हमारे पूज्य गुरुदेव के सौजन्य से🙏🏼

एक आदमी ने एक पेंटर को बुलाया और अपनी नाव दिखाकर कहा कि इसको पेंट कर दो !

पेंटर ने उस नाव को लाल रंग से पेंट कर दिया जैसा कि नाव का मालिक चाहता था।
फिर पेंटर ने अपने पैसे लिए और चला गया !

अगले दिन, पेंटर के घर पर वह नाव का मालिक पहुँचा और उसने एक बहुत बड़ी धनराशि का चेक उस पेंटर को दिया!

पेंटर भौंचक्का हो गया और पूछा – ये इतने सारे पैसे किस बात के हैं ?
मेरे पैसे तो आपने कल ही दे दिया थे !

मालिक ने कहा – भाई, ये पेंट का पैसा नहीं है, बल्कि ये उस नाव में जो “छेद” था, उसको रिपेयर करने का पैसा है !

पेंटर ने कहा – अरे साहब, वो तो एक छोटा सा छेद था, सो मैंने बंद कर दिया था। उस छोटे से छेद के लिए इतना पैसा मुझे ठीक नहीं लग रहा है !

मालिक ने कहा – दोस्त, तुम्हें पूरी बात पता नहीं !अच्छा में विस्तार से बताता हूँ। जब मैंने तुम्हें पेंट के लिए कहा तो जल्दबाजी में, मैं तुम्हें ये बताना भूल गया कि नाव में एक छेद भी है उसको रिपेयर कर देना !

और जब पेंट सूख गया, तो मेरे दोनों बच्चे उस नाव को लेकर समुद्र में नौकायन के लिए निकल गए !

मैं उस वक़्त घर पर नहीं था, लेकिन जब लौट कर आया और अपनी पत्नी से ये सुना कि बच्चे नाव को लेकर नौकायन पर निकल गए हैं ! तो मैं बदहवास हो गया। क्योंकि मुझे याद आया कि नाव में तो छेद है !

मैं गिरता पड़ता भागा उस तरफ, जिधर मेरे प्यारे बच्चे गए थे।
लेकिन थोड़ी दूर पर मुझे मेरे बच्चे दिख गए, जो सकुशल वापस आ रहे थे !

अब मेरी ख़ुशी और प्रसन्नता का आलम तुम समझ सकते हो !

फिर मैंने छेद चेक किया तो पता चला कि मुझे बिना बताये तुम उसको रिपेयर कर चुके हो !

तो मेरे दोस्त उस महान कार्य के लिए तो ये पैसे भी बहुत थोड़े हैं !

मेरी औकात नहीं कि उस कार्य के बदले तुम्हें ठीक ठाक पैसे दे पाऊं !

जीवन में “भलाई का कार्य” जब मौका लगे हमेशा कर देना चाहिए, भले ही वो बहुत छोटा सा कार्य ही क्यों न हो !

क्योंकि कभी कभी वो छोटा सा कार्य भी किसी के लिए बहुत अमूल्य हो सकता है।

सभी मित्रों को जिन्होंने ‘हमारी जिन्दगी की नाव’ कभी भी रिपेयर की है उन्हें हार्दिक धन्यवाद …..

और हम सब सदैव प्रयत्नशील रहें कि हम सभी किसी की नाव रिपेयरिंग करने के लिए हमेशा तत्पर रहें …

🙏🙏🏼

किसी दिन सुबह उठकर एक बार इसका जायज़ा लीजियेगा कि कितने घरों में अगली पीढ़ी के बच्चे रह रहे हैं ? कितने बाहर निकलकर नोएडा, गुड़गांव, पूना, बेंगलुरु, चंडीगढ़,बॉम्बे, कलकत्ता, मद्रास, हैदराबाद, बड़ौदा जैसे बड़े शहरों में जाकर बस गये हैं?
कल आप एक बार उन गली मोहल्लों से पैदल निकलिएगा जहां से आप बचपन में स्कूल जाते समय या दोस्तों के संग मस्ती करते हुए निकलते थे।
तिरछी नज़रों से झांकिए.. हर घर की ओर आपको एक चुपचाप सी सुनसानियत मिलेगी, न कोई आवाज़, न बच्चों का शोर, बस किसी किसी घर के बाहर या खिड़की में आते जाते लोगों को ताकते बूढ़े जरूर मिल जायेंगे।
आखिर इन सूने होते घरों और खाली होते मुहल्लों के कारण क्या हैं ?
भौतिकवादी युग में हर व्यक्ति चाहता है कि उसके एक बच्चा और ज्यादा से ज्यादा दो बच्चे हों और बेहतर से बेहतर पढ़ें लिखें। उनको लगता है या फिर दूसरे लोग उसको ऐसा महसूस कराने लगते हैं कि छोटे शहर या कस्बे में पढ़ने से उनके बच्चे का कैरियर खराब हो जायेगा या फिर बच्चा बिगड़ जायेगा। बस यहीं से बच्चे निकल जाते हैं बड़े शहरों के होस्टलों में। अब भले ही दिल्ली और उस छोटे शहर में उसी क्लास का सिलेबस और किताबें वही हों मगर मानसिक दबाव सा आ जाता है बड़े शहर में पढ़ने भेजने का।
हालांकि इतना बाहर भेजने पर भी मुश्किल से 1% बच्चे IIT, PMT या CLAT वगैरह में निकाल पाते हैं…। फिर वही मां बाप बाकी बच्चों का पेमेंट सीट पर इंजीनियरिंग, मेडिकल या फिर बिज़नेस मैनेजमेंट में दाखिला कराते हैं। 4 साल बाहर पढ़ते पढ़ते बच्चे बड़े शहरों के माहौल में रच बस जाते हैं। फिर वहीं नौकरी ढूंढ लेते हैं । सहपाठियों से शादी भी कर लेते हैं।आपको तो शादी के लिए हां करना ही है ,अपनी इज्जत बचानी है तो, अन्यथा शादी वह करेंगे ही अपने इच्छित साथी से। अब त्यौहारों पर घर आते हैं माँ बाप के पास सिर्फ रस्म अदायगी हेतु। माँ बाप भी सभी को अपने बच्चों के बारे में गर्व से बताते हैं । दो तीन साल तक उनके पैकेज के बारे में बताते हैं। एक साल, दो साल, कुछ साल बीत गये । मां बाप बूढ़े हो रहे हैं । बच्चों ने लोन लेकर बड़े शहरों में फ्लैट ले लिये हैं।
अब अपना फ्लैट है तो त्योहारों पर भी जाना बंद।
अब तो कोई जरूरी शादी ब्याह में ही आते जाते हैं। अब शादी ब्याह तो बेंकट हाल में होते हैं तो मुहल्ले में और घर जाने की भी ज्यादा जरूरत नहीं पड़ती है। होटल में ही रह लेते हैं। हाँ शादी ब्याह में कोई मुहल्ले वाला पूछ भी ले कि भाई अब कम आते जाते हो तो छोटे शहर, छोटे माहौल और बच्चों की पढ़ाई का उलाहना देकर बोल देते हैं कि अब यहां रखा ही क्या है?
खैर, बेटे बहुओं के साथ फ्लैट में शहर में रहने लगे हैं । अब फ्लैट में तो इतनी जगह होती नहीं कि बूढ़े खांसते बीमार माँ बाप को साथ में रखा जाये। बेचारे पड़े रहते हैं अपने बनाये या पैतृक मकानों में।
कोई बच्चा बागवान पिक्चर की तरह मां बाप को आधा – आधा रखने को भी तैयार नहीं। अब साहब, घर खाली खाली, मकान खाली खाली और धीरे धीरे मुहल्ला खाली हो रहा है। अब ऐसे में छोटे शहरों में कुकुरमुत्तों की तरह उग आये “प्रॉपर्टी डीलरों” की गिद्ध जैसी निगाह इन खाली होते मकानों पर पड़ती है । वो इन बच्चों को घुमा फिरा कर उनके मकान के रेट समझाने शुरू करते हैं । उनको गणित समझाते हैं कि कैसे घर बेचकर फ्लैट का लोन खत्म किया जा सकता है । एक प्लाट भी लिया जा सकता है। साथ ही ये किसी बड़े लाला को इन खाली होते मकानों में मार्केट और गोदामों का सुनहरा भविष्य दिखाने लगते हैं।
बाबू जी और अम्मा जी को भी बेटे बहू के साथ बड़े शहर में रहकर आराम से मज़ा लेने के सपने दिखाकर मकान बेचने को तैयार कर लेते हैं।
आप स्वयं खुद अपने ऐसे पड़ोसी के मकान पर नज़र रखते हैं । खरीद कर डाल देते हैं कि कब मार्केट बनाएंगे या गोदाम, जबकि आपका खुद का बेटा छोड़कर पूना की IT कंपनी में काम कर रहा है इसलिए आप खुद भी इसमें नहीं बस पायेंगे।
हर दूसरा घर, हर तीसरा परिवार सभी के बच्चे बाहर निकल गये हैं।
वही बड़े शहर में मकान ले लिया है, बच्चे पढ़ रहे हैं,अब वो वापस नहीं आयेंगे। छोटे शहर में रखा ही क्या है । इंग्लिश मीडियम स्कूल नहीं है, हॉबी क्लासेज नहीं है, IIT/PMT की कोचिंग नहीं है, मॉल नहीं है, माहौल नहीं है, कुछ नहीं है साहब, आखिर इनके बिना जीवन कैसे चलेगा?
पर कभी UPSC ,CIVIL SERVICES का रिजल्ट उठा कर देखियेगा, सबसे ज्यादा लोग ऐसे छोटे शहरों से ही मिलेंगे। बस मन का वहम है। मेरे जैसे लोगों के मन के किसी कोने में होता है कि भले ही बेटा कहीं फ्लैट खरीद ले, मगर रहे अपने उसी छोटे शहर या गांव में अपने लोगों के बीच में । पर जैसे ही मन की बात रखते हैं, बुद्धिजीवी अभिजात्य पड़ोसी समझाने आ जाते है कि “अरे पागल हो गये हो, यहाँ बसोगे, यहां क्या रखा है?”
वो भी गिद्ध की तरह मकान बिकने का इंतज़ार करते हैं, बस सीधे कह नहीं सकते।

अब ये मॉल, ये बड़े स्कूल, ये बड़े टॉवर वाले मकान सिर्फ इनसे तो ज़िन्दगी नहीं चलती। एक वक्त बुढ़ापा ऐसा आता है जब आपको अपनों की ज़रूरत होती है।

ये अपने आपको छोटे शहरों या गांवों में मिल सकते हैं, फ्लैटों की रेजीडेंट वेलफेयर एसोसिएशन में नहीं।
कोलकाता, दिल्ली, मुंबई,पुणे,चंडीगढ़,नौएडा, गुड़गांव, बेंगलुरु में देखा है कि वहां शव यात्रा चार कंधों पर नहीं बल्कि एक खुली गाड़ी में पीछे शीशे की केबिन में जाती है, सीधे शमशान, एक दो रिश्तेदार बस और सब खत्म।
भाईसाब ये खाली होते मकान, ये सूने होते मुहल्ले, इन्हें सिर्फ प्रोपेर्टी की नज़र से मत देखिए, बल्कि जीवन की खोती जीवंतता की नज़र से देखिए। आप पड़ोसी विहीन हो रहे हैं। आप वीरान हो रहे हैं। आज गांव सूने हो चुके हैं
शहर कराह रहे हैं |
सूने घर आज भी राह देखते हैं.. बंद दरवाजे बुलाते हैं पर कोई नहीं आता |
भूपेन हजारिका का यह गीत याद आता है–
गली के मोड़ पे.. सूना सा कोई दरवाजा
तरसती आंखों से रस्ता किसी का देखेगा
निगाह दूर तलक.. जा के लौट आयेगी
करोगे याद तो हर बात याद आयेगी ||
सब
समझाइए, बसाइए लोगों को छोटे शहरों और जन्मस्थानों के प्रति मोह जगाइए, प्रेम जगाइए। पढ़ने वाले तो सब जगह पढ़ लेते हैं।

हमारे पूज्य गुरुदेव के सौजन्य से🙏

श्रीगुरू:शरणम् आज आदमी ने बाहरी तौर पर बहुत बड़ी-बड़ी शिक्षाएं ग्रहण कर ली हैं। इसलिए वह बहुत ऊँचा तर्कवादी बन गया है। हर बात के पीछे क्यों लगा देना यह तर्कवाद ही तो है। तर्क से किसी को निरुत्तर तो किया जा सकता है मगर तर्क कभी भी किसी प्रश्न का उत्तर नही बन सकता है। सत्य को देखने की अलग अलग दृष्टियाँ हैं। इसलिए अपने को तर्कों में न उलझाकर सत्य को स्वीकार कर लेना ज्यादा श्रेष्ठ है। तर्क करने की अपेक्षा जिज्ञासा करना ज्यादा श्रेष्ठ है। तर्क मतलब आप गलत में सही और जिज्ञासा मतलब दूसरे के सत्य को जानने की इच्छा। जीवन में कई विवादों की वजह केवल और केवल तर्क है। तर्क का रास्ता नर्क की ओर जाता है और समर्पण का स्वर्ग की ओर। अन्याय, अत्याचार और अनीति से लड़ना भगवान श्री कृष्ण के जीवन से सीखें। आदमी सबका विरोध करता है मगर दो जगहों पर यह विरोध का सामर्थ्य खो बैठता है। पहला जब विरोध अपनों का करना पड़े और दूसरा जब विरोध किसी सामर्थ्यवान, शक्तिवान का करना पड़े। श्री कृष्ण का जीवन तो देखिये। उन्होंने अनीति के खिलाफ सबसे अधिक अपनों का और सर्व सामर्थ्यवानों का ही विरोध किया। सात वर्ष की आयु में इन्द्र को ही चुनौती दे डाली और उसके व्यर्थाभिमान का नाश किया। अपने ही कुल के लोग जब कुमार्ग पर चलने लगे तो बिना किसी संकोच व मोह के उनका परित्याग कर दिया। अत: अन्याय, अत्याचार और अनीति का विरोध ही श्री कृष्ण की सच्चा अनुसरण होगा। अन्याय का विरोध करना ही होगा, चाहे सामने कोई अपना हो अथवा कोई साधन संपन्न ही क्यों न हो।

जे गुर चरण रेनु सिर धरही।
ते जनु सकल बिभव बस करही।।
मोहि सम यहु अनुभयेऊ न दूजे।
सबु पायऊ रज पावनि पूजे।।

सीताराम चरण रति मोरे।
अनुदिन बढ़ऊ अनुग्रह तोरे।।

श्री सदगुरुदेव भगवान की‌ जय हो। 🙏🙏

श्री सीताराम जी महाराज की‌ जय हो। 🙏🙏

श्री कनक भवन में शुशोभित बिहारी बिहारिणी जू सरकार की‌* जय हो। 🙏🙏

हमारे पूज्य गुरुदेव के सौजन्य से🙏

बहुरि बंदि खल गन सतिभाएँ।जे बिनु काज दाहिनेहु जाएं।।
पर हित हानि लाभ जिन्ह केरें ।उजैर हरष विषाद बसैरे।।
अब मै सच्चे भाव से उन दुर्जनों को प्रणाम करता हूँ, जो बिना ही प्रयोजन अपना हित करनेवाले के भी प्रतिकूल आचरण करते हैं।दूसरों के हित हानि ही जिनकी दृष्टि में लाभ है, जिनको दूसरों के उजडऩे मे हर्ष और बसने मे विषाद होता है।🙏ःरामचरितमानस,बालकाण्ड🙏

हमारे पूज्य गुरुदेव के सौजन्य से🙏

संतान के लिए विरासत

मृत्यु के समय टॉम स्मिथ ने अपने बच्चों को बुलाया, और अपने पद चिह्नों पर चलने की सलाह दी, ताकि उनको अपने हर कार्य में मानसिक शाँति मिले!

उसकी बेटी सारा ने कहा ~ डैडी !यह दुर्भाग्यपूर्ण है, कि आप अपने बैंक में एक पैसा भी छोड़े बिना मर रहे हैं।यह घर भी … जिसमें हम रहते हैं , किराये का है।

सॉरी … मैं आपका अनुसरण नहीं कर सकती।
कुछ क्षण बाद उसके पिता ने अपने प्राण त्याग दिये।

तीन साल बाद … सारा एक बहुराष्ट्रीय कम्पनी में इंटरव्यू देने गई।इंटरव्यू में कमेटी के चेयरमैन को सारा ने उत्तर दिया :-मैं सारा स्मिथ हूँ। मेरे पिता टॉम स्मिथ अब नहीं रहे।

चेयरमैन .. कमेटी के अन्य सदस्यों की ओर घूमकर बोले -यह आदमी स्मिथ वह था, जिसने … प्रशासकों के संस्थान में मेरे सदस्यता फ़ार्म पर हस्ताक्षर किये थे, और … उसकी सिफारिश से ही मैं वह स्थान पा सका हूँ ,

जहाँ मैं आज हूँ. उसने यह सब कुछ भी बदले में लिये बिना किया था। फिर वे सारा की ओर मुड़े,मुझे तुमसे कोई सवाल नहीं पूछना।

तुम स्वयं को इस पद पर चुना हुआ मान लो। कल आना … तुम्हारा नियुक्ति पत्र तैयार मिलेगा।

सारा स्मिथ उस कम्पनी में कॉरपोरेट मामलों की प्रबंधक बन गई।उसे ड्राइवर सहित दो कारें,ऑफिस से जुड़ा हुआ डुप्लेक्स मकान, और एक लाख पाउंड प्रतिमाह का वेतन अन्य भत्तों और ख़र्चों के साथ मिला।

उस कम्पनी में दो साल कार्य करने के बाद कम्पनी का प्रबंध निदेशक एक दिन अमेरिका से आया।

उसकी इच्छा त्यागपत्र देने और अपने बदले किसी अन्य को पद देने की थी, जो बहुत सत्यनिष्ठ ईमानदार हो।

कम्पनी के सलाहकार ने उस पद के लिए सारा स्मिथ को नामित किया।

एक इंटरव्यू में सारा से उसकी सफलता का राज पूछा गया।आँखों में आँसू भरकर उसने उत्तर दिया ~ मेरे पिता ने मेरे लिए मार्ग खोला था।

उनकी मृत्यु के बाद ही मुझे पता चला कि वे वित्तीय दृष्टि से निर्धन थे. लेकिन प्रामाणिकता, अनुशासन और सत्यनिष्ठा में ~ वे बहुत ही धनी थे।
फिर उससे पूछा गया, कि वह रो क्यों रही है ?

उसने उत्तर दिया -मृत्यु के समय मैंने ईमानदार और प्रामाणिक होने के कारण अपने पिता का अपमान किया था।

मुझे आशा है कि अब वे मुझे क्षमा कर देंगे.।मैंने यह सब प्राप्त करने के लिए कुछ नहीं किया। उन्होंने ही मेरे लिए यह सब किया था।

अन्त में उसका सीधा उत्तर था- मैं अब अपने पिता की पूजा करती हूँ,उनका बड़ा सा चित्र मेरे कमरे में और घर के प्रवेश द्वार पर लगा है।

मेरे लिए … भगवान के बाद उनका ही स्थान है,
ईमानदारी,अनुशासन ,आत्मनियंत्रण और ईश्वर से डरना ।
यही हैं जो किसी व्यक्ति को धनी बनाते हैं!अच्छी विरासत छोड़कर जाइए ! 🙏Jai Shri Ram🙏

हमारे पूज्य गुरूदेव के सौजन्य से🙏🏼

हांगकांग के लोग आज भी भारतीयों से नफरत करते हैं क्यों…?
जानना जरूरी है!
हमें जानना चाहिए!!

👇🤦‍♂️👇

हांगकांग में करीब एक वर्ष बिताने पर एक भारतीय महानुभाव की कई लोगों से दोस्ती हो चुकी थी, परंतु फिर भी उन्हें लगा कि वहाँ के लोग उनसे कुछ दूरी बनाकर रखते हैं, वहाँ के किसी दोस्त ने कभी उन्हें अपने घर चाय के लिए तक नहीं बुलाया था…?

उन्हें यह बात बहुत अखर रही थी अतः आखिरकार उन्होंने एक करीबी दोस्त से पूछ ही लिया…?

थोड़ी टालमटोल करने के बाद उसने जो बताया, उसे सुनकर उस भारतीय महानुभाव के तो होश ही उड़ गए।

हांगकांग वाले दोस्त ने पूछा-
“200 वर्ष राज करने के लिए कितने ब्रिटिश भारत में रहे…?”

भारतीय महानुभाव ने कहा कि लगभग “10, 000 रहे होंगे!”

“तो फिर 32 करोड़ लोगों को यातनाएँ किसने दीं?
वह आपके अपने ही तो लोग थे न…?

जनरल डायर ने जब “फायर” कहा था…
तब 1300 निहत्थे लोगों पर गोलियाँ किसने दागी थीं?
उस समय ब्रिटिश सेना तो वहाँ थी ही नहीं!

क्यों एक भी बंदूकधारी (सब के सब भारतीय) पीछे मुड़कर जनरल डायर को नहीं मार पाया…?

फिर उसने उन भारतीय महानुभाव से कहा-
आप यह बताओ कि कितने मुगल भारत आए थे? उन्होंने कितने वर्ष तक भारत पर राज किया? और भारत को गुलाम बनाकर रखा! और आपके अपने ही लोगों को धर्म परिवर्तन करवाकर आप के ही खिलाफ खड़ा कर दिया!
जोकि ‘कुछ’ पैसे के लालच में, अपनों पर ही अत्याचार करने लगे! अपनों के साथ ही दुराचार करने लगे…!!

तो मित्र, आपके अपने ही लोग, कुछ पैसे के लिए, अपने ही लोगों को सदियों से मार रहे हैं…?

आपके इस स्वार्थी धोखेबाज, दगाबाज, मतलबपरस्त, ‘दुश्मनों से यारी और अपने भाईयों से गद्दारी’😢
इस प्रकार के व्यवहार एवं इस प्रकार की मानसिकता के लिए, हम भारतीय लोगों से सख्त नफ़रत करते हैं!

इसीलिए हमारी यही कोशिश रहती है कि यथासंभव, हम भारतीयों से सरोकार नहीं रखते…?

उसने कहा कि-
जब ब्रिटिश हमारे देश हांगकांग में आए तब एक भी व्यक्ति उनकी सेना में भरती नहीं हुआ क्योंकि हमें अपने ही लोगों के विरुद्ध लड़ना गवारा नहीं था…?

यह भारतीयों का दोगला चरित्र है, कि अधिकाँश भारतीय हर वक्त, बिना सोचे समझे, पूरी तरह बिकने के लिए तैयार रहते हैं…? और आज भी भारत में यही चल रहा है🤷‍♂
विरोध हो या कोई और मुद्दा, राष्ट्र विरोधी गतिविधियों में और खुद के फायदों वाली गतिविधियों में भारत के लोग आज भी, राष्ट्र हित को हमेशा दोयम स्थान देते हैं😩 आप लोगों के लिए “मैं और मेरा परिवार” पहले रहता है😢 “समाज और देश” जाए भाड़ में…?

बात कड़वी है पर सही है!
🧏‍♂️🤦‍♂️🙇‍♂️🤔🇮🇳🇮🇳🇮🇳🙏🙏🙏🙏🙏

हमारे पूज्य गुरुदेव के सौजन्य से🙏

आपका जीवन साथी कौन है?

माँ
पिता
पत्नी
बेटा
पति
बेटी
दोस्त…???? *बिल्कुल नहीं*

आपका असली जीवन साथी
आपका शरीर है ..

एक बार जब आपका शरीर जवाब देना बंद कर देता है तो कोई भी आपके साथ नहीं है।

आप और आपका शरीर जन्म से लेकर मृत्यु तक एक साथ रहते हैं।

जितना अधिक आप इसकी परवाह करते हैं, उतना ही ये आपका साथ निभाएगा।

आप क्या खाते हो?
फ़िट होने के लिए आप क्या करते हैं?
आप तनाव से कैसे निपटते हैं?

आप कितना आराम करते हैं?
आपका शरीर वैसा ही जवाब देगा।
याद रखें कि आपका शरीर एकमात्र स्थायी पता है जहां आप रहते हैं।

आपका शरीर आपकी संपत्ति है, जो कोई और साझा नही कर सकता ।

आपका शरीर आपकी
ज़िम्मेदारी है।
इसलिये,
आप हो इसके असली
जीवनसाथी।

हमेशा के लिए फिट रहिए
अपना ख्याल रखिए,
पैसा आता है और चला जाता है
रिश्तेदार और दोस्त भी
स्थायी नही हैं। आते हैं चले जाते है
याद रखिये,
कोई भी आपके अलावा आपके शरीर की मदद नहीं कर सकता है।


आप रोज करें:-
प्राणायाम – फेफड़ों के लिए
ध्यान – मन के लिए
योग-आसन – शरीर के लिए
चलना – दिल के लिए
अच्छा भोजन – आंतों के लिए
अच्छे विचार – आत्मा के लिए
*अच्छे कर्म – दुनिया के लिए *इसलिए स्वस्थ रहिए, फिट रहिए और प्रसन्न रहिए।*🏃🏼😊✍🙏

हमारे पूज्य गुरुदेव के सौजन्य से🙏🏼

मृत्यु के १४ प्रकार
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राम-रावण युद्ध चल रहा था, तब अंगद ने रावण से कहा- तू तो मरा हुआ है, मरे हुए को मारने से क्या फायदा?
रावण बोला– मैं जीवित हूँ, मरा हुआ कैसे?
अंगद बोले, सिर्फ साँस लेने वालों को जीवित नहीं कहते – साँस तो लुहार की धौंकनी भी लेती है!

तब अंगद ने मृत्यु के 14 प्रकार बताए-

कौल कामबस कृपिन विमूढ़ा।
अतिदरिद्र अजसि अतिबूढ़ा।।
सदारोगबस संतत क्रोधी।
विष्णु विमुख श्रुति संत विरोधी।।
तनुपोषक निंदक अघखानी।
जीवत शव सम चौदह प्रानी।।

  1. कामवश: जो व्यक्ति अत्यंत भोगी हो, कामवासना में लिप्त रहता हो, जो संसार के भोगों में उलझा हुआ हो, वह मृत समान है। जिसके मन की इच्छाएं कभी खत्म नहीं होतीं और जो प्राणी सिर्फ अपनी इच्छाओं के अधीन होकर ही जीता है, वह मृत समान है। वह अध्यात्म का सेवन नहीं करता है, सदैव वासना में लीन रहता है।
  2. वाममार्गी: जो व्यक्ति पूरी दुनिया से उल्टा चले, जो संसार की हर बात के पीछे नकारात्मकता खोजता हो; नियमों, परंपराओं और लोक व्यवहार के खिलाफ चलता हो, वह वाम मार्गी कहलाता है। ऐसे काम करने वाले लोग मृत समान माने गए हैं।
  3. कंजूस: अति कंजूस व्यक्ति भी मरा हुआ होता है। जो व्यक्ति धर्म कार्य करने में, आर्थिक रूप से किसी कल्याणकारी कार्य में हिस्सा लेने में हिचकता हो, दान करने से बचता हो, ऐसा आदमी भी मृतक समान ही है।
  4. अति दरिद्र: गरीबी सबसे बड़ा श्राप है। जो व्यक्ति धन, आत्म-विश्वास, सम्मान और साहस से हीन हो, वह भी मृत ही है। अत्यंत दरिद्र भी मरा हुआ है। गरीब आदमी को दुत्कारना नहीं चाहिए, क्योंकि वह पहले ही मरा हुआ होता है। दरिद्र-नारायण मानकर उनकी मदद करनी चाहिए।
  5. विमूढ़: अत्यंत मूढ़ यानी मूर्ख व्यक्ति भी मरा हुआ ही होता है। जिसके पास बुद्धि-विवेक न हो, जो खुद निर्णय न ले सके, यानि हर काम को समझने या निर्णय लेने में किसी अन्य पर आश्रित हो, ऐसा व्यक्ति भी जीवित होते हुए मृतक समान ही है, मूढ़ अध्यात्म को नहीं समझता।
  6. अजसि: जिस व्यक्ति को संसार में बदनामी मिली हुई है, वह भी मरा हुआ है। जो घर-परिवार, कुटुंब-समाज, नगर-राष्ट्र, किसी भी ईकाई में सम्मान नहीं पाता, वह व्यक्ति भी मृत समान ही होता है।
  7. सदा रोगवश: जो व्यक्ति निरंतर रोगी रहता है, वह भी मरा हुआ है। स्वस्थ शरीर के अभाव में मन विचलित रहता है। नकारात्मकता हावी हो जाती है। व्यक्ति मृत्यु की कामना में लग जाता है। जीवित होते हुए भी रोगी व्यक्ति जीवन के आनंद से वंचित रह जाता है।
  8. अति बूढ़ा: अत्यंत वृद्ध व्यक्ति भी मृत समान होता है, क्योंकि वह अन्य लोगों पर आश्रित हो जाता है। शरीर और बुद्धि, दोनों अक्षम हो जाते हैं। ऐसे में कई बार वह स्वयं और उसके परिजन ही उसकी मृत्यु की कामना करने लगते हैं, ताकि उसे इन कष्टों से मुक्ति मिल सके।
  9. सतत क्रोधी: 24 घंटे क्रोध में रहने वाला व्यक्ति भी मृतक समान ही है। ऐसा व्यक्ति हर छोटी-बड़ी बात पर क्रोध करता है। क्रोध के कारण मन और बुद्धि दोनों ही उसके नियंत्रण से बाहर होते हैं। जिस व्यक्ति का अपने मन और बुद्धि पर नियंत्रण न हो, वह जीवित होकर भी जीवित नहीं माना जाता। पूर्व जन्म के संस्कार लेकर यह जीव क्रोधी होता है। क्रोधी अनेक जीवों का घात करता है और नरकगामी होता है।
  10. अघ खानी: जो व्यक्ति पाप कर्मों से अर्जित धन से अपना और परिवार का पालन-पोषण करता है, वह व्यक्ति भी मृत समान ही है। उसके साथ रहने वाले लोग भी उसी के समान हो जाते हैं। हमेशा मेहनत और ईमानदारी से कमाई करके ही धन प्राप्त करना चाहिए। पाप की कमाई पाप में ही जाती है और पाप की कमाई से नीच गोत्र, निगोद की प्राप्ति होती है।
  11. तनु पोषक: ऐसा व्यक्ति जो पूरी तरह से आत्म संतुष्टि और खुद के स्वार्थों के लिए ही जीता है, संसार के किसी अन्य प्राणी के लिए उसके मन में कोई संवेदना न हो, ऐसा व्यक्ति भी मृतक समान ही है। जो लोग खाने-पीने में, वाहनों में स्थान के लिए, हर बात में सिर्फ यही सोचते हैं कि सारी चीजें पहले हमें ही मिल जाएं, बाकी किसी अन्य को मिलें न मिलें, वे मृत समान होते हैं। ऐसे लोग समाज और राष्ट्र के लिए अनुपयोगी होते हैं। शरीर को अपना मानकर उसमें रत रहना मूर्खता है, क्योंकि यह शरीर विनाशी है, नष्ट होने वाला है।
  12. निंदक: अकारण निंदा करने वाला व्यक्ति भी मरा हुआ होता है। जिसे दूसरों में सिर्फ कमियाँ ही नजर आती हैं, जो व्यक्ति किसी के अच्छे काम की भी आलोचना करने से नहीं चूकता है, ऐसा व्यक्ति जो किसी के पास भी बैठे, तो सिर्फ किसी न किसी की बुराई ही करे, वह व्यक्ति भी मृत समान होता है। परनिंदा करने से नीच गोत्र का बंध होता है।
  13. परमात्म विमुख: जो व्यक्ति ईश्वर यानि परमात्मा का विरोधी है, वह भी मृत समान है। जो व्यक्ति यह सोच लेता है कि कोई परमतत्व है ही नहीं; हम जो करते हैं, वही होता है, संसार हम ही चला रहे हैं, जो परमशक्ति में आस्था नहीं रखता, ऐसा व्यक्ति भी मृत माना जाता है।
  14. श्रुति संत विरोधी: जो संत, ग्रंथ, पुराणों का विरोधी है, वह भी मृत समान है। श्रुत और संत, समाज में अनाचार पर नियंत्रण (ब्रेक) का काम करते हैं। अगर गाड़ी में ब्रेक न हो, तो कहीं भी गिरकर एक्सीडेंट हो सकता है। वैसे ही समाज को संतों की जरूरत होती है, वरना समाज में अनाचार पर कोई नियंत्रण नहीं रह जाएगा।

हमारे पूज्य गुरुदेव के सौजन्य से🙏🏼

🍬 “मार्श मेलो थ्योरी” 🍬

एक टीचर ने
क्लास के सभी बच्चों को एक-एक स्वादिष्ट टॉफ़ी दी और फिर एक अजीब बात कही
सुनो, बच्चो !
आप सभी को दस मिनट तक अपनी टॉफ़ी नहीं खानी है और यह कहकर वह क्लास रूम से बाहर चले गए।

कुछ पल के लिए क्लास में सन्नाटा छाया रहा,
हर बच्चा अपने सामने रखी टॉफ़ी को देख रहा था और हर गुज़रते पल के साथ खुद को रोकना मुश्किल पा रहा था।

दस मिनट पूरे हुए और टीचर क्लास रूम में आ गए।

समीक्षा की तो पाया कि
पूरी क्लास में सात बच्चे ऐसे थे, जिनकी टॉफ़ियां ज्यों की त्यों थी,
जबकि बाकी के सभी बच्चे टॉफ़ी खाकर उसके रंग और स्वाद पर बातें कर रहे थे।

टीचर ने चुपके से इन सात बच्चों के नाम अपनी डायरी में लिख लिये।

किसी को कुछ नहीं कहा और पढ़ाना शुरू कर दिया।
इस टीचर का नाम
वाल्टर मशाल था।

कुछ वर्षों के बाद टीचर वाल्टर ने अपनी वही डायरी खोली और सातों बच्चों के नाम निकाल कर उनके बारे में जानकारी प्राप्त की।

उन्हें पता चला कि सातों बच्चों ने अपने जीवन में कई सफलताओं को हासिल किया है और अपनी-अपनी फील्ड के लोगों में सबसे सफल रहे हैं।

टीचर वाल्टर ने अपनी उसी क्लास के शेष छात्रों की भी जानकारी प्राप्त की और यह पाया कि उनमें से ज्यादातर बच्चे साधारण जीवन जी रहे थे
जबकि उनमें कुछ ऐसे भी थे जिन्हें कठिन आर्थिक और सामाजिक परिस्थितियों का सामना करना पड़ रहा है ।

इस शोध का परिणाम टीचर वाल्टर ने एक वाक्य में यह निकाला कि –
“जो व्यक्ति केवल दस मिनट धैर्य नहीं रख सकता, वह जीवन में कभी आगे नहीं बढ़ सकता।”

इस शोध को दुनिया भर में शोहरत मिली और इसका नाम
“मार्श मेलो थ्योरी”
रखा गया था
क्योंकि टीचर वाल्टर ने बच्चों को जो टॉफ़ी दी थी
उसका नाम “मार्श मेलो” था।

इस थ्योरी के अनुसार दुनिया के सबसे सफल लोगों में कई गुणों के साथ एक गुण ‘धैर्य’ अवश्य पाया जाता है क्योंकि यह गुण इंसान में बर्दाश्त करने की ताक़त को बढ़ाता है, जिसकी बदौलत आदमी कठिन परिस्थितियों में भी निराश नहीं होता और वह एक सफल व्यक्ति बन जाता है इसलिए सफल जीवन और सुखद भविष्य के लिए धैर्य के गुण का विकास करें।

इस प्रेरणा दायक कहानी को बार-बार पढते रहीये

मुश्किलें हमेशा सवाल करती हैं
और
धैर्य ही हमेशा जवाब देता है

सफलता वक्त और बलिदान मांगती है,
वो कभी भी प्लेट में परोसी हुई नहीं मिलती है,
किसी कार्य को शुरूआत करना आसान है , लेकिन उसमें निरंतरता वनाये रखना कठिन है,

हर कोशिश में शायद सफलता नहीं मिल पाती ,
लेकिन
हर सफलता का कारण कोशिश ही होता है

अगर आप risk नहीं लेते हो
तो आप हमेशा उन लोगो के लिए काम करोगे जो risk लेते हैं

“दुनियां” की हर “चीज़”
“ठोकर” लगने से “टूट” जाती हैं
एक “कामयाबी” ही हैं
जो “ठोकर” खाकर ही मिलती हैं…..