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” सकारात्मकता “ अगर आप दुख पर ध्यान देंगे तो हमेशा दुखी रहेंगे और सुख पर ध्यान देंगे तो हमेशा सुखी रहेंगे क्योंकि यह जीवन का शाश्वत नियम है कि आप जिस पर ध्यान देंगे वही चीज सक्रिय हो जाती है। यदि दो पेड़ों को एक साथ लगाया जाए मगर देख रेख एक ही पेड़ की की जाए, एक ही पेड़ का ध्यान रखा जाए और समय - समय पर खाद पानी भी उसी एक पेड़ को दिया जाए तो सीधी सी बात है कि जिस पेड़ पर ध्यान दिया जाएगा वही अच्छे से पुष्पित और फलित हो पायेगा। ठीक ऐसे ही सुख पर ध्यान केंद्रित करोगे तो जीवन में सुख की ही वृद्धि पाओगे और दुख पर ध्यान केंद्रित करोगे तो जीवन में दुख ही दुख प्राप्त होंगे। विज्ञान ने भी इस बात को सिद्ध किया है कि जीवन में जिस वस्तु की हम उपेक्षा करने लगते हैं वो वस्तु धीरे-धीरे अपने अस्तित्व को खोना शुरू कर देती हैं। भले ही वो प्रेम हो, करुणा हो,जीवन का उल्लास हो अथवा सुख ही क्यों न हो। जहाँ सकारात्मक दृष्टि जीवन में सुख की जननी होती है वहीं नकारात्मक दृष्टि जीवन को दुख और विषाद से भी भर देती है। इसलिए जीवन में सदा सकारात्मक दृष्टि ही रखी जानी चाहिए ताकि व्यक्ति के दुख और विषाद जैसे काल्पनिक शत्रुओं का समूल नाश हो सके।

🙏 जय सदगुरुदेव 🙏

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गुरू कृपा ही केवलम्🌷
“प्रकृति एक सीख”
जीवन तब जटिल बन जाता है जब हम सीखना बंद कर देतेहैं।यह संपूर्ण प्रकृति हमें एक सीख प्रदान करती है ताकि हम उससे कुछ सीख कर अपने जीवन को सरल ,खुशहाल व आनंदमय बना सके।
चींटी से मेहनत, बगुले से तरकीब और मकडी से कारीगरी ,ये हमें जीवन में सीखनी चाहिए ।नन्ही सी चींटी महीने भर मेहनत करती है और साल भर आराम और निश्चिंतता से अपना जीवन जीती है।बिना मेहनत के जीवन खुशहाल और निंश्चित नहीं बन सकता है ये उस नन्हीं सी चींटी की सीख है।
वैसे तो बगुले को उसके ढोंग के लिए ही जाना जाता है, मगर बगुले का वह ढोंग भी मनुष्य को एक बहुत बडी सीख दे जाता है कि रास्ते बदलो पर लक्ष्य नहीं बदलो ।कभी कभी बहुत मिहनत के बाद भी कार्य सिद्ध नहीं हो पाता है, मगर वही कार्य कम मिहनत मे भी सिद्ध हो सकता है, बस आपके पास उसकी तरकीब अथवा तरीका होना चाहिए।
मकडी हमें रचनात्मकता की सीख देती है ।अगर हम सदैव कुछ रचनात्मक करने के लिए प्रतिबद्ध होते हैं तो एक दिन हम पायेंगे कि हमारी रचनात्मकता सृजन का रूप ले चुकी होती है और एक नया अविष्कार हमारे द्वारा संपन्न हो चुका होता है।कारीगरी मानव जीवन का अहम् पहलू है।मकडी की तरह अपने कार्य में निष्ठापूर्वक व्यस्त रहिए, मगर केवल जीवन के उलझनों मे कभी भी अस्त-व्यस्त नहीं रहना चाहिए।
हमारे पूज्य गुरुदेव के सौजन्य से🙏

हमारे पूज्य गुरुदेव के सौजन्य से🙏

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जीना महत्वपूर्ण नहीं है ना ही जीवन महत्वपूर्ण है. महत्वपूर्ण है की किस भाव में हम जीवन जी रहे हैं यदि देह भाव में जीवन जी रहे हैं तो निश्चित रूप से स्त्री भाव अथवा पुरुष भाव अथवा अन्य भाव से जीवन जी रहे हैं तब…. इसे प्रभावित करने वाले कारको के अनुसार हममें विचलन और परिवर्तन होता है. यदि कोई स्त्री हैं तो निश्चित ही वह स्त्री भाव में (स्त्री देह भाव) में जी रही है तब वे सभी कारक जो स्त्री देह और स्त्री मन को प्रभावित करते हैं उसे भी प्रभावित करते रहेंगे. जब कोई देह भाव में जीवन जीता है तो देह को प्रभावित करने वाले कारक जैसे मन, बुद्धि, चित्त, अंहकार, भूख, प्यास, लोभ, मोह, काम, क्रोध, जाति, सम्प्रदाय, आधि,व्याधि, उपाधि, धन, जन्म, मरण, जरा, व्याधि इत्यादि उसे प्रभावित करते रहते हैं उसमें विभिन्न प्रकार के विचलिन उतपन्न करते रहेंगे.

वहीं देह भाव छूट जाए और यदि आत्म भाव में जीना सीख जाए तो….. फिर रहे आत्मा तो स्त्री- पुरुष भाव से मुक्त है वह तो जन्म, जरा, व्याधि और मृत्यु से भी परे है. ये चेतना का शुद्ध स्वरूप है जो सभी दुखों से परे है. गीता यही तो सीखाती है देह भाव से एक लंबी छलांग लगाओ और आत्म भाव में जीना सीखो. स्त्री- पुरुष के देह भाव से ऊपर उठकर स्वयं को चेतना का शुद्ध भाव आत्मा के रूप में पहचानो और जब हम इसे पहचान लेते हैं तो फिर नश्वरता के प्रति भय और भोगों के प्रति मोह स्वमेव समाप्त हो जाता है

यात्रा यहाँ समाप्त नहीं होती क्योंकि द्वैत यहाँ समाप्त नहीं होता अब चेतना के विस्तारीकरण की यात्रा प्रांरभ होता है. आत्मा के परमात्मा में परिवर्तित होने की प्रकिया प्रांरभ होती है.आत्म भाव से परमात्म भाव में जीने की शुरुआत होती है और आत्मा का विस्तारीकरण पूर्ण होता है तो फिर वही अद्वैत में जीने लगता. जहाँ समस्त भाव एकत्व में लीन हो जातें हैं साधक, साधना और साध्य एक हो जातें हैं

गुरू कृपा ही केवलम्🌷
“प्रसन्नता”
प्रसन्नता जीवन का सौंदर्य है।चित्त की अप्रसन्नता मे चेहरे का सौंदर्य कोई मायने नहीं रखता है।जीवन तो वही सुंदर है, जिसमें चेहरे पर खूबसूरती हो या नहीं हो मगर हृदय में प्रसन्नता अवश्य होनी चाहिए ।महत्वपूर्ण ये नहीं कि आप कितने सुंदर हैं, महत्वपूर्ण ये है कि आप कितने प्रसन्न हैं।
प्रसन्नचित व्यक्ति सकारात्मक सोच का पर्याय है।व्यक्ति की सोच जितनी सकारात्मक होगी उसका मन उतना ही प्रसन्न भी रहेगा ।सकारात्मक विचारों से ही जीवन में सकारात्मक नजरिये का निर्माण संभव हो पाता है और सकारात्मक विचार सदैव श्रेष्ठ संगत से प्राप्त होते हैं।आपके अंतःकरण की प्रसन्नता निःसंदेह आपके संगत पर भी निर्भर करती है ।
जीवन में प्रायः यही पाया गया है कि जिनके पास श्रेष्ठ विचारों वाले व्यक्तियों का संगत रहा वो पांडवों की तरह विपरीत परिस्थितियों में भी प्रसन्नतापूर्वक जी सके ।जीवन में सदैव श्रेष्ठ का संगत करें ताकि उनसे प्राप्त प्रेरक विचार आपके जीवन परिवर्तन का कारण बन सके और सुविचारों की महक से पुष्प की तरह आपका जीवन भी प्रसन्न एवं सौंदर्यपूर्ण बन सके।
हमारे पूज्य गुरुदेव के सौजन्य से🙏

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गुरू कृपा ही केवलम्🌷
“प्रेम”
प्रेम मे अद्भुत शक्ति व सामर्थ्य है।अगर उस परमात्मा को झुकाने की सामर्थ्य किसी मे है तो वो मात्र प्रेम ही है ।चाहे केवट,शबरी, हनुमानजी, सुग्रीव, विभीषण, अर्जुन, गोपियां, बिदुर जी,सुदामा जी के आगे हो,प्रेम में वशीभूत होकर कितनी ही बार उस प्रभु को झुकते हुए देखा गया है ।
प्रभु प्रेम में झुके हैं, इसका सीधा सा मतलब यह हुआ कि प्रेम में ही किसी को झुकाने की शक्ति व सामर्थ्य है।और जो प्रेम स्वयं भगवान को झुका सकता है, वह इंसान को क्यूँ नहीं झुका सकता है ? निःसंदेह वह इंसानों को भी झुका सकता है।प्रेम में झुकते हुए प्रभु ने यही सीख दी है कि अगर आप सामने वाले से प्रेमपूर्ण व्यवहार करते हैं तो निःसंदेह आप उसके ऊपर अपना आधिपत्य भी जमा लेते हैं।
किसी को जीतना चाहते है तो उसे प्रेम से जीतिए।किसी को डराकर, धमकाकर और बल प्रयोग से कुछ समय के लिए ही जीता जा सकता है।प्रेम वो शहद है जो संबधों को मधुर, मीठा बनाता है।मधुर संबंध पारिवारिक खुशहाली को जन्म देते हैं और पारिवारिक खुशहाली एक सफल जीवन की नींव है।
हमारे पूज्य गुरुदेव के सौजन्य से🙏

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गुरू कृपा ही केवलम्🌷
“आत्मविश्वास”
लक्ष्य जितना बडा होगा, मार्ग भी उतना ही बडा होगा और बाधाएँ भी अधिक आयेंगी ।यदि आपकी महत्वाकांक्षा /लक्ष्य बडी होगी तो उसके लिए सामान्य आत्मविश्वास नहीं बहुत उच्च स्तरीय आत्मविश्वास चाहिए।एक क्षण के लिए भी निराशा आयी वहीं लक्ष्य मुश्किल और दूर होता चला जायेगा ।
मनुष्य का सच्चा-साथी और हर स्थिति में उसे सँभालने वाला अगर कोई है तो वह आत्मविश्वास ही है ।आत्मविश्वास हमारी बिखरी हुई समस्त चेतना और ऊर्जा को एकत्रित करके लक्ष्य की ओर ले जाता है।
दूसरों के ऊपर ज्यादा निर्भर रहने से आत्मिक दुर्बलता तो आती ही है, साथ में छोटी छोटी ऐसी बाधाएँ आती है, जो पल भर में आपको विचलित कर जाती है ।इसलिए स्वयं पर भरोसा रखिए।दुनिया में ऐसा कुछ नहीं है ,जो आपके दृढ-संकल्प से बडा हो।
हमारे पूज्य गुरुदेव के सौजन्य से🙏

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गुरू कृपा ही केवलम्🌷
जब किसी तालाब में मोटी काई लग जाती है ,तब पानी दिखाई नहीं देता है ,चारों तरफ़ हरी-हरी काई ही दिखाई देती है।हाथ से हटाओ तो वहाँ से हाथ हटाते ही काई फिर से पानी को ढँक लेता है।वही दशा मन की है।मन मे दुनिया के छल-प्रपंच ,कलह -कल्पना और भ्रम जनित नाना प्रकार के विकारों की काई छाई हुई है।जब सत्-सज्जनों की संगति होती है तो लगता है कि मन की काई साफ हो गई है।जैसे ही वहाँ से अलग हुए ,फिर छल-प्रपंच एवं विकारों की काई मन में छा जाती है ।बडी विकट है, यह काई बारंबार हटाने पर भी मन से हटने का नाम नहीं लेती है।बस मन में छाई हुई काई को हटाते रहें, हटाते रहें और दिन-रात निरंतर सावधानी रखें ताकि मन में फिर से कोई काई जमने न पाये ।
हमारे पूज्य गुरुदेव के सौजन्य से।🙏

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गुरू कृपा ही केवलम् 🙏
मन कभी भी खाली नहीं बैठ सकता।कुछ ना कुछ करना इसका स्वभाव है ।इसे काम चाहिए ।अच्छा काम करने को नहीं मिला तो बुरे की ओर भागेगा।
मन जहाँ खाली हुआ, बस उपद्रव प्रारंभ कर देगा।लडाई-झगड़ा, निंदा-आलोचना, विषय-विलास ,ऐसी कई गलत जगह पर यह आपको ले जायेगा, जहाँ पतन निश्चित है।
पतन एक जन्म का हो तो कोई बात नहीं ।ऐसे कई अपराध और गलत कर्म करा देता है ,जिसके प्रारब्ध फल को भुगतने के लिए कई कई जन्म भी कम पड जाते हैं ।
मन को सृजनात्मक और रचनात्मक कार्यों में व्यस्त रखिये।इससे आपके आध्यात्मिक विकास के साथ भौतिक विकास भी होगा।मन सही दिशा में लग गया तो जीवन मस्त (आनंदमय)हो जायेगा ,नहीं तो जीवन अस्त-व्यस्त, तनावग्रस्त, और अपसेट होने मे देर नहीं लगेगी।
जीवन में भगवतप्राप्ति का लक्ष्य निर्धारित करना चाहिए।जो लक्ष्य बिना बनाए जीवन व्यतीत कर रहे हैं ,उनका जीवन तो जा रहा है, और मौत भी आयेगी ही ,इसलिए जीवन में लक्ष्य पहले ही बना लेना चाहिए।
लक्ष्य बनाने पर बहुत लाभ होता है।अगर लक्ष्य बन गया तो वह खाली नहीं जायेगा ,कमी रह जायेगी तो तो योगभ्रष्ट हो जाओगे।
लक्ष्य बनाने पर हमारा साधन, उद्देश्य को सुनिश्चित करने के लिए होता है।समय बर्बाद नहीं होता है।समय सार्थक होने पर स्वाभाविक वृत्तियाँ स्वतः सही हो जाती है ।अवगुण स्वतः दूर होते हैं ।संसार का खिंचाव कम होता है ।आस्तिक भाव बढता है।अगर जीवन में यह परिवर्तन दीख नहीं पड रहा है तो लक्ष्य नहीं बना है, साधन हाथ नहीं लगा है ।साधु,गुरू, शास्त्र का संगत नहीं मिला है।
हमारे पूज्य गुरुदेव के सौजन्य से।🙏🙏

एक अच्छे मिलनसार, मददगार शख्सियत की जीवन दृष्टि 🙏मृत्यु तो अटल है, लेकिन एक अच्छे मिलनसार, मददगार शख्सियत की असामयिक मृत्यु परिवार के साथ पूरे समाज को झकझोर कर रख देती है।आज भी किसी परिचित के अस्वस्थ होने पर एक अन्जान आशंका से मन घिर जाता है।वे मददगार शख्सियत कानाम-परिमल किशोर सिन्हा, प्यार से लोग बिट्टू कहकर पुकारते थे।पिता-स्व.ब्रजनंदन प्रसादमाता-स्व.मालती देवीशिक्षा-बी.काम.आनर्स, एम.बी.ए.मूल रूप से बेगूसराय, सनहा ग्राम निवासी उनका जन्म, लालन-पालन,कायस्थ टोला, केशोपुर, जमालपुर मे हुआ था।बचपन से ही कुशाग्र बुद्धि के थे ।पिता रेलवे मे गार्ड थे।माता देवभक्त प्रेम की मूर्ति, गृहिणी थी।विरासत में माता-पिता एवं परिवार के अच्छे संस्कारों एवं अच्छी परवरिश के कारण उन्हें उच्च कोटि की सोच मिली ।परिवार के सभी सदस्यों ,मित्रों के वे चहेते थे ।कुछ बहने उन्हें प्रेम से बिट्ठला कहकर पुकारती थी ।रेलवे हाई स्कूल, जमालपुर से स्कूली शिक्षा प्राप्त की।इंटरमीडिएट करने के बाद उनका रूझान हिंदी साहित्य की ओर मुड गया ।उनके बडे भैया प्रोफेसर डाक्टर कमल किशोर सिन्हा (झूलन भैया)उन्हें इंजीनियर बनाना चाहते थे, इसके लिए उन्होंने आइ,आइ,टी,प्रवेश हेतु फार्म लाकर दिया था ,पर उस समय उनकी रूचि हिंदी-साहित्य के प्रति इतनी ज्यादा थी कि उन्होंने फार्म देखा तक नहीं।वे हिंदी-साहित्य के इतने उत्सुक पाठक थे कि कई काव्य, महाकाव्य उन्हें कंठाग्र थे ।साहित्य मे इतने रम गए कि वे भूल गए कि उन्हें अपनी भविष्य की आजीविका के लिए क्या करना चाहिए।तब उनके पिताजी जबरन उन्हें पटना. लाकर पटना विश्वविद्यालय में बी.काम.आनर्स मे दाखिला करा दिया जहाँ से वे उच्च श्रेणी में उतीर्ण हुए।राँची से एम.बी.ए. डिग्री हासिल करने के बाद भारत सरकार के उपक्रम मे उच्च पद पर पदासीन हुए। उनका विवाह श्री अरूण भूषण की पुत्री अनामिका भूषण से हुआ ।उनके दो छोटे छोटे बच्चे हैं ।अपने दायित्वों के निर्वहन के दौरान ज्यादा समय भोपाल एवं दिल्ली में व्यतीत किया ।उनकी उदारता अद्भुत थी।उनको दूसरों को मदद करने के अलावा अपना कोई शौक नहीं था ।वे अत्यंत उत्साही, कर्मठ,सौम्य, सक्रिय, मिलनसार, जूझारू, खुशमिजाज, ऊर्जा और आत्मविश्वास से भरपूर शख्सियत थेक्ष।न किसी से गिलवा न किसी से शिकायत।अपने ही धुन में मतवाला, जिंदादिल इंसान थे।जहाँ वे होते थे हँसी-खुशी का माहौल अपने आप बन जाता था।खूब हँसी-मजाक होती थी ।कहते हैं न इस दुनिया में जो आया है वो एक-न-एक दिन जरूर जायेगा ।बस फर्क इतना है कि कोई अपनी छाप छोड़कर चले जाते हैं, कोई कुछ नहीं।वे वर्ष 2020 से कारोना से संक्रमित थे।उम्र सीमा से कम होने के कारण टीका प्राप्त करने मे असफल रहे ।कारोना के कारण दिल्ली के विभिन्न अस्पतालों में भर्ती हुए ।अंतिम दिनों में राजीव गांधी सुपरस्पेशलिटी अस्पताल मे भर्ती थे।डाक्टरों के अथक प्रयासों के बावजूद 2 मई 2021 को उनका देहांत हो गया।हमारे द्वारा उन्हें स्वर्गीय नहीं माना गया है, क्यूंकि ऐसे मिलनसार, मददगार शख्सियत कभी मरते नहीं ।वे हमेशा हमारी दिलों में रहेंगे।हद-से-हद मौत ऐसे शख्सियत की जिस्म मिटा सकती है ।किन शब्दों में अपनी संवेदना प्रकट करें ।आँखों के आँसू सूखने का नाम नहीं ले रहे हैं ।पूरे परिवार-समाज का एक अनमोल रत्न-धरोहर चला गया ।बडे भाइयों ने लक्ष्मण जैसा भाई,भाभियो़ ने लक्ष्मण जैसा देवर खो दिया है ।बहनों के आँखों का सितारा चला गया है ।दो छोटे छोटे बच्चे जिनके सर से पिता का साया उठ गया, उसका दर्द है, उसे कैसे नकारूँ?दिल से भावपूर्ण श्रद्धांजलि💐