_

लोग कहते हैं
हम मुस्कुराते बहुत हैं, _और हम थक गए_ _दर्द छुपाते-छुपाते!_

खुश हूँ और सबको
खुश रखता हूँ, _लापरवाह हूँ ख़ुद के लिए_ _मगर सबकी परवाह करता हूँ।_

मालूम है
कोई मोल नहीं है मेरा फिर भी _कुछ अनमोल लोगों से_ _रिश्ते रखता हूँ। शुभ प्रभात

हमारे पूज्य गुरुदेव के सौजन्य से🙏

जीवन जीने के लिए
सबक तथा साथ दोनों
आवश्यक होता है।

माली पौधों में पानी
प्रतिदिन देता है,
लेकिन फल सिर्फ
मौसम में ही आता है।

इसीलिये जीवन में धैर्य रखें,
हर काम अपने समय पर ही होगा।

यदि हारने की कोई संभावना ना हो,
तो जीतने का कोई मतलब नहीं है।

शैशवकाल💐

मेरा शैशवकाल सामान्य बच्चों -सा रहा होगा।होश सँभालने पर धूँधली -सी स्मृति उभरती है कि यह जगह महुलीगढ ,गिद्धौर का शाही महल था।जिसे राजा शिवदान सिंह चौहान ने अपशकुन मानकर राजकीय प्रशिक्षण महाविद्यालय को भाडे पर देकर छोड दिया था।हमारे पापा जी उसी महाविद्यालय में प्राध्यापक थे।हमलोग सारा परिवार उसी महल के कोने के छोटे […]

शैशवकाल💐

वास्तुसर्प 🙏

संथाल परगना जिले (सम्प्रति झारखंड प्रदेश) के पाकुड़ निवास मे बिताये गये लगभग 5-6 वर्षों मे जो घटित हुआ उसमें से कुछ बातें हमारे द्वारा “छोटी-सी भूल” मे लिखा गया है। हमारा निवास चारों ओर से झाडियों से घिरा हुआ था।क्वार्टर हमें जीर्ण-शीर्ण अवस्था में मिला था।उसे मरम्मत करवा कर हमलोग रह रहे थे।उस निवास मे दो कमरे,बडा-सा बरामदा ,आँगन और आँगन के पार छोटी-सी रसोई घर थी।हमारा आवास अनाजों से हमेशा भरा रहता था।निवास के चारों तरफ झाडियों मे अक्सर सर्पों के दर्शन हो जाया करते थे।हमारे यहां साँपों को मारने का रिवाज नहीं है, क्यूंकि हमारे यहाँ उनकी बहुत श्रद्धा के साथ पूजा होती है ।एक सवेरे तो हमारे रसोई घर मे चूल्हे की राख के साथ माता जी के हाथों में बहरा सर्प आ गया जिसे उठाकर हमारे द्वारा दूर मैदान में छोडा गया था। हमारे नौकर शंकर जी जब आउट हाउस से गोइठा निकाल रहे थे तो बडा सा नागदेवता जो किसी जीव का भक्षण कर वहां आराम फरमाते हुए पाये गये।

हमलोगों के पाकुड़ निवास के दौरान एक अजीब बात हमें स्मरण हो रही है कि वहां बारी-बारी से परिवार के सभी सदस्य बीमार पडते रहे।खासकर बडे भैया कई महीनों तक गंभीर रूप से बीमार रहे।उनकी खटिया बरामदे मे ही रहती थी।उस समय बिजली तो थी नहीं ,एक लैम्प रात भर जलता रहता था। एक रात की बात है एक बडा-सा सर्प निकल कर बडे भैया जहां सोये हुए थे उस खाट के समीप जलते हुए लैम्प के कीटों का भक्षण कर रहे थे।पता नहीं कैसे छोटे भैया की नजर उस पर पड गयी ।वे जोर से चिल्लाये ।मै तो साँप देखकर सहम-सा गया था और हमारी बोलती बंद हो गयी थी ।छोटे भैया के चिल्लाते ही सर्प तेजी से बरामदे के कोने मे अवस्थित एक छोटी सुराख की ओर भागा और प्रवेश कर गया ।छोटे भैया चाहते थे कि उसे घर से बाहर किया जाये।उन्होंने उसके पूँछ को लाठी से दबा दिया और हमें पूँछ पकडकर खींचने को कहा।हमारे द्वारा पूँछ पकड़ कर खींचने की कोशिश की गई, पर सर्प की पकड इतनी मजबूत थी कि उसके पूंछ का छोटा हिस्सा हमारे हाथ मे आ गया और सर्प उसमे प्रवेश कर गया ।दूसरे दिन हमलोगों के द्वारा उस सुराख को सीमेंट से बंद कर दिया गया।बाद मे कई पंडितों-विद्वानों से चर्चा हुई तो उन्होंने बताया कि वह वास्तुसर्प था ,जो बहुत समय से वहां रह रहा था।💐

वे सघर्ष के दिन💐

दिसंबर 1985 मे कई प्रतियोगिता परीक्षा मे असफल हो गया।हमारे अनुज ने एकमात्र साक्षात्कार जिसका आवेदन पत्र हमारे द्वारा तैयार किया गया मे सफलता प्राप्त कर ली ।जाहिर है कि इतने परिश्रम के बाद भी असफल होने से मै काफी व्यथित हो गया था।मै बुरी तरह निराश था।पटना में हमारे संगीत शौक एवं गुनगुनाने की आदत के विरूद्ध काफी शिकायत की गई।पापा जी ने पटना छोडकर मुंगेर वापस लौटने का आदेश दिया।फिर सारे सामान ,भारी भारी किताबों को उठाकर मुंगेर लेकर लौट आया।व्यथित मन से भटकते हुए गंगा के किनारे कष्टहरणी घाट पहुंचा।गंगा नदी के किनारे काफी देर बैठने के बाद नरसिंह बाबू, ज्योतिषाचार्य के घर शास्त्रीनगर चले गये संयोग से उनसे मुलाकात हो गई।हमारे कुछ कहने के पहले ही उन्होंने पूछ लिया कि मै क्यूँ दुःखी हूँ।हमारे द्वारा पूरी बात सुनाई गई।नरसिंह बाबू ने हमसे जन्मदिन और जन्मस्थान की जानकारी प्राप्त कर हमारी कुंडली तैयार कर दिया और कहा कि जीवन जैसे जैसे खुलता जाता है ,उसे उसी रूप मे लेना चाहिए।उन्होंने आगे कहा,”अपने भाग्य को स्वीकार करो और जीवन में आगे बढो ।तुम्हारी तकदीर मे क्या क्या बनना लिखा है ये अभी स्पष्ट नहीं है ।लेकिन, सही समय पर वो सामने आ जायेगा ।पिछली असफलता को भूल जाओ। क्रमशः……

जिंदगी भर नहीं भूलेंगे वो बारात😊

ये सब बहुत आद की बातें हैं।मै अपनी किशोरावस्था की ओर लौटूं ।

हमारा प्रवेश एस.पी,कालेज दुमका, मे हो गया था हमारे पापा जी दुमका मे शिक्षा विभाग के पदाधिकारी के रूप में कार्यरत थे कालेज के ठीक सामने हमारा क्वार्टर था।क्वार्टर के समीप प्राइमरी स्कूल में श्री अर्जुन ठाकुर जी शिक्षक थे।वे यदाकदा हमारे यहां आया करते थे ।हमलोग सम्मान में उन्हें चाचाजी कहकर पुकारते थे।वे हँसमुख और मिलनसार थे।दुमका मे हमारी मित्रमंडली थी ,जिसमें मास्टर साहब का भतीजा भी था।हमारी मित्रमंडली मे प्रशांत उर्फ मुन्ना था,जो हमारे छोटे भाई का Classmate था,पर दोस्ती हमसे ज्यादा था।पर हमें वह लाल भैया कहकर ही पुकारता था।हमारी मित्रमंडली मास्टर साहब से मजाक में कुछ कहती भी थी तो भी मास्टर साहब कभी बुरा नहीं मानते ,हँसकर बात टाल जाते।खासकर जब हमारी मित्रमंडली मास्टर साहब से राष्ट्र गान सुनाने का अनुरोध करती तो वे हँसकर टाल जाते।मास्टर साहब के भतीजे की शादी तय हो गयी और हमें बारात चलने का न्यौता दिया गया।बारात गोड्डा जिले के ठाकुर गंगटी प्रखंड के समीप किसी गाँव मे जाना था। हमारी पूरी मित्रमंडली के साथ हम भी जीवन की पहली बारात चलने के लिए रोमांचित थे। मुन्ना ने बताया कि उधर ही उसका ननिहाल पडता है इसलिए वह बारात चलने के लिए ज्यादा ही उत्साहित था और दबाव बनाकर हमें भी बारात चलने के लिए तैयार कर दिया।हमलोग बस मे सवार होकर चल पडे।दोपहर बाद हमलोग गोड्डा पहुंचे।ठाकुर गंगटी प्रखंड पहुंचते पहुंचते शाम हो गयी ।हमें बताया गया कि वहीं रेफरल अस्पताल परिसर में मे रूकने की व्यवस्था होगी,पर वहां किसी आदमी का अतापता नहीं था। हमलोग वहीं प्रतीक्षा करते रहे ।अँधेरा होने के बाद दूर से टिमटिमाती हुई लालटेन के साथ बैलगाड़ी पर कुछ लोग स्वागतार्थ पहुंचे।गाँव दिहात की प्रथा है कि वे लोग किसी भी दूरी को दूर नहीं बताकर कहतें हैं कि वह तो बिल्कुल पास है।हम दोनों मित्रों ने तय किया कि हमलोग पैदल ही बारात चलेंगे।बैलगाड़ी पर सवार दूल्हे के साथ पूरे बारातियों को गाँव के सारे मंदिरों की परिक्रमा कराई गयीं।दैवी स्थानों पर दंडवत कराये गये।आखिरकार बारात वधूपक्ष के द्वार पर पहुंची।बडा-सा शामियाना लगा हुआ था।हमलोगो ने चैन की साँस ली और बैठकर सोच ही रहे थे कि जोरों की आँधी-पानी से पूरा शामियाना उड गया ।जोरों की बारिश से बचने के लिए हमलोग घर मे प्रवेश कर गये।पता चला कि उस दिन एक नहीं दो जुडँवा बहनों की शादी का कार्यक्रम था।दोनों अभी तैयार ही हो रही थी।

चलिए, चलिए। आपलोग बगल वाले कमरे मे चलिए।यह रूम खाली कीजिए।

मुन्ना ने चुहल मे कह दिया ,”मै तो नहीं जाऊंगा”

वधूपक्ष वाले मुस्कुराते हुए बोले,”वो आप बारात पक्ष के हैं, इसलिए कह रहे हैं ।नहीं तो मै देखता कि कैसे नहीं जाते”

मुन्ना का चेहरा तमतमाया हुआ था।गुस्से के कारण हमलोगो को ठीक से खाया या सोया भी नहीं गया।जैसे तैसे सवेरा हुआ।मुन्ना तडके ही तैयार हो गया और कहा,”लाल भैया ,आप भी जल्दी तैयार हो जाइए।अब हमलोग यहां तनिक देर नहीं रूकेंगे।जहां बारातियों की खिदमत इस तरह की जाती है।मास्टर साहब समझाते रह गये, “मुन्ना जी,रूक जाइए, आज दिन मे विशेष खानपान की वयवस्था है,पर वह कहां मानने वाला था।नहीं, हमारा ननिहाल पास ही है और हमें लेकर निकल पडा।फिर वही ठाकुर गंगटी प्रखंड का रेफरल अस्पताल।उसके समीप दुकान में हमलोगो ने नाश्ता किया और बिना समय गँवाए आगे बढ गये।राहगीरों से रास्ता और दूरी पता कर चलते रहे ।अधिकांश राहगीर कहते कि लक्ष्मीपुर गाँव पास ही है।हमलोग चलते रहे, सामने पहाड़ी नजर आई,जिस पर चढकर हमलोग पार कर गये पर मंजिल का दूर दूर तक अतापता नहीं था।भरी दोपहिया मे भी हमलोग चलते रहे। रात मे ठीक से नहीं सोने के कारण आँखें बोझिल हो रही थीं।कभी कभी हवा की ठंढी झोंके आती तो मन करता कि वहीं कहीं सो जाएं।पर,मुन्ना हमें जगाता ,चलिए अब ज्यादा दूर नहीं है।मन करता कि अपनी ऊंगली काट लूं ताकि निद्रा पर विजय पा सकूं।पर उतनी हिम्मत नहीं थी।शरीर को घसीटते हुए मुन्ना के पीछे चल पडा।कुछेक छोटी पहाडियों को पार करने के बाद शाम हो गई।दूर गाडियों की लाइट नजर आने के बाद बांछें खिल उठीं।सामने सडक पर वाहनों का आवागमन हो रहा था।पर,हाय री किस्मत!हमलोगो के सामने एक बरसाती नदी रास्ता रोके हमें चिढा रही थी,जिसके ओर-छोर का पता नहीं था।जल प्रवाह धीरे-धीरे बढ ही रहा था।हमदोनों एक दूसरे का हाथ पकड कर डूबते हुए पार होकर सडक पर पहुंचे।वहां कुछ नाश्ता कर लक्ष्मीपुर गांव पहुंचे।ननिहाल पहूंच कर मूर्छित होकर गिर पडे।रात मे कोई हमें खाना खाने के लिए जगाने आये।खाना खाकर जो हम सोये तो आँखें खुली तो सूरज चढ चुका था।तैयार होकर हमलोग सडक के माध्यम दुमका वापस लौट गये।