वे बचपन के दिन💐

हमारे पापाजी की बदली शिक्षक प्रशिक्षण. महाविद्यालय, मुंगेर हो गयी ।हमारे परिवार को पूरबसराय स्थित क्वार्टर आबंटित किया गया ।हमारे क्वार्टर के सामने आभ्यासिक मध्य विद्यालय था।चूंकि मेरे पास किसी स्कूल का “स्कूल लीविंग सर्टिफिकेट “नहीं था ,इसलिए मुझे प्रवेश के लिए परीक्षा देनी पडी ।मेरे साथ और बच्चे भी थे ।हम सब के सब उस परीक्षा में फेल हो गये थे।किंतु ,मेरे अंक फेल बच्चों में सबसे अधिक थे,अतः मुझे सबसे पहले प्रवेश दिया गया ।उस विद्यालय के कुछ शिक्षकों के नामो का स्मरण आज भी है।जैसे,हनुमान पंडित जी, दिनेश सर ,बाल्मीकि यादव इत्यादि ।अन्य कुछ विद्यार्थियों के साथ बाल्मीकि सर मुझे ट्यूशन पढाते थे।उस स्कूल के सहपाठियों के नाम जो स्मरण मे है, यदुनंदन, श्यामदेव साहु ,आदिल ,निशा ,मून,दिवाकर सिंह, मीरा, सलमा ,पुष्पा इत्यादि ।किंतु, दो एक घटनाएं कुछ अधिक गहराई से मन मे अंकित है।जाने क्यूं ,कक्षा में हमारे सहपाठियों की उम्र.हमसे ज्यादा ही रही होगी ।उनमे से एक लडकी सलमा मुझे स्मरण है ,हाजी सुभान मुहल्ले से आती थी।वे पैसे वाले लोग थे।पैसे वाले अमीर होने के कारण वह बाकियों से कुछ अधिक शोख और शरारती थी।वह हमेशा हमें सताती और मजाक में परेशान करते रहती थी।कभी कापी,किताब, पेंसिल बैग आदि छुपा लेना उसकी आदत थी।मै झेंपू किस्म का दब्बू लडका था।लडकियों से प्रायः दूर ही रहने की कोशिश करता था।लडकियों को देखकर पता नहीं क्यूं हमारी घिग्घी बंध जाती थी ।एक दिन वह अपनी नोट बुक लेकर मेरे पास आयी और उस पर लिखी हुई पंक्ति पर अंगुली रखकर पूछी,”क्या तुम इसे पढ सकते हो?

क्यूं नहीं,”मैंने कहा।

मैंने पढ दिया।

वह खिल उठी और जोर से ताली बजाकर बोली,”तुमने कलमा पढ दिया है।अब तुम मुसलमान हो गये।”

मेरी आँखों में आँसू आ गए ।यदि मै मुसलमान हो गया हूँ, तो अपने घर कैसे लौटूंगा?मै जानता था कि हमारा परिवार खासकर हमारी दादी पुराने खयालात की थी ।हमारे पापा जी के कोई मुसलमान मित्र हमारे घर आते थे तो उनके जाने के बाद हमारे पूरे घर की सफाई धुलाई होती थी।यदि दादी को पता चलेगा तो मुझे घर अंदर प्रवेश करने नहीं देगी।अब तो मुझे परिवार से अलग कहीं मुसलमान के मुहल्ले में रहना पडेगा और उनके जैसे कपडे पहनना पडेगा।इत्यादि मै सोच सोचकर रोता रहा ।हमारे प्रिय मित्र श्यामदेव ,मुझे जब भी याद आता है तो मेरे सामने एक बडे भाई का चित्र उभर कर सामने आ जाता है।वह गहरे साँवले रंग का हमसे लम्बा लडका था और उम्र मे हमसे बडा ही था।उसे पता चला तो उसने सलमा को डाँटा क्यूंकि वह उसी के मुहल्ले की थी ,और मुझे बहुत प्यार से समझाया ।पर, हमारे आँसू रूक नहीं रहे थे ।तभी शिक्षक कक्षा में आये तो उन्होंने पूछा कि मै क्यूं रो रहा हूँ? और किसी बच्चे ने कुछ नहीं बोला पर श्यामदेव ने सारी कहानी सुना दी।टीचर गंभीर हो गये और सलमा को डाँटा “यह भी कोई मजाक है? फिर मेरी ओर मुडे ,”कलमा पढने से कोई मुसलमान हो जाता है क्या? स्वामी रामकृष्ण परमहंस ,महात्मा गांधी भी ने अपनी प्रार्थना मे कुरान की आयतें पढी थी,तो क्या वे मुसलमान हो गये ?तुम रोना बंद करो ।हम कल सलमा को गीता पढा देंगे ,देखते हैं उससे वह हिन्दू बन जाती है या नहीं?मैने किसी प्रकार स्वयं को संभाला ।किंतु, घर आकर इस बात की चर्चा अब तक किसी से नहीं की।💐

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One thought on “वे बचपन के दिन💐

  1. बचपन की सच्ची आपबीती कहानी ,
    बहुत अच्छे से लिखा आपने सर ।

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