हमारे पूज्य गुरुदेव के सौजन्य से🙏

Dedicated to all friends :-

“`मैनें एक दोस्त को फोन किया और कहा कि यह मेरा नया नंबर है, सेव कर लेना।

उसने बहुत अच्छा जवाब दिया और मेरी आँखों से आँसू निकल आए ।

उसने कहा तेरी आवाज़ मैंने सेव कर रखी है। नंबर तुम चाहे कितने भी बदल लो, मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता। मैं तुझे तेरी आवाज़ से ही पहचान लूंगा।

ये सुन के मुझे हरिवंश राय बच्चनजी की बहुत ही सुन्दर कविता याद आ गई….

“अगर बिकी तेरी दोस्ती तो पहले खरीददार हम होंगे।
तुझे ख़बर ना होगी तेरी कीमत, पर तुझे पाकर सबसे अमीर हम होंगे॥

“दोस्त साथ हों तो रोने में भी शान है।
दोस्त ना हो तो महफिल भी शमशान है॥”

“सारा खेल दोस्ती का हे ए मेरे दोस्त,
वरना..
जनाजा और बारात एक ही समान है।”“`

सारे दोस्तों को समर्पित.!

हमारे पूज्य गुरुदेव के सौजन्य से🙏

तप्त हृदय को, सरस स्नेह से,
जो सहला दे, मित्र वही है

रूखे मन को, सराबोर कर,
जो नहला दे, मित्र वही है

प्रिय वियोग, संतप्त चित्त को,
जो बहला दे, मित्र वही है

अश्रु बूँद की, एक झलक से,
जो दहला दे, मित्र वही है

हमारे पूज्य गुरुदेव के सौजन्य से🙏🏼

🙏 साभार अग्रेषित 🙏

महाकवि कालिदास के कंठ में साक्षात सरस्वती का वास था. शास्त्रार्थ में उन्हें कोई पराजित नहीं कर सकता था. अपार यश, प्रतिष्ठा और सम्मान पाकर एक बार कालिदास को अपनी विद्वत्ता का अहंकार हो गया.
उन्हें लगा कि उन्होंने विश्व का सारा ज्ञान प्राप्त कर लिया है और अब सीखने को कुछ बाकी नहीं बचा. उनसे बड़ा ज्ञानी संसार में कोई दूसरा नहीं. एक बार पड़ोसी राज्य से शास्त्रार्थ का निमंत्रण पाकर कालिदास विक्रमादित्य से अनुमति लेकर अपने घोड़े पर रवाना हुए.
गर्मी का मौसम था. धूप काफी तेज़ और लगातार यात्रा से कालिदास को प्यास लग आई. थोङी तलाश करने पर उन्हें एक टूटी झोपड़ी दिखाई दी. पानी की आशा में वह उस ओर बढ चले. झोपड़ी के सामने एक कुआं भी था.
कालिदास ने सोचा कि कोई झोपड़ी में हो तो उससे पानी देने का अनुरोध किया जाए. उसी समय झोपड़ी से एक छोटी बच्ची मटका लेकर निकली. बच्ची ने कुएं से पानी भरा और वहां से जाने लगी.
कालिदास उसके पास जाकर बोले- बालिके ! बहुत प्यास लगी है ज़रा पानी पिला दे. बच्ची ने पूछा- आप कौन हैं ? मैं आपको जानती भी नहीं, पहले अपना परिचय दीजिए. कालिदास को लगा कि मुझे कौन नहीं जानता भला, मुझे परिचय देने की क्या आवश्यकता ?
फिर भी प्यास से बेहाल थे तो बोले- बालिके अभी तुम छोटी हो. इसलिए मुझे नहीं जानती. घर में कोई बड़ा हो तो उसको भेजो. वह मुझे देखते ही पहचान लेगा. मेरा बहुत नाम और सम्मान है दूर-दूर तक. मैं बहुत विद्वान व्यक्ति हूं.
कालिदास के बड़बोलेपन और घमंड भरे वचनों से अप्रभावित बालिका बोली-आप असत्य कह रहे हैं. संसार में सिर्फ दो ही बलवान हैं और उन दोनों को मैं जानती हूं. अपनी प्यास बुझाना चाहते हैं तो उन दोनों का नाम बाताएं ?
थोङा सोचकर कालिदास बोले- मुझे नहीं पता, तुम ही बता दो मगर मुझे पानी पिला दो. मेरा गला सूख रहा है. बालिका बोली- दो बलवान हैं ‘अन्न’ और ‘जल‘. भूख और प्यास में इतनी शक्ति है कि बड़े से बड़े बलवान को भी झुका दें. देखिए प्यास ने आपकी क्या हालत बना दी है.

कलिदास चकित रह गए. लड़की का तर्क अकाट्य था. बड़े-बड़े विद्वानों को पराजित कर चुके कालिदास एक बच्ची के सामने निरुत्तर खङे थे. बालिका ने पुनः पूछा- सत्य बताएं, कौन हैं आप ? वह चलने की तैयारी में थी.
कालिदास थोड़ा विनम्र होकर बोले-बालिके ! मैं बटोही हूं. मुस्कुराते हुए बच्ची बोली- आप अभी भी झूठ बोल रहे हैं. संसार में दो ही बटोही हैं. उन दोनों को मैं जानती हूं, बताइए वे दोनों कौन हैं ? तेज़ प्यास ने पहले ही कालिदास की बुद्धि क्षीण कर दी थी पर लाचार होकर उन्होंने फिर से अनभिज्ञता व्यक्त कर दी.

बच्ची बोली- आप स्वयं को बङा विद्वान बता रहे हैं और ये भी नहीं जानते ? एक स्थान से दूसरे स्थान तक बिना थके जाने वाला बटोही कहलाता है. बटोही दो ही हैं, एक सूर्य और दूसरा चंद्रमा जो बिना थके चलते रहते हैं. आप तो थक गए हैं. भूख प्यास से बेदम हैं. आप कैसे बटोही हो सकते हैं ?
इतना कहकर बालिका ने पानी से भरा मटका उठाया और झोपड़ी के भीतर चली गई. अब तो कालिदास और भी दुखी हो गए. इतने अपमानित वे जीवन में कभी नहीं हुए. प्यास से शरीर की शक्ति घट रही थी. दिमाग़ चकरा रहा था. उन्होंने आशा से झोपड़ी की तरफ़ देखा. तभी अंदर से एक वृद्ध स्त्री निकली.
उसके हाथ में खाली मटका था. वह कुएं से पानी भरने लगी. अब तक काफी विनम्र हो चुके कालिदास बोले- माते पानी पिला दीजिए बङा पुण्य होगा.

स्त्री बोली- बेटा मैं तुम्हें जानती नहीं. अपना परिचय दो. मैं अवश्य पानी पिला दूंगी. कालिदास ने कहा- मैं मेहमान हूँ, कृपया पानी पिला दें. स्त्री बोली- तुम मेहमान कैसे हो सकते हो ? संसार में दो ही मेहमान हैं. पहला धन और दूसरा यौवन. इन्हें जाने में समय नहीं लगता. सत्य बताओ कौन हो तुम ?

अब तक के सारे तर्क से पराजित हताश कालिदास बोले- मैं सहनशील हूं. अब आप पानी पिला दें. स्त्री ने कहा- नहीं, सहनशील तो दो ही हैं. पहली, पृथ्वी जो पापी औऱ पुण्यात्मा सबका बोझ सहती है. उसकी छाती चीरकर बीज बो देने से भी अनाज के भंडार देती है.
दूसरे, वृक्ष जिनको पत्थर मारो फिर भी मीठे फल देते हैं. तुम सहनशील नहीं. सच बताओ तुम कौन हो ? कालिदास लगभग मूर्च्छा की स्थिति में आ गए और तर्क-वितर्क से झल्लाकर बोले- मैं हठी हूं.
स्त्री बोली- फिर असत्य. हठी तो दो ही हैं- पहला नख और दूसरे केश, कितना भी काटो बार-बार निकल आते हैं. सत्य कहें ब्राह्मण कौन हैं आप ? पूरी तरह अपमानित और पराजित हो चुके कालिदास ने कहा- फिर तो मैं मूर्ख ही हूं.
नहीं तुम मूर्ख कैसे हो सकते हो. मूर्ख दो ही हैं. पहला राजा जो बिना योग्यता के भी सब पर शासन करता है, और दूसरा दरबारी पंडित जो राजा को प्रसन्न करने के लिए ग़लत बात पर भी तर्क करके उसको सही सिद्ध करने की चेष्टा करता है.
कुछ बोल न सकने की स्थिति में कालिदास वृद्धा के पैर पर गिर पड़े और पानी की याचना में गिड़गिड़ाने लगे. वृद्धा ने कहा- उठो वत्स ! आवाज़ सुनकर कालिदास ने ऊपर देखा तो साक्षात माता सरस्वती वहां खड़ी थी. कालिदास पुनः नतमस्तक हो गए.

माता ने कहा- शिक्षा से ज्ञान आता है न कि अहंकार. तूने शिक्षा के बल पर प्राप्त मान और प्रतिष्ठा को ही अपनी उपलब्धि मान लिया और अहंकार कर बैठे इसलिए मुझे तुम्हारे चक्षु खोलने के लिए ये स्वांग करना पड़ा.
.
कालिदास को अपनी गलती समझ में आ गई और भरपेट पानी पीकर वे आगे चल पड़े.

🙏जय रामजी की 🙏आप को दंडवत प्रणाम करता हूं ।
जय मिथिला
जय जय मिथिला

हमारे पूज्य गुरुदेव के सौजन्य से🙏

एक सौदागर को बाज़ार में घूमते हुए एक उम्दा नस्ल का ऊंट दिखाई पड़ा!
.सौदागर और ऊंट बेचने वाले के बीच काफी लंबी सौदेबाजी हुई और आखिर में सौदागर ऊंट खरीद कर घर ले आया!_
.घर पहुंचने पर सौदागर ने अपने नौकर को ऊंट का कजावा ( काठी) निकालने के लिए बुलाया..!
.कजावे के नीचे नौकर को एक छोटी सी मखमल की थैली मिली जिसे खोलने पर उसे कीमती हीरे जवाहरात भरे होने का पता चला..!_
.नौकर चिल्लाया,”मालिक आपने ऊंट खरीदा, लेकिन देखो, इसके साथ क्या मुफ्त में आया है!”_
.सौदागर भी हैरान था, उसने अपने नौकर के हाथों में हीरे देखे जो कि चमचमा रहे थे और सूरज की रोशनी में और भी टिम टिमा रहे थे!_
.सौदागर बोला: ” मैंने ऊंट ख़रीदा है, न कि हीरे, मुझे उसे फौरन वापस करना चाहिए!” .नौकर मन में सोच रहा था कि मेरा मालिक कितना बेवकूफ है…!
.बोला: “मालिक किसी को पता नहीं चलेगा!” पर, सौदागर ने एक न सुनी और वह फौरन बाज़ार पहुंचा और दुकानदार को मख़मली थैली वापिस दे दी!_
.ऊंट बेचने वाला बहुत ख़ुश था, बोला, “मैं भूल ही गया था कि अपने कीमती पत्थर मैंने कजावे के नीचे छुपा के रख दिए थे!_
.अब आप इनाम के तौर पर कोई भी एक हीरा चुन लीजिए!_
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“सौदागर बोला,” मैंने ऊंट के लिए सही कीमत चुकाई है इसलिए मुझे किसी शुक्राने और ईनाम की जरूरत नहीं है!
.जितना सौदागर मना करता जा रहा था, ऊंट बेचने वाला उतना ही ज़ोर दे रहा था!_
.आख़िर में सौदागर ने मुस्कुराते हुए कहा: असलियत में जब मैंने थैली वापस लाने का फैसला किया तो मैंने पहले से ही दो सबसे कीमती हीरे इसमें से अपने पास रख लिए थे!_
इस कबूलनामें के बाद ऊंट बेचने वाला भड़क गया उसने अपने हीरे जवाहरात गिनने के लिए थैली को फ़ौरन खाली कर लिया!
.पर वह था बड़ी पशोपेश में बोला,”मेरे सारे हीरे तो यही है, तो सबसे कीमती दो कौन से थे जो आपने रख़ लिए?”
सौदागर बोला:… ” मेरी ईमानदारी और मेरी खुद्दारी.”*

🌹हमें अपने अन्दर झांकना होगा कि हम में से किस किस के पास यह 2 हीरे है।🙏🏻

🌹जिन जिन के पास यह 2 हीरे है वह दुनिया के सबसे अमीर व्यक्ति हैं।

मेरे प्यारे देशवासियों“बुढ़ापा” और “वरिष्ठता”इंसान को उम्र बढ़ने पर “बूढ़ा” नहीं बनना चाहिये “वरिष्ठ” बनना चाहिए“बुढ़ापा” अन्य लोगों का आधार ढूँढता हैऔर “वरिष्ठता” तो लोगों को आधार देती है“बुढ़ापा” छुपाने का मन करता हैऔर “वरिष्ठता” को उजागर करने का मन करता है“बुढ़ापा” अहंकारी होता हैऔर “वरिष्ठता”अनुभवसंपन्न,विनम्र और संयमशील होती है“बुढ़ापा” नई पीढ़ी के विचारों से छेड़छाड़ करता हैऔर “वरिष्ठता” युवा पीढ़ी को बदलते समय के अनुसार जीने की छूट देती है“बुढ़ापा” “हमारे ज़माने में ऐसा था” की रट लगाता हैऔर “वरिष्ठता” बदलते समय से अपना नाता जोड़ लेती है उसे अपना लेती है“बुढ़ापा” नई पीढ़ी पर अपने विचार लादता है थोपता हैऔर “वरिष्ठता” तरुण पीढ़ी की राय को समझने का प्रयास करती है“बुढ़ापा” जीवन की शाम में अपना अंत ढूंढ़ता हैमगर“वरिष्ठता”वह तो जीवन की शाम में भी एक नए सवेरे का इंतजार करती है युवाओं की स्फूर्ति से प्रेरित होती है“वरिष्ठता”और “बुढ़ापे”के बीच के अंतर को गम्भीरतापूर्वक समझकर जीवन का आनंद पूर्ण रूप से लेने में सक्षम बनिएउम्र कोई भी हो सदैव फूल की तरह खिले रहिएसदा हँसते रहे मुस्कराते रहें

🙏कितना आसान है……..*अमीर बनना !* मैं बस में चढ़ गया। अंदर भीड़ देखकर मैं परेशान हो गया। बैठने की जगह नहीं थी। तभी, एक व्यक्ति ने अपनी सीट खाली कर दी। खाली सीट के बगल में खड़ा आदमी वहाँ बैठ सकता था, लेकिन इसके बजाय उसने मुझे सीट की पेशकश की। अगले पड़ाव पर फिर वही काम हुआ। उसने अपनी सीट दूसरे को दे दी। पूरी यात्रा के दौरान 4 बार ऐसा हुआ। वह आदमी एक सामान्य कार्यकर्ता की तरह लग रहा था, दिन भर काम करने के बाद घर लौट रहा था ... आखिरी पड़ाव पर जब हम सभी उतर गए, मैंने उससे बात की। "हर बार खाली सीट मिलने के बाद भी आप किसी अन्य व्यक्ति को अपनी सीट क्यों दे रहे थे?" *उनका जवाब मुझे आश्चर्यचकित कर गया:---* "मैंने अपने जीवन में बहुत अध्ययन नहीं किया है और न ही मुझे बहुत सी बातें पता हैं। मेरे पास ना तो बहुत पैसा है। इसलिए मेरे पास किसी को देने के लिए बहुत कुछ नहीं है। इसीलिए मैं यह रोज़ करता हूँ। यह एक ऐसी चीज़ है जो मैं कर सकता हूँ। आसानी से कर सकता हूं। पूरे दिन काम करने के बाद भी मैं थोड़ी देर खड़ा रह सकता हूं। मैंने अपनी सीट आपको दे दी और आपने *धन्यवाद* कहा। इससे मुझे संतोष हुआ कि मैंने किसी के लिए कुछ किया है।" मैं इसे दैनिक तौर पर करता हूं और महसूस करता हूं कि मैं किसी तरह से अपना योगदान दे रहा हूं। मैं हर दिन घर में ताज़ा और खुश होकर आता हूं कि मैंने किसी को कुछ दिया। " *मैं अवाक था!!!* किसी के लिए कुछ करने की चाहत ही अंतिम उपहार है। इस अजनबी ने मुझे बहुत कुछ सिखाया - *भीतर से अमीर बनना कितना आसान है!* *सुंदर कपड़े, बैंक खाते में बहुत सारे पैसे, महंगे गैजेट्स, सामान और विलासिता या शैक्षिक डिग्री - आपको अमीर और खुश नहीं कर सकते हैं; लेकिन देने का एक छोटा सा कार्य आपको हर रोज़ समृद्ध और खुश महसूस करने के लिए पर्याप्त हैं।* 🙏

🤷‍♂️गुरू से शिष्य ने कहा: गुरूदेव ! एक व्यक्ति ने आश्रम के लिये गाय भेंट की है।गुरू ने कहा – अच्छा हुआ । दूध पीने को मिलेगा। एक सप्ताह बाद शिष्य ने आकर गुरू से कहा: गुरू ! जिस व्यक्ति ने गाय दी थी, आज वह अपनी गाय वापिस ले गया ।गुरू ने कहा – अच्छा हुआ ! गोबर उठाने की झंझट से मुक्ति मिली।‘परिस्थिति’ बदले तो अपनी ‘मनस्थिति’ बदल लो। बस दुख सुख में बदल जायेगा.।“सुख दुख आख़िर दोनों मन के ही तो समीकरण हैं।“अंधे को मंदिर आया देखलोग हँसकर बोले -“मंदिर में दर्शन के लिए आए तो हो,पर क्या भगवान को देख पाओगे ?“अंधे ने कहा -“क्या फर्क पड़ता है,मेरा भगवान तो मुझे देख लेगा.” द्रष्टि नहीं द्रष्टिकोण सकारात्मक होना चाहिए। ❤

भ्रष्टाचार उन्मूलन मे सूचना का अधिकार अधिनियम की भूमिका।

भ्रष्टाचार शब्द ‘भ्रष्ट’ तथा ‘आचार’ दो शब्दों से मिलकर बना है ।’भ्रष्टाचार’का सामान्य अर्थ है–निकृष्ट कोटि का आचरण करना।अर्थात जब मनुष्य अपने शारिरिक ,मानसिक एवं आर्थिक बाहुबल का दुरूपयोग करता है तथा सामूहिक दायित्व को भूलकर व्यक्तिगत स्वार्थ के लिए सरकारी नियमों एवं नैतिक मर्यादा का उल्लंघन करके गलत लाभ उठाता है तब उसका आचरण ‘भ्रष्टाचार’ कहलाता है।

  आज के भौतिकवादी युग मे अयोग्य मनुष्य बिना कठिन परिश्रम किए रातों रात अधिकाधिक सुख-सुविधाओं का उपभोग एवं उच्च सामाजिक, आर्थिक हैसियत प्राप्त करना चाहता है।इसके लिए वह नैतिक मर्यादा को ताक पर रखकर भ्रष्टाचार एवं गलत तरीके अपनाकर धन कमाने के अंधे दौड़ मे शामिल हो जाता है।इस प्रकार समाज, देश व विश्व मे भ्रष्टाचार की जडें फैलती जा रही है।बेईमानी, चोरबाजारी, रिश्वतखोरी जैसी अनेक सामाजिक बुराईयां भ्रष्टाचार को जन्म दे रही है।सामाजिक, प्रशासनिक एवं राजनैतिक पदों, अधिकारों का दुरुपयोग भ्रष्टाचार को बढावा दे रही है।हर भ्रष्ट व्यक्ति अपने भविष्य को आर्थिक रूप से सुरक्षित व मजबूत कर लेना चाहता है।इसके लिए वह अनैतिक व भ्रष्ट तरीकें अपनाकर समाज, राष्ट्र एवं मानवता का भी अहित करने से नहीं हिचकिता है। आज  हमारे देश की अधिकांश व्यवस्था भ्रष्टाचार का शिकार हो चुकी है।अधिकांश राजनैतिक व प्रशासनिक ढाँचा भ्रष्टाचार मे आकंठ डूबी हुई है।भ्रष्टाचार ने अपनी जडें पूरे समाज में फैला ली है।समाज का हर वर्ग इससे बुरी तरह प्रभावित नजर आ रहा है।इसी कारण भ्रष्टाचार ने एक गंभीर व विकराल समस्या का रूप धारण कर लिया आ। स्पष्ट है कि ‘भ्रष्टाचार’ एक सामाजिक बुराई है।सरकार अथवा उसके द्वारा निर्मित कानूनो से ‘भ्रष्टाचार’ का पूर्ण उन्मूलन संभव नहीं है।दृढ इच्छा शक्ति के द्वारा अपने अंदर सदाचार सृजित कर ही भ्रष्टाचार का उन्मूलन संभव है। सरकार इस बुराई को सरकारी तंत्र से दूर करने के लिए कई कडे कदम उठाए गए हैं।ऐसे कानून बनाए गए हैं, जिससे भ्रष्टाचार को कम करने मे काफी मदद मिली  है।इन कानूनों में ‘सूचना का अधिकार अधिनियम’एक मील का पत्थर साबित हुए हैं।अब यह मान्य एवं स्थापित तथ्य है कि गोपनीयता भ्रष्टाचार का एक प्रमुख स्त्रोत है।इसलिए सरकारी एवं अन्य सार्वजनिक तंत्रों मे पारदर्शिता लाकर भ्रष्टाचार को दूर करने का प्रयास किया जा सकता है।प्रजातांत्रिक व्यवस्था में सरकार द्वारा जो कार्य किए जाते हैं वह जनकल्याण की भावना एवं लोकहित मे किए जाते हैं।सीमित संसाधनों से अधिकतम लाभ आम जनता को पहुंचाने का सरकारी ध्येय रहता है।लेकिन सरकारी तंत्रों मे अधिकारों का दुरूपयोग करने की प्रवृत्ति ,लालफीताशाही एवं मनमानी करने के चलते हमें लोकनिधि का दुरुपयोग एवं असावधानी पूर्वक खर्च किए जाने के गलत दृष्टांत प्रायः देखने को मिलते हैं।इसलिए आवश्यक है कि सरकारी कार्यों के हर स्तर पर पारदर्शिता बरती जाये।इससे लोकनिधि का उपयोग सही ढंग से होगा साथ ही पारदर्शिता से भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाया जा सकेगा।

भ्रष्टाचार उन्मूलन मे सूचना का अधिकार अधिनियम की भूमिका काफी महत्वपूर्ण है, जो निम्नलिखित है :-1.यह अधिनियम देश के नागरिकों के हाथ में शक्तिशाली अस्त्र प्रदान करता है, जिससे कि सरकारी कार्यालयो मे उपलब्ध सूचनाएं एवं दस्तावेज आसानी से प्राप्त किए जा सके।2.यह अधिनियम सरकारी कार्यालयों के विभिन्न स्तरो पर सम्पादित होने वाले क्रियाकलापों मे खुलापन एवं पूरी पारदर्शिता सुनिश्चित करता है। 3.सरकारी योजनाओं का चयन, क्रियान्वयन ,अनुश्रवण एवं मूल्यांकन सहित हर स्तर पर आम जनता को स सहभागिता आवश्यक है।इस अधिनियम के अन्तर्गत जानकारी प्राप्त कर आम जनता योजनाओं के संशोधन, परिवर्तन का सुझाव देकर अपनी सहभागिता सुनिश्चित कर सकते हैं।जिसके लाभप्रद परिणाम प्राप्त हो रहे हैं। 4. जब सरकारी कार्यकलापों मे गोपनीयता नहीं रहेगी और पूर्ण पारदर्शिता रहेगी तो निश्चित रूप से भ्रष्टाचार मे कमी आयेगी।आम नागरिकों को सरकारी कार्यकलापों के बारे में सूचना का अधिकार रहने से सरकारी तंत्र भी गलत करने से विरत रहते हैं। 5. प्रजातंत्र मे सरकारी कार्य किसी एक व्यक्ति या कुछ व्यक्तियों तक निहित नहीं होते हैं।इसलिए उच्च स्तर से निम्न स्तर तक का शासन आम जनता के प्रति जबाबदेह होता है।जनता को यह जानने का हक होता है कि उसकी सरकार उनके लिए क्या कर रही है।इस अधिनियम के तहत अधिकार मिलने से लोक प्राधिकारों को वे नियमित रूप से जबाबदेह बना सकते हैं। 6. जिस प्रकार स्वतंत्रता और अधिकार आपस मे जुड़े हुए हैं, ठीक उसी प्रकार सुशासन और सूचना का अधिकार का पारस्परिक संबंध है।सुशासन का मतलब है लोगों के लिए ऐसी नीतियां, योजनाएं बनाना और उसे क्रियान्वित करना जो न्यायसंगत ,पारदर्शी, भेदभावरहित ,सामाजिक रूप से संवेदनशील और जनसहभागिता जैसे मूल्यों से संपन्न हो तथा मुख्य रूप से लोगों के प्रति जबाबदेह हो ।यह अधिनियम सुशासन की प्राप्ति के लिए उपयुक्त वातावरण बनाता है। 7. यह अधिनियम सामान्य सूचना उपलब्ध कराने एवं संवेदनशील सूचना गोपनीय रखने में संतुलन कायम रखता है।

आम जनता को अँधेरे मे रखकर अपने व्यक्तिगत स्वार्थ के लिए पक्षपात करना और लोकनिधि का दुरुपयोग कर गलत लाभ उठाना अब बीते दिनों की बात होगी जिसमें’सूचना का अधिकार’अधिनियम की भूमिका प्रमुख होगी।ःहमारे पूज्य गुरुदेव के सौजन्य से।🙏🌹🙏🌹🙏